‘डूबत खातों’ की भरपाई के लिए बैंकों ने लगाए मनमाने शुल्क

प्रिया दर्शिनी,आशीष काजला

विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे (कु) ख्यात व्यापारियों की मार्फत डूबे बैंकों के हजारों करोड़ रुपयों ने ‘एनपीए’ यानि डूबत खाते को सार्वजनिक बहस-मुबाहिसों का मुद्दा बना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ हुए इस खुले खेल ने बैंकों की हालत पतली कर दी है, लेकिन क्या इसे वापस पटरी पर लाने के लिए आम नागरिकों से अतार्किक शुल्क की वसूली ही एकमात्र उपाय बचा है ?

पिछले कुछ वर्षों से सभी बैंक अपनी भांति-भांति की गतिविधियों के लिए ग्राहकों पर भारी शुल्क लगा रहे हैं। ऐसी कुछ बैंकिंग गतिविधियों पर पहले से शुल्क मौजूद हैं, लेकिन नए शुल्क सर्वथा भेदभाव पूर्ण हैं और छात्रों, देहाड़ी मजदूरों, फेरीवालों जैसे सीमांत और गरीब वर्गों पर संकट खड़ा कर रहे हैं। वर्तमान में अधिकांश बैंकों से एक महीने में, एक ही एटीएम से पांच बार मुफ्त निकासी के अलावा शाखाओं में नकद राशि जमा करने और निकालने पर शुल्क लगाया जा रहा है। दूसरे बैंक के एटीएम से मुफ्त निकासी की सीमा तीन बार की है। खाते में कम राशि होने के कारण एटीएम कार्ड से हुए असफल लेन-देन और खाते में न्यूनतम राशि नहीं बनाए रखने के ‘अपराध’ में बैंक अपने ग्राहकों से बड़ी मात्रा में शुल्क वसूल रहे हैं। इस तरह के शुल्कों ने आम लोगों, खासतौर पर पिछड़े, गरीब वर्ग के लिए बैंकिंग सेवाएं मुश्किल बना दी हैं।

गौरतलब है कि अकेले 2017-18 के साल में तीन बड़े निजी बैंकों और 21 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने अपने खातों में न्यूनतम राशि नहीं बनाए रखने के बदले ग्राहकों से 5,000 करोड़ रुपयों की राशि वसूल की थी। अगर हम इस राशि की तुलना, उसी एक वर्ष में बच्चों में कुपोषण से निपटने के लिए गठित ‘राष्ट्रीय पोषण मिशन’ पर खर्च की गई राशि से करें तो बैंकों की वसूली डेढ़ गुना ज्यादा बैठेगी। उसी एक वर्ष में यह राशि ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ के कुल बजट का लगभग दो-गुना होगी। 

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सभी जानते हैं कि 1973 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद वाणिज्यिक बैंकों, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने, ग्रामीण और शहरी गरीबों के साथ-साथ सीमांत आबादी को बैंकिंग प्रणाली में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीयकरण के परिणामस्वरूप बैंकों ने सामाजिक रूप से संवेदनशील नीतियां बनाना शुरू कर दिया था। ये नीतियां न सिर्फ बैंकिंग को दूरदराज के स्थानों तक ले गईं बल्कि उन लोगों के लिए ऋण की उपलब्धता भी सुनिश्चित की गई जो अन्यथा साहूकारों एवं चिट-फंडों के चंगुल में फंसे हुए थे।

नब्बे के दशक के बाद भूमंडलीकरण के दौर में बैंकिंग क्षेत्र राष्ट्रीयकरण और सामाजिक मॉडल के अपने उद्देश्यों से हटकर बड़े उद्योगों को ऋण देने को प्राथमिकता देने लगा। इसके परिणामस्वरूप भारी ‘स्ट्रेस्ड’ (तनाव-युक्त) परिसंपत्तियों और ‘एनपीए’ (नॉन पर्फार्मिंग एसेट यानि डूबत खाते का कर्ज) ने बैंकों को अभूतपूर्व संकट में धकेल दिया। कॉर्पोरेट कारोबारियों द्वारा लिए गए बड़े ऋण नहीं चुकाने से बैंकों का मुनाफा कम हो गया। ‘एनपीए’ और ‘स्ट्रैस्ड’  संपत्ति 10 लाख करोड़ रुपयों से अधिक हो गयी। इसके अलावा ‘आधार’ के लिए नामांकन, ‘जन-धन कार्यक्रम’ आदि के माध्यम से खातों को खोलने और बनाए रखने जैसी गतिविधियों ने बैंकों पर और अधिक बोझ डाल दिया।

ऐसे में कर्ज वसूली तंत्र को मजबूत बनाने की बजाय बैंकों ने अपने नुकसान की भरपाई करने के लिए लगभग हर बैंकिंग गतिविधि पर शुल्क लगाना शुरू कर दिया। इसने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर ऐसे वर्गों पर भारी दबाव डाला जो वर्तमान में बैंकों के साथ अपने खाते बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। निजी खातों में आवश्यक न्यूनतम राशि नहीं रखने एवं अन्य सेवा शुल्कों की वजह से पैसे कटने पर कई लोगों ने बैंकों में पैसा रखना भी बंद कर दिया। विश्वबैंक के आकड़ों से पता चलता है कि भारत में करीब 19 करोड़ वयस्कों के पास अपना बैंक खाता नहीं है। भारत में दुनिया की आबादी का 11 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जो किसी भी प्रकार से बैंकों से नहीं जुड़ा है। जाहिर है, बैंकों को तत्काल जरूरतमंद लोगों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बैंकिंग सेवाओं के विस्तार की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

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जुर्मानों और शुल्कों को मनमाने ढंग से थोपना लोगों को वापस साहूकारों एवं कर्ज प्रप्ति के अन्य अनौपचारिक तरीकों की तरफ धकेल रहा है। इससे उनके साहूकारों के जाल में फिर फंसने का खतरा है। इसके अलावा ये शुल्क लोगों के साथ-साथ बैंकों के लिए भी एक बड़ी समस्या है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अभी भी जमाराशि से ही अपना संचालन करते हैं। यदि बैंक ग्राहकों को हर बैंकिंग लेनदेन के बदले शुल्क देने को मजबूर करते हैं तो यह लोगों को बैंकिंग सेवाओं के इस्तेमाल के प्रति हतोत्साहित करेगा। इससे बैंकों का संकट और ज्यादा बढ़ सकता है।

ऐसे में बेहतर होगा कि बैंक अपने ऋण वसूली तंत्र को मजबूत बनाएं और जानबूझ कर कर्ज नहीं लौटाने वालों पर कड़ी कार्यवाही करें। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने देश की अर्थव्यवस्था में बहुत योगदान दिया है और जीवन को बेहतर बनाने में जरूरतमंदों का साथ दिया है, मगर ‘आरबीआई’ (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के नेतृत्व और सरकार ने मिलकर ऐसे नीतिगत बदलाव किए हैं जो गरीब विरोधी एवं बैंकों के राष्ट्रीयकरण के सिद्धांतों के विपरीत हैं। इन नीतिगत बदलावों ने बैंकों को न सिर्फ ‘खराब ऋणों’ के गहरे संकट में ढकेल दिया है, बल्कि इसने बैंकों से लोगों को भी विमुख कर दिया है, जिससे उनके निजीकरण की राह आसान हो गई है।(सप्रेस)  http://www.spsmedia.in

प्रिया दर्शिनी और आशीष काजला ‘सेण्टर फॉर फाइनेंसियल एकाउंटेबिलिटी,’दिल्ली से जुडे हैं।

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