विविधता का विवेक : कठिन समय की सीख

प्रेरणा

कोविड-19 सरीखी महामारियां हमें अपनी मौजूदा व्यवस्था की बदहाली बताने के अलावा यह चेतावनी भी देती हैं कि हमारा जीवन-यापन का तरीका बेतुका और आत्महंता है। लेकिन क्या हम इसे सुनने-समझने को तैयार हैं? क्या कोविड-19 हमें अपने जीवन को बदलने जैसा कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर सकेगा?

जब सब तरफ हाहाकार मचा है, तभी सही वक्त है यह जांचने का कि हम कहां चूके।

हाल यह है कि मनुष्य-सभ्यता पर चौतरफा आक्रमण हो रहा है। आर्थिक विषमता शर्मनाक हद छू रही है। शीर्ष लोगों का पूरी तरह अधःपतन हो चुका है। प्रकृति क्रोध से तांडव कर रही है। कभी-कभार होने वाली प्रकृतिक आपदाएं रोज हो रही हैं। नये-नये रोग, रोज-रोज ऐसे नये-नये रूप धारण कर रहे हैं कि यह समझ पाना मुश्किल हो रहा है कि रोग मनुष्य को मथ रहे हैं या मनुष्य रोगों को मथने में लगा है।  

जिस दुनिया के ज्ञानी-ध्यानी लोग एकता, भाईचारा, शांति व अहिंसा की बातें कहते-समझाते थे, उसी दुनिया में जातीय विद्वेष, धार्मिक संकीर्णता, देशों के बीच परस्पर अविश्वास की ऐसी हवा बह रही है कि मानवता का तंबू तानना मुश्किल है। विवेक अविवेक की आंधी में दम तोड़ रहा है। सब कह रहे हैं कि यह कोविड-काल है।   

कई बार मन डूब जाता है : क्या सचमुच हमने विविधता का विवेक खो दिया है? 

लाखों सालों की कारीगरी है, प्रकृति की यह संरचना कि जिसमें कहीं जंगल हैं तो कहीं रेगिस्तान, कहीं समंदर हैं तो कहीं बर्फ। जहां समंदर हैं वहां उसके अनुकूल पेड़-पौधे, फल-सब्ज़ी, पानी-हवा-तापमान सब मिलते हैं; जहां रेगिस्तान है वहां उसके अनुकूल सारा पर्यावरण मिलता है। इतनी सारी विविधता के बीच ऐसा संतुलन कितना हैरान कर जाता है ! 

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हम इससे हैरान तो जरूर हुए, लेकिन हमने किया क्या? सारी विविधता पर अपनी सुविधा का बुलडोजर फिरा दिया ! हमने चाहा कि हम जहां चाहें वहां जाएं और जहां जाएं वहां हमें वही और वैसा ही मिले, जो और जैसा हमें चाहिए! अपने ही अनुकूल तापमान, अपनी ही स्वाद का भोजन, अपने जैसी ही हवा, अपनी ही सुविधा की बारिश ! सब जगह वही रहन-सहन जिसकी हमें आदत है। हमने दुनिया को ‘एसी,’ पिज्जा और बर्गर के बाजार में बदल लिया। हमने वातावरण की विविधता को खत्म करने की हर चंद कोशिश की – एक मूर्खतापूर्ण कोशिश!      

जैव-विविधता के मामले में तो हमारी मूर्खता की सीमा ही नहीं है। खेती के बारे में विज्ञान कहता है कि एक ही तरह की फसल, एक ही तरह के बीज लगाने से जमीन की उर्वरता क्रमश: घटती जाती है। इतना ही नहीं, यदि फसल में कोई बीमारी फैले या कीड़ों का प्रकोप हो तो इलाके की पूरी-की-पूरी फसल चुटकी में बर्बाद हो जाती है। इसकी काट खोजी हमने कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल में। नतीजा हुआ कि फसल भी गई, उर्वरता भी और अंतत: जमीन भी।

फसल पर आने वाले कीट-पतंगों में मित्र कीट भी होते हैं और हानिकारक कीट भी। हमारा कीटनाशक इसका विवेक नहीं करता। वह कीटों को मारता है, बगैर यह देखे कि किसे बचाना है, किसे मारना है। आग लगती है तो वह कहां विवेक करती है कि किसे जलाना है और किसे बचना है; बाढ़ कहां विवेक करती है कि किसे डुबोना है और किसे उबारना है? 

हम अपने शरीर को तो जरा गौर से देखें ! दो इंसानों की उंगलियों के निशान भी एक-से नहीं होते। हमारे शरीर में भी मित्र और शत्रु, दोनों तरह के जीवाणु होते हैं। हमारा शरीर-तंत्र दोनों से अलग-अलग व्यवहार करता है, लेकिन हमने अपनी स्वास्थ्य-व्यवस्था ऐसी विकसित की है कि एक ही दवा सरदर्द में भी और बुखार में भी और खांसी में भी काम आए। एकदम रामवाण !

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एंटी बायोटिक्स का न हमने सिर्फ अपने शरीर में अंधाधुंध इस्तेमाल किया है, बल्कि उन प्राणियों पर भी किया है जिनका दूध, अंडा या मांस हम खाते हैं। नतीजा यह है कि कोई एक रोग किसी चीन में जनमता है, तो उसे पूरी दुनिया में फैलने में कुछ दिन या सप्ताह भी नहीं लगते। सब कुछ एक जैसा है तो रोग भी एक जैसा ही फैलता है।  

हमने पैसे का आविष्कार क्या किया, माना कि भगवान बना लिया। जब आज हम कोविड-19 महामारी से गुजर रहे हैं तो यह दर्दनाक अहसास हो रहा कि पैसा है, फिर भी जान नहीं बच रही है। कैसे पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना किसी सभ्यता का मुख्य लक्ष्य हो सकता है? महामारी तो दिखा रही है कि इकॉनॉमी पांच की हो या पच्चीस की, सभी जगह मरे उतने ही लोग ! 

कभी जातीय श्रेष्ठता के बड़े गुण हमने गाए तो कभी धार्मिक श्रेष्ठता के। हर धर्म का दावा कर रहा है कि दुनिया में वही, और केवल वही सच्चा और अच्छा धर्म है। हिटलर ने जर्मनी में जो यहूदियों के साथ किया, अमूमन हम सबने समय-समय पर दूसरे मनुष्यों के साथ वही किया है। इसलिए आज भी हम वैसा कुछ करने से शर्माते नहीं हैं।

कोरोना महामारी शायद इसी का अहसास कराने आयी है। अहंकार जहर है। जब जो पिएगा, मरेगा ! दुनिया फतह करने का अहंकार पालने वाली सभ्यता आज पामाल हुई नजर आती है कि नहीं ? किसान कह रहे हैं कि आपके तीन कृषि कानून हमें नहीं चाहिए; आपका अहंकार कह रहा है कि लोग जिएं कि मरें, ये कानून वापस नहीं ले सकते!! और कोविड महामारी मनुष्य-सभ्यता से कह रही है – हर तरफ से वापस लौटो !  यह ‘यू टर्न’ लेने का वक्त है। फिर यह वक्त भी नहीं रहेगा।

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‘यू टर्न’ करेंगे हम, तो सामने जो रास्ता दिखेगा वह हमसे कहेगा कि मशीन-श्रम नहीं, शरीर-श्रम करो। वही धन-मन-तन तीनों का संरक्षण करेगा। ‘ट्रेड मिल’ पर नहीं, मैदान में अपने पांवों पर दौड़ो, पैदल चलो। फैशन नहीं, जीवन-शैली बदलो ! पर्यटन शौक बने, व्यवसाय नहीं। अनावश्यक घुमक्कड़ी का प्रचार बाजार की चाल है जो पर्यावरण, सामाजिकता और मानवीय नैतिकता को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है।  

परिवार भारतीय समाज की ही नहीं, मानव-समाज की धुरी है। परिवार तोड़ने वाली हर व्यवस्था मानवद्रोही होती है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ मानवीय दृष्टि है। हमारा पड़ोस, हमारा गांव-शहर हमारे जीने का आधार है! रोजगार भी और बाजार भी, राजनीति भी और शिक्षा भी, सबका लक्ष्य यही होना चाहिए कि मनुष्यता का क्षरण न हो, परिवार का विघटन न हो।

एक देश-एक-बजार, एक-कर, एक-चुनाव, एक धर्म, एक जाति की दिशा ही गलत है। विविधता हमारी विशेषता है,  विवशता नहीं। विविधता प्राकृतिक है; एकरसता कृत्रिम ! विविधता को समृद्ध करना है, ताकि हम प्रकृति के निकट जा सकें व जी सकें। विविधता का विवेक ही हमें अब बचा सकता है। (सप्रेस)

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