सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव में मुफ्त घोषणाओं के मुद्दे पर दिलचस्प बहस

विनय झैलावत

श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था के पतन की हालिया खबरों ने भारत के राज्यों की भूमिका पर एक नई बहस को जन्म दिया है। श्रीलंका की सरकार ने सभी के लिये करों में कटौती और विभिन्न मुफ्त वस्तुओं एवं सेवाओं के वितरण जैसे कदम उठाए थे। इसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ से उसके पतन की स्थिति बनी और पहले से ही भारी कर्ज में डूबे देश को पतन की ओर ले गया। इसी मुफ्त के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत लोकहित याचिका में इन दिनों दिलचस्प बहस चल रही है। उम्मीद की जाना चाहिए कि इस बहस का सार्थका परिणाम भी निकलेगा।

श्रीलंका के घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में भारतीय राज्यों द्वारा दिए जा रहे मुफ्त उपहारों या ‘‘फ्रीबीज‘‘ के मुद्दे पर भारत में भी एक बहस की शुरूआत हुई है। समय के साथ फ्रीबीज भारतीय राजनीति का अभिन्न अंग बन गए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिये मुफ्त बिजली/पानी की आपूर्ति, बेरोजगारों, दिहाड़ी मजदूरों एवं महिलाओं के लिये मासिक भत्ते के साथ-साथ लैपटॉप, स्मार्टफोन जैसे गैजेट्स देने का वादा करते हैं। कुछ राज्यों को फ्रीबीज प्रदान करने की आदत ही हो गई है, चाहे ऋण माफी के रूप में हो या मुफ्त बिजली, साइकिल, लैपटॉप, टीवी सेट आदि के रूप में। लोकलुभावन दबावों या चुनावों को ध्यान में रखकर किये जाने वाले ऐसे कुछ खर्चों पर निश्‍चय ही प्रश्‍न उठाए जा सकते हैं। लेकिन यह देखते हुए कि पिछले 30 वर्षों से देश में असमानता बढ़ रही है, सबसिडी के रूप में आम आबादी को इस प्रकार की राहत प्रदान करना अनुचित नहीं माना जा सकता, बल्कि वास्तव में अर्थव्यवस्था के विकास पथ पर बने रहने के लिये यह आवश्‍यक है।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत एक लोकहित याचिका में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जनता के पैसे से मुफ्त में चीजें या सुविधाएं देने का चुनावी वादा करने वाली राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ एक्‍शन लेने को लेकर जवाब देने के लिए कहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिकाधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वादे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीजें बांटने को लेकर भी होते हैं। अब इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से उनकी राय मांगी है। इस लोकहित याचिका में ऐसे राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने और उनके चुनाव चिन्ह को जब्त करने की मांग की गई है, जो चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को मुफ्त में बिजली-राशन इत्यादि देने का एलान करते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना, न्यायमूर्ति एएस बोपन्नाव तथा न्यायमूर्ति हिमा कोहली की तीन सदस्यीय पीठ ने चार हफ्ते में इस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। यह जनहित याचिका बीजेपी नेता और अभिभाषक अष्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की है। इस याचिका में सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से मुफ्त में चीजें या सुविधाएं देने पर आपत्ति करते हुए इनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की मांग की गई है। इस लोकहित याचिका में मुफ्त घोषणाओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है।

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मतदाताओं को लुभाने के लिए जनता के पैसे का इस्तेमाल कर राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं को समाप्त करने के पक्ष में केंद्र के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक समिति के गठन पर याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों से सुझाव मांगा है। इसमें एक समिति के गठन पर निर्देश देने की मांग की गई थी। खण्डपीठ ने कहा कि इस याचिका पर न्यायालय की सुविचारित राय यह है कि सरकार के साथ-साथ नीति आयोग, वित्त आयोग, आरबीआई और विपक्षी दलों जैसे संगठनों को भी कुछ विचार मंथन करने और इन मुद्दों पर कुछ निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया में शामिल होना होगा। इसलिए न्यायालय ने सभी पक्षों को निर्देश दिए हैं कि वे इस तरह के निकाय की संरचना के बारे में अपने सुझाव और सिफारिशें प्रस्तुत करें।

वरिष्ठ अभिभाषक सिब्बल ने कहा, पहले संसद में बहस होनी चाहिए और संसद को इसे आगे बढ़ाना चाहिए। वित्त आयोग को सुझाव देना चाहिए जिसे सरकार को स्वीकार भी करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ये सभी नीतिगत मामले हैं और अदालतों की अपनी सीमाएं हैं। इसलिए सभी को बहस में भाग लेने दें। उन्होंने कहा कि विभिन्न प्राधिकरण विभिन्न हितधारकों के साथ बातचीत कर सकते हैं, सरकार और चुनाव आयोग को सिफारिषें कर सकते हैं। इन्हें लागू किया जा सकता है और न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट दी जा सकती है।

सुनवाई के दौरान खण्डपीठ ने कहा कि हकीकत यह है कि कोई भी राजनीतिक दल इन मुफ्त उपहारों को लेने की इजाजत नहीं देगा। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि इस तरह की ‘‘लोकलुभावन घोषणाएं मतदाता के निर्णय को विकृत करती हैं। इसी तरह हम आर्थिक आपदा की ओर बढ़ रहे हैं।‘‘

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मुख्य न्यायाधिपति ने कहा वे इन मुद्दों को लेकर थोड़ा चिंतित है। चुनाव आयोग और सरकार यह नहीं कह सकते कि हम ऐसा नहीं करना चाहते हैं। कुछ लोग जो इन मामलों से संबंधित हैं तथा जो पक्ष और विपक्ष को निष्पक्ष रूप से देख सकते हैं, सुझाव दें।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसे चुनाव आयोग पर छोड़ने का विरोध करते हुए कहा कि यह देश में ‘‘सबसे पसंदीदा संस्थान‘‘ बन गया है। कृपया, चुनाव आयोग को इससे दूर रखें। यह एक आर्थिक मुद्दा है। ये भी मिड-डे मील जैसी योजनाओं के मुद्दे हैं। ये भी मुफ्त हैं। गरीबों के लिए मुफ्त बिजली है। यह एक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा है। इसे चुनावी मुद्दा न बनाएं। इसे चुनाव आयोग के पास भी न भेजें।

राजनीति में मुफ्त की कीमत काफी महंगी होती है। वास्तव में कुछ भी मुफ्त नहीं होता। हर वस्तु तथा हर सेवा की एक कीमत होती है। किंतु कई बार यह कीमत हमसे सीधे तौर पर वसूलने के बजाय, अप्रत्यक्ष रूप से वसुली जाती है। समझदार व्यक्ति हमेशा इस बात को जानता है कि यदि वह प्रत्यक्ष रूप से किसी वस्तु की सही कीमत अदा नहीं करेगा, तो संभव है कि अप्रत्यक्ष रूप उससे कई गुना अधिक कीमत वसूली जाएगी। लेकिन कई बार देश की भोली-भाली जनता शायद इस तथ्य को समझने में देरी कर देती है। राजनीति में ऐसा कई बार हुआ है जब, जनता ने मुफ्त में प्राप्त वस्तु अथवा सेवाओं की कीमत, उसके असल मूल्य से भी कई गुना अधिक कीमत देकर चुकाई है। इस प्रकार की राजनीति को ‘‘फ्रीबी पॉलिटिक्स‘‘ कहा जाता है। राजनीति में मुफ्त उपहारों और योजनाओं की घोषणा करके राजनीतिक लोकप्रियता बढ़ाने और लाभ कमानें की होड़ मची रहती है। तकनीकी भाषा में इसे फ्रीबी राजनीति कहा जाता है। जानकार मानते हैं कि फ्रीबीज, व्यापक रूप से आर्थिक स्थिरता के बुनियादी ढांचे को कमजोर करती हैं और आम जनता के जीवन की गुणवत्ता में समग्र सुधार करने के बजाय नेता अपने राजस्व पर खर्च करने के लिए व्यय प्राथमिकताओं को विकृत करते हैं।

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पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष, एन.के. सिंह के अनुसार मुफ्त उपहारों का अर्थशास्त्र हमेशा गलत होता है। अर्थशास्त्र और राजनीति में मुफ्तखोरी एक गहरी खाई होती हैं। इसका सरल शब्दों में अर्थ यह है कि, आने वाले समय में फ्री के चक्कर में केंद्र से उधार लेने वाले राज्य अत्यधिक तनाव ग्रस्त तथा दिवालिया हो जायेंगे। हमें अच्छी तरह से प्रशासित राज्यों और कम अच्छी तरह से प्रशासित राज्यों के मध्य अंतर करने के लिए बनाई गई नीतियों की परामर्श प्रक्रिया पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, संविधान का अनुच्छेद 293(3) हमें बताता है कि यदि किसी भी राज्य का पुराना ऋण अभी भी बकाया है तो वह राज्य भारत सरकार की सहमति के बिना कोई ऋण नहीं ले सकता है। एन.के. सिंह ने पंजाब को एक उदाहरण के रूप में लेते हुए कहा कि हमें प्रतिस्पर्धी फ्रीबी राजनीति के संस्कृति के विचार से भी दूर रहना चाहिए।

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