बिहार में जारी वोटर लिस्ट के गहन परीक्षण ने तमाम राजनीतिक पार्टियों के सामने गंभीर संवैधानिक सवाल खडा कर दिया है। ऐसे में क्या एक विकल्प चुनावों का बहिष्कार नहीं हो सकता?
बिहार के बहाने जो चुनाव आयोग सारे देश को धमका रहा है, हमारा सर्वोच्च न्यायालय उसे गुदगुदा रहा है; और हमारे राजनीतिक दल चुटकुले सुना रहे हैं। यह बड़ी पतित घड़ी है।
बिहार में चुनाव आयोग की सक्रियता ऐसी है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को शर्मिंदा कर दे; किसी भी सरकारी विभाग को ईर्ष्या से भर दे। सरकारी अधिकारी ऐसी ताबड़तोड़ गति से काम करते या तो नोटबंदी के वक्त दिखे थे या अब वोटबंदी का काम करते दिख रहे हैं। होगा क्या, कोई नहीं जानता, लेकिन सब ऐसी मुद्रा धारे हैं मानो सारे ही डोनाल्ड ट्रंप से ट्यूशन ले कर आए हैं।
चुनाव की गंध हवा में घुली नहीं कि राजनीतिक दलों के मुंह में लार घुलने लगती है। चुनाव की यही गली तो है जो सत्ता तक अथवा सत्ता पाने के ख्याली सुख तक उन्हें ले जाती है। पक्ष-विपक्ष का विभाजन एक अलग स्तर पर है, लेकिन सत्ता व सत्ताकांक्षी के बीच खास बड़ा कोई विभाजन नहीं है। मिला-जुला मामला है। बकौल दुष्यंत कुमार : ‘पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है।’
यही पुल है जिससे ये राजनीतिक लोग इधर-से-उधर या उधर-से-इधर आते-जाते हैं और ऐसे आराम से कि पुल पर आत्मा का कोई भार भी नहीं पड़ता ! जब इधर थे तब जो बोलते थे उसका कोई नैतिक मूल्य नहीं था, अब उधर से जो बोलते हैं उसकी कोई नैतिक भित्ति नहीं है। फिर बोलने वाला कोई श्रीमंत सिंधिया हो कि कोई निशिकांत दुबे। इसलिए मतदाता यदि इनको अलग-अलग पहचानने से मना कर देता है तो वह उसके अज्ञान का नहीं, उसकी अदृश्य समझदारी की गवाही है।
चुनाव के नाम से ही जो लार इन सबके मुंह में घुलने लगती है, वह धीमे-धीमे जहर की तरह जनता-मतदाता की रगों में उतरने लगती है। जहर फैलता जाता है। तब पुल पर आवाजाही करते पक्ष-विपक्ष के ये ही लोग, मौका व अपनी स्थिति देखकर समवेत हुआं-हुआं करने लगते हैं कि समाज अनैतिक हो गया है, उसे लोकतंत्र, संविधान, सांप्रदायिक सद्भाव आदि से कोई मतलब नहीं रह गया है। अब यह भी कहा जा रहा है कि लोगों पर हिंदू वर्चस्व का नशा ऐसा चढ़ा है कि वे दूसरा सब कुछ भूल बैठे हैं। बार-बार संविधान की कसमें उठाने व शोर मचाने वाले कौन हैं ये लोग? जो अभी तक विपक्षी दलों में हैं और नरेंद्र मोदी व भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने में जिनका दम फूला जा रहा है, वे सबसे मुखर हैं। फिर वे भी हैं जो जनता से एकदम कटे, तथाकथित बुद्धिवादी गिरोह के सदस्य हैं। इनका पिछला इतिहास देखेंगे आप तो पाएंगे कि राजनीतिक-सामाजिक नैतिकता, समता-समानता के संघर्ष, लोकतंत्र, संविधान, सांप्रदायिक सद्भाव आदि के प्रयासों से इन सबका दूर का नाता भी नहीं रहा है।
लोकविहीन लोकतंत्र की यह त्रासदी सारी दुनिया में एक-सी है। कहीं यूक्रेन में, कहीं गजा में, कहीं कंबोडिया में, कहीं भारत-पाक के बीच में, कहीं ईरान में। यानी दुनिया में जहां-जहां आज गहरे जख्म नजर आ रहे हैं, उन सबके पीछे लोकविहीन लोकतंत्र का दानव अट्टहास कर रहा है, लेकिन अभी तो बात बिहार में मतदाता परीक्षण के बहाने नागरिकता की की जा रही गहरी पड़ताल की है। यह संविधान को एकदम उलट देने वाली बात है। संविधान कहता है कि नागरिक अपनी सरकार का चुनाव करेंगे; चुनाव आयोग कह रहा है कि सरकार अपने नागरिक का चुनाव करेगी और चुनाव आयोग इस पुनीत कार्य में सरकार का एजेंट बनेगा।
दो सवाल हैं : मतदाता सूची में यदि अपात्र घुस गए हैं तो जवाबदेह कौन है? मतदाता सूची बनाने, सुधारने, संवारने का काम हमारे संविधान ने सिर्फ चुनाव आयोग को दे रखा है। जो आपका एकाधिकार है, उसे पूरा करने में आप विफल रहे हैं, तो उसकी सजा सामूहिक तौर पर मतदाताओं को कैसे देंगे आप? सजा तो आपको – चुनाव आयोग को – मिलनी चाहिए, तुरंत व आज ही मिलनी चाहिए। मतदाता सूची को अद्यतन व पात्र-सम्मत बनाए रखने की संवैधानिक जिम्मेवारी के निर्वाह में आप विफल हुए हैं, तो पद से हटिए। नये चुनाव आयोग का गठन होना चाहिए। ऐसा करने के बजाए आप मतदाता को उसके अधिकार से वंचित कैसे कर सकते हैं? वह संविधान का जनक भी है और हमारे चुनावी तंत्र का आधार भी। उसे खारिज कौन कर सकता है? आप? आपकी औकात इस मतदाता की वजह से ही है, यह भी भूल गए आप?
अदालत ने कहाः आप बड़े पैमाने पर नाम काटेंगे तो हम दखल देंगे। अरे भाई अदालत, एक का नाम भी कटा तो लोकतंत्र कटा न ! क्या अदालत यह कहना चाहती है कि एक के साथ अन्याय हो तो वह मुंह फेर लेगी? फिर तो वह अदालत नहीं, सरकारी महकमा हो जाएगा। संविधान ने अदालत को निर्देश दे रखा है कि एक-एक मतदाता के मतदान के अधिकार के संरक्षण की पहरेदारी आपको करनी है। मी लॉर्ड, यह मतदाता आपका बोझ इसी कारण ढोता है।
दूसरा सवाल यह है कि यह मतदाता पैदा कहां से होता है? क्या कोई सरकार मतदाता पैदा करती है? नहीं, मतदाता की हमारी यह हैसियत संविधानप्रदत्त है। भारत में जनमा हर व्यक्ति वयस्क होते ही भारत का मतदाता बन जाता है। आवेदन भी नहीं करना पड़ता। किन कारणों से ऐसी स्वाभाविक नागरिकता संभव नहीं है, यह भी संविधान ने बता रखा है। संविधान ने यह भी बता रखा है कि जो भारत में नहीं जनमा है, विदेशी है, यदि वह चाहे तो वह भी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है। उसकी नागरिकता की अर्जी को सरकार मनमाना खारिज नहीं कर सकती। उसे इंकार के कारण बताने होंगे। मतलब सीधा व साफ है कि हमारी नागरिकता का कोई नाता सरकार से नहीं है, लेकिन आप सरकार में हैं, इसका सीधा नाता मतदाता से है। वह जब चाहे आपको वहां से हटा सकता है। न हटाए तो भी आपकी अधिक-से-अधिक वैधानिक उम्र 5 साल की ही है। आगे के लिए आपकी अर्जी वह खारिज करे कि कबूल, यह मतदाता पर है। ऐसी मजबूत संवैधानिक हैसियत जिस मतदाता की है, उसकी नागरिकता की जांच आप करेंगे ! नागरिकता हमारा अधिकार है, आपकी अनुकंपा नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय इस अयोग्य व अक्षम चुनाव आयोग को बर्खास्त करे तथा नये चुनाव आयोग के चयन की प्रक्रिया घोषित करे। उस आधार पर नया चुनाव आयोग गठित हो जो अदालत के सामने वे सारे तथ्य रखे कि जिस आधार पर वह मतदाता सूची की गहन समीक्षा करना चाहता है। उसका कैलेंडर बने जो किसी चुनाव से टकराता न हो। तब जाकर यह कसरत शुरू होनी चाहिए।
सरकार ने हमारे अरबों रुपये फूंक कर, हमें मजबूर कर, ‘आधार कार्ड’ बनवाया। नंदन नीलकेणी क्यों चूहे-से अब किसी बिल में छिपे बैठे हैं, जबकि वे इसे ‘क्रांतिकारी अक्षय कार्ड’ कहते थे और हमें समझाते थे कि यह एक कार्ड भारतीय नागरिक की तमाम पहचान का प्रमाण होगा? चुनाव आयोग कह रहा है कि यह रद्दी कार्ड है। तो नंदन नीलकेणी बाहर आकर हमारे साथ खड़े हों और हमारी आवाज में आवाज मिलाकर पूछें कि हमारे अरबों रुपये कौन वापस करेगा? कार्ड बनवाने के लिए हमें जबरन जिस जहालत में डाला गया, उसका जिम्मेवार कौन है? हमारे करोड़ों रुपये खर्च कर चुनाव आयोग के तब के आका शेषन साहब ने मतदाता कार्ड बनवाया था। अगर वह भी रद्दी का टुकड़ा है तो हमारे वे पैसे भी वापस करें आप ! सरकार को या चुनाव आयोग को यह अधिकार किसने दिया कि आप हमारे ही पैसों से मनमानी करें और हमें ही कठघरे में खड़ा करें? जाति प्रमाण-पत्र, मनरेगा प्रमाण-पत्र आदि सब आपके ही सरकारी कागजात हैं। इन सबकी कोई वकत नहीं? वैसे यह बात तो है ही कि जब आपके नोट की कोई वकत नहीं तो कार्ड की क्या होगी! याद है न कि यह अदालत भी नोटबंदी के सवाल पर मुंह बंदकर बैठ गई थी? अचानक नहीं, गिराते-गिराते आपने हमारे लोकतंत्र को इस मुकाम पर पहुंचाया है।
ऐसे में सरकारों को भी, चुनाव आयोग को भी, अदालतों को भी तथा इन तमाम छुटभैय्यों को भी यह अहसास कराने की जरूरत है कि मतदाता आपके खिलाफ सत्याग्रह पर उतरने को तैयार हो रहा है। यह सच है कि मतदाता संगठित नहीं है। वह परेशान होता है, लेकिन एक आवाज में बोल नहीं पाता, सामूहिक कार्रवाई नहीं कर पाता। वह मतदान कर अपना फैसला देता है, लेकिन उसके मतों का ऐसा विभाजन हो जाता है कि वह उसकी सामूहिक अभिव्यक्ति का प्रमाण नहीं बन पाता। गांधी से लेकर जयप्रकाश तक लोकतंत्र में मतदाता की स्थायी संगठित उपस्थिति का रास्ता खोजते व सुझाते रहे, लेकिन वह अभिक्रम अभी भी अधूरा है।
यह समझना मुश्किल है कि गरीब-कमजोर, अनपढ़ या निरक्षर लाखों-लाख मतदाताओं को चुनाव आयोग ने बिहार में जैसी परेशानी में डाल रखा है, उन्हें अपमानित कर रहा है, जिस तरह उसने मतदाताओं की तरफ से अपने आंख-कान-नाक सब बंद के लिए हैं, उसके बाद भी हमारा विपक्ष चुनाव लड़ने पर इस तरह आमादा क्यों है? वह बिहार के नागरिकों की मदद करेगा, बिहार के बाद जिन राज्यों की तरफ सरकार की कुदृष्टि है, उन राज्यों के नागरिकों की मदद करेगा, वह अदालत की मदद करेगा, यदि वह आज की स्थिति में चुनाव लड़ने से मना कर देगा।
हमारे विपक्ष की लज्जाजनक स्थिति यह है कि वह शासकों की रद्दी कार्बन कॉपी बनकर रह गया है। वह अपना कोई अलग चरित्र न बना पा रहा है, न दिखा पा रहा है। वह जनता की बनाई खिचड़ी खाना तो खूब चाहता है, अपनी खिचड़ी बनाने का अभिक्रम नहीं करना चाहता। ‘संपूर्ण क्रांति’ के आंदोलन में जब बिहार की विधानसभा को भंग करने की मांग की गई थी, तब कांग्रेस व सीपीआई को छोड़कर सारा विपक्ष हमारे साथ आ खड़ा हुआ था, लेकिन जैसे ही लोकनायक जयप्रकाश ने विपक्ष के विधायकों से विधायकी छोड़ने का आह्वान किया, सबको सांप सूंघ गया था। बमुश्किल दो-ढाई दर्जन विधायकों ने इस्तीफा दिया था। इस सवाल पर सारे दलों में विभाजन हो गया था। विपक्ष खुद को कसौटी पर चढ़ाने से बचता है। वह चाहता है कि मतदाता उसके हिस्से की लड़ाई लड़ें, उसके लिए प्रचार की मार-काट करें, उसके लिए वोट डालें और वह तभी बाहर निकले जब उसके गले में जीत का जयमाल हो।
अब देश का लोकतंत्र उस मुकाम पर खड़ा है कि विपक्ष को हिम्मत के साथ अपने मतदाता के साथ खड़ा होना होगा। विपक्ष को यह घोषणा करनी चाहिए कि मतदाता सूची का यह परीक्षण जारी रहा तो वह चुनाव में शरीक नहीं होगा। अदालत अपनी कार्रवाई करे इससे पहले उसके सामने यह नई स्थिति भी खड़ी कर देनी चाहिए कि बिहार का सारा विपक्ष चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का निर्णय किए बैठा है। यदि न्यायपालिका विपक्ष-विहीन चुनाव की तरफदारी करना चाहे तो करे, यह वोट-सत्याग्रह वापस नहीं लिया जाएगा। अब फैसला न्यायपालिका को करना है। संविधान भले न कहता हो कि विपक्ष-विहीन चुनाव की स्थिति में क्या करना चाहिए, नैतिकता कहती है कि ऐसा चुनाव अर्थहीन हो जाएगा। इसलिए जिस परिस्थिति की कल्पना संविधान ने नहीं की, सुप्रीम कोर्ट को उस बारे में निर्देश देना है। यही वह काम है जो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति-राज्यपाल द्वारा अनिश्चित काल के लिए राज्य सरकारों के विधायकों को रोकने के संदर्भ में किया है। इस बारे में संविधान में लिखा कुछ नहीं है, लेकिन संविधान बोलता स्पष्ट है। संविधान की उस आवाज़ को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है। इसके लिए ही तो हमने सुप्रीम कोर्ट बना रखा है। इसलिए अदालत भी कसौटी पर है, चुनाव आयोग भी, सरकार भी और विपक्ष भी।
आज बिहार में चुनाव आयोग जो कर रहा है उस खेल में जो भी शामिल होगा, वह जीत कर भी वैसे ही हार जाएगा, जैसे महाभारत में सब हारे थे। यह याद रखने की जरूरत है कि नैतिक हथियार कभी खाली नहीं जाता है। (सप्रेस)


