प्रेरणा

पूंजी को परोसी जाती सार्वजनिक सम्पत्ति

सार्वजनिक सम्पत्ति के निजीकरण की हुलफुलाहट में इन दिनों ठेका-प्रथा जारी है। हवाई-अड्डों, रेलवे-स्टेशनों, सडकों, कारखानों आदि को फिलहाल ठेके पर निजी कंपनियों को सौंपने के पीछे की नीयत आखिर निजीकरण नहीं तो और क्या है? ‘सरकार का काम व्यापार-व्यवसाय…

खेल और खिलाड़ी से पूंजी के खिलवाड़

हमारे समय में खेल तक पैसा कमाने का एक ऐसा जरिया बन गए हैं जिसमें चांदी काटने के लिए तरह-तरह के हथकंडे किए जाते हैं। हाल का टोकियो ओलिंपिक भी इससे अछूता नहीं रहा है। खिलाड़यों के रिकार्ड और मेडल…

विविधता का विवेक : कठिन समय की सीख

कोविड-19 सरीखी महामारियां हमें अपनी मौजूदा व्यवस्था की बदहाली बताने के अलावा यह चेतावनी भी देती हैं कि हमारा जीवन-यापन का तरीका बेतुका और आत्महंता है। लेकिन क्या हम इसे सुनने-समझने को तैयार हैं? क्या कोविड-19 हमें अपने जीवन को…

‘चौरी-चौरा’ के सौ साल बाद किसान आंदोलन

सौ से अधिक दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन अब केवल तीन कानूनों की वापसी और ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की वैधानिक गारंटी तक सीमित नहीं रह गया है। उसमें लंबे और प्रभावी आंदोलन के तौर-तरीके, अहिंसा की…

किसानों को क्यों नहीं समझा पा रही, सरकार?

कडकती ठंड और तेज बरसात में देश की राजधानी को घेरे बैठे किसानों को अब करीब डेढ महीना हो गया है, लेकिन मामला सुलझता नजर नहीं आता। किसान तीन नए कृषि कानूनों को खारिज करवाना चाहते हैं और सरकार सात-आठ…

बाजार को बरकाने लायक विकल्‍प

कोविड-19 महामारी से उपजी आर्थिक महामंदी ने बाजारों में खलबली मचा दी है। इससे निपटने के लिए तरह-तरह की सरकारी राहतों के अलावा नोट छापकर बांटने तक के सुझाव दिए जा रहे हैं। क्‍या महात्‍मा गांधी, जिन्‍होंने 1930 की पिछली…

कृषि के ताजा कानूनों पर क्‍या कहते, गांधी

इन दिनों देशभर के किसान संसद द्वारा पारित तीन कानूनों को लेकर बेचैन हैं। इन कानूनों के विरोध में जगह-जगह धरना, प्रदर्शन जारी हैं और इनकी मार्फत सरकार से कहा जा रहा है कि वह इन कानूनों को वापस ले…