भारत में टिकाऊ खेती और खाद्य सुरक्षा की तलाश ने जेनेटिकली मॉडिफाइड और जीनोम संपादित बीजों को चर्चा में ला दिया है। सरकार इन्हें क्रांतिकारी बताती है, लेकिन बीटी कपास और जीएम सरसों जैसी पिछली असफलताएँ चेतावनी देती हैं। सवाल है—क्या ये तकनीकें किसानों की मदद करेंगी या खेती को कॉरपोरेट बाजार के हवाले कर पर्यावरण और किसान दोनों को संकट में डालेंगी?
निलेश देसाई
भारत, जहाँ करोड़ों किसान अपनी रोजी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर हैं, अपनी खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए नए रास्ते तलाश रहा है। इस खोज में, जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) और जीनोम संपादित बीज आजकल चर्चा के केंद्र में हैं। सरकार इन्हें अधिक पैदावार, मौसम की मार सहने की क्षमता और कम संसाधनों के इस्तेमाल के लिए क्रांतिकारी बता रही है। हाल ही में, डॉ. राइज 100 और पूसा डीएसटी राइज 1 जैसी जीनोम संपादित चावल की नई किस्में इसी दिशा में उठाया गया कदम हैं।
लेकिन बीटी कपास, बीटी बैंगन और जीएम सरसों की पिछली असफलताएँ एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं: क्या ये तकनीकें सच में किसानों के लिए वरदान साबित होंगी, या इनके पीछे खेती को बाजार बनाने की एक चाल छिपी है, जो हमारे किसानों और पर्यावरण दोनों को खतरे में डाल सकती है?
जीएम बीजों का इतिहास: वादे और धोखे
जेनेटिक मॉडिफिकेशन (जीएम) में बाहर से डीएनए लेकर पौधों में डाला जाता है, ताकि उनमें कुछ खास गुण (जैसे कीड़ों से बचाव, सूखा सहने की क्षमता) आ जाएं। भारत में जीएम की शुरुआत बीटी कपास से हुई, जिसे 2002 में मंजूरी मिली। मॉनसैंटो की इस तकनीक में एक खास बैक्टीरिया (बीटी) का जीन कपास में डाला गया, जिससे वह कीड़ों को मारने वाला जहर पैदा करने लगा।
शुरुआत में इसकी सफलता के दावे किए गए, लेकिन जल्द ही इसकी सच्चाई सामने आने लगी:
कीटों का प्रतिरोध: 2010 तक, गुलाबी बॉलवर्म जैसे कीड़ों ने बीटी कपास के खिलाफ अपनी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली, जिसके चलते किसानों को फिर से कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ा।
महंगी लागत: बीटी कपास के बीज आम बीजों से 4-5 गुना महंगे (1,000-1,500 रुपये प्रति पैकेट) थे। पेटेंट के कारण किसान हर साल नए बीज खरीदने को मजबूर थे, क्योंकि बीज बचाना गैरकानूनी था।
कर्ज और आत्महत्याएँ: महाराष्ट्र के विदर्भ जैसे इलाकों में बीटी कपास की विफलता और ऊंची लागत ने हजारों किसानों को कर्ज के दलदल में धकेल दिया। 2002 से 2018 के बीच, महाराष्ट्र में 15,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्याएँ दर्ज की गईं, जिनमें से कई बीटी कपास से जुड़ी थीं।
पर्यावरण को नुकसान: बीटी कपास ने मधुमक्खी जैसे गैर-लक्ष्य कीटों को नुकसान पहुँचाया और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को 20-30% तक कम कर दिया।
बीटी बैंगन और जीएम सरसों की नाकामी
बीटी बैंगन: 2010 में, मॉनसैंटो और महिको ने कीट प्रतिरोध के लिए बीटी बैंगन को मंजूरी दिलाने की कोशिश की। लेकिन पर्यावरणविदों, किसान संगठनों और आम जनता के विरोध के कारण इसे रोक दिया गया। लोगों को डर था कि इससे जैव विविधता को नुकसान पहुँचेगा और खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
जीएम सरसों (डीएमएच-11): 2017 में, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा विकसित जीएम सरसों को मंजूरी देने की कोशिश हुई। लेकिन ‘स्वतंत्र भारत के लिए संग्रह’ जैसे संगठनों ने इसके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों (जैसे ग्लूफोसिनेट प्रतिरोध) को उजागर किया, जिसके बाद 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी।
इन असफलताओं ने साफ दिखाया कि जीएम बीज भले ही कुछ समय के लिए फायदा दें, लेकिन लंबे समय में किसान कर्ज, पर्यावरण का नुकसान और जैव विविधता की हानि जैसे बड़े खतरे उनके फायदों से कहीं ज़्यादा हैं। फिर भी, सरकार अब जीनोम संपादन को अगला बड़ा कदम बता रही है।
जीनोम संपादन: नई तकनीक, पुराने खतरे?
जीनोम संपादन, खासकर CRISPR-Cas9 तकनीक, जीएम से थोड़ी अलग है क्योंकि इसमें बाहर से डीएनए नहीं डाला जाता। यह जीनोम में बहुत ही सटीक बदलाव (जैसे डीएनए काटना या बदलना) करती है। भारत ने हाल ही में दो जीनोम संपादित चावल की किस्में – डॉ. राइज 100 और पूसा डीएसटी राइज 1 – पेश की हैं, जिन्हें ICAR ने विकसित किया है। सरकार का दावा है कि इनसे 19-20% ज़्यादा उपज मिलेगी, मीथेन का उत्सर्जन 20% तक कम होगा, और ये सूखा और खारेपन को भी सह सकेंगी।
लेकिन इसके साथ ही कुछ चिंताएँ और खतरे भी जुड़े हुए हैं:
अनचाहे बदलाव: CRISPR-Cas9 में Cas9 एंजाइम कभी-कभी जीन में गलत जगह पर भी बदलाव (ऑफ-टारगेट म्यूटेशन) कर सकता है, जिससे फसल की गुणवत्ता या पर्यावरण को नुकसान पहुँच सकता है। डॉ. शोमा मार्ला (ICRISAT) ने चेतावनी दी है कि इसकी एक तयशुदा मात्रा का इस्तेमाल भी जोखिम भरा हो सकता है।
जैव विविधता का नुकसान: जीनोम संपादित चावल से भारत की 1 लाख से ज़्यादा देसी चावल की किस्मों में आनुवंशिक मिलावट का खतरा है। इससे भारत का जैविक चावल निर्यात (2023 में 1.2 बिलियन डॉलर) भी प्रभावित हो सकता है।
बीज की संप्रभुता: CRISPR तकनीक पर IPR (बौद्धिक संपदा अधिकार) है, जो Corteva और Bayer जैसी कंपनियों के हाथ में है। इससे किसान बीटी कपास की तरह बीज खरीदने के लिए इन पर निर्भर हो सकते हैं।
पर्याप्त परीक्षण नहीं: इन किस्मों के लंबे समय (5-10 साल) के प्रभावों का कोई स्वतंत्र अध्ययन नहीं हुआ है, जिससे बीटी कपास जैसी विफलता फिर से हो सकती है।
स्वास्थ्य जोखिम: ऑफ-टारगेट म्यूटेशन से पैदा हुए चावल की सुरक्षा पर सवाल हैं, क्योंकि इंसानों की सेहत पर इसके असर का कोई परीक्षण नहीं हुआ है।
खेती का बाजारीकरण: कॉरपोरेट का छिपा एजेंडा
जीएम और जीनोम संपादन को बढ़ावा देने के पीछे खेती को बाजार बनाने की मंशा साफ दिखाई देती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और कुछ नीति निर्माता इन तकनीकों को बढ़ावा देकर कृषि को कॉरपोरेट नियंत्रण में लाना चाहते हैं। इसके कुछ संकेत इस प्रकार हैं:
कॉरपोरेट लॉबिंग: मॉनसैंटो, बायर और कोर्टेवा जैसी कंपनियाँ जीएम और जीनोम संपादन को भारत में बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। बीटी कपास की मंजूरी में मॉनसैंटो की लॉबिंग इसका एक उदाहरण है। PPVFR Act, 2001 में कमजोर प्रावधानों ने कंपनियों को बीजों पर पेटेंट लेने की छूट दी, जिससे किसान उन पर निर्भर हो गए।
बीज की संप्रभुता पर हमला: जीएम और जीनोम संपादित बीजों के पेटेंट से किसान बीज बचाने या आपस में साझा करने के अपने पारंपरिक अधिकार खो रहे हैं। विदर्भ में बीटी कपास के किसानों को हर साल नए बीज खरीदने पड़े, जिससे उनका कर्ज बढ़ता गया। ‘स्वतंत्र भारत के लिए संग्रह’ ने चेतावनी दी है कि जीनोम संपादित चावल से किसानों की बीज और खाद्य संप्रभुता खत्म हो सकती है।
जैविक बाजार को खतरा: जीनोम संपादित चावल की व्यावसायिक खेती से भारत का जैविक चावल निर्यात (2030 तक 5 बिलियन डॉलर का लक्ष्य) प्रभावित हो सकता है, क्योंकि यूरोप जैसे बाजार जीन-संपादित उत्पादों को लेकर बहुत सख्त नियम रखते हैं। इससे कॉरपोरेट्स को गैर-जैविक बीज बाजार पर कब्जा करने का मौका मिल जाएगा।
यह साफ है कि जीएम और जीनोम संपादन के नाम पर कहीं न कहीं किसानों को एक नए जाल में फंसाने की कोशिश हो रही है। हमें यह समझना होगा कि खाद्य सुरक्षा का असली रास्ता टिकाऊ खेती, किसानों के अधिकारों की रक्षा और जैव विविधता को बढ़ावा देने में है, न कि ऐसी तकनीकों को अपनाने में जिनके खतरे अभी पूरी तरह से समझ में नहीं आए हैं और जो किसानों को कॉरपोरेट के हाथों में सौंप सकती हैं। सरकार को चाहिए कि वह किसानों और पर्यावरण के हितों को सर्वोपरि रखे, न कि कुछ कंपनियों के मुनाफे को।


