कहा जा रहा है कि संवैधानिक बदलाव के लिए 850 सदस्यों वाली संसद बनाने की जुगत में सत्ताधारी भाजपा देशभर की राजनीतिक जमातों को ललचाकर, धमकाकर, डराकर विखंडित करने में लगी है। मीनाक्षी नटराजन के प्रकरण को देखें तो इस कारनामे में सीट-चोरी की कला भी देखी जा सकती है। सवाल है, क्या इस धतकरम को रोका जा सकता है? आखिर कौन इसे रोकेगा?
कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के किसी चुनाव अधिकारी ने कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा की उम्मीदवारी का पर्चा खारिज कर दिया। वे बैठे-बैठे हार गईं। लोकतंत्र के तमाम अंगों की मौन सहमति से ‘भारतीय जनता पार्टी’ के तीनों उम्मीदवार बैठे-बिठाए जीत गए। यह हमारा नया लोकतंत्र है। इसमें फैसला आपको करना है कि आप इस लोकतंत्र के लायक हैं या नहीं।
वैसे मीनाक्षीजी और राहुल गांधी की कांग्रेस को यह पहचानना चाहिए कि वे दोनों हार तो तभी गए थे जब उन्हें अपने 62 विधायकों को हवाई जहाज में बिठाकर कर्नाटक भेजना जरूरी लगा था। कांग्रेस अपने पतन की यह दशा समझ पा रही है? पिछले लंबे समय से राहुल गांधी कांग्रेस के संगठन को संवारने की जो कोशिशें कर रहे हैं, वह कहां पहुंची है, इसका एक नमूना मध्यप्रदेश के वे 62 विधायक हैं जिनका ख़ुद पर या जिन पर संगठन का इतना भी भरोसा नहीं है कि वे किसी भी हाल में संघी-जाल में नहीं फंसेंगे।
जब कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व के सबसे नाज़ुक दौर से गुजर रही है, सारा देश देख रहा है कि राहुल-प्रियंका अपना सारा बल समेटकर इसे पटरी पर लाने में जुटे हैं, संघ परिवार इनसे भयभीत है और अपनी पूरी ताकत व चातुरी से इन्हें बदसूरत साबित करने में लगा है, तब राहुल-प्रियंका को इतना भरोसा भी नहीं है कि उनके विधायक न खरीदे जा सकते हैं, न डराए जा सकते हैं। उनके विधायकों में इतना राजनीतिक शील भी नहीं बचा है कि वे अपने नेतृत्व को बता दें कि वे न डरेंगे, न बिकेंगे। क्या कांग्रेस में सिंधिया-संस्कृति से अलग कुछ भी नहीं बचा है; राहुल गांधी की कोशिशों से कुछ भी नहीं बना है? क्या कांग्रेस के संकट का असली चेहरा यही है?
कांग्रेस के इस आंतरिक पतन को भाजपा का वाह्य व आंतरिक पतन पहचानता है और वह उसका फायदा उठाता है। संघ परिवार हमेशा से इसी दर्शन में मानता आया है कि अपना फायदा ही पहला व अंतिम फायदा है। वह जो मानता है, उसी अनुरूप चलता है। कांग्रेस अब कुछ मानती नहीं है, वह केवल चाहती है। चाहने से कुछ मिलता नहीं है, यह वह भूल गई है। यह कांग्रेस का संकट है। वह इस सच को पहचाने कि नहीं, वह इससे जूझे कि नहीं, यह वह जाने।
ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी के साथ हुआ था। अपनी तृणमूल कांग्रेस को उन्होंने कभी समझाया ही नहीं कि इस ‘तृण’ का ‘मूल’ कहां है। उन्हें सत्ता की तलाश थी, सो उन्होंने यही सच सबको समझाया कि सत्ता जैसे व जहां मिले, हथियानी है। इस अंधे, अनैतिक दर्शन में इतनी ही संभावना है कि वह आपको दो-चार चुनाव जिता दे। उसने ममताजी को जिता दिया। वे जीतती गईं, और फिर हार गईं। ऐसी हारीं कि अब वापसी संभव नहीं है।
सारे क्षेत्रीय दल इसी दर्शन से चल रहे हैं और अपनी वक्ती जीत को अपनी असली ताक़त मान कर फूलते रहे हैं। गुब्बारा फूलने की भी एक हद तो होती है न ! फिर वह फूट जाता है। फूटा गुब्बारा फिर फूलता नहीं है। नेतृत्व की कसौटी यही है कि वह बताए-सिखाए कि हवा कब, कितनी भरनी है और कब ठहर जाना है। इसलिए प्राय: सभी क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की अंतिम कगार पर हैं। तमिलनाडु के थलपति विजय इससे कुछ सीख सकें, तो सीखें। उनके सामने संभावनाओं का संसार खुला धरा है। उस संसार को समेटने का इल्म उनमें है कि नहीं, विजय को साबित करना है। वे दूसरे चंद्रबाबू नायडू बनेंगे तो हाराकिरी करेंगे।
भारतीय राजनीति आज अनेक संभावनाओं के समक्ष खड़ी है। एक तरफ संघ परिवार है जो सत्ता का सत्य समझ चुकी है और इसलिए वह ऐसा हर कुछ कबूलती जा रही है जो उसके ही घोषित आदर्शों के विपरीत है। संघ जिस रास्ते पर चल पड़ा है उससे उसकी वापसी भी मुश्किल है। आज इनके हाथ से सत्ता निकल जाए तो यह सारा ढांचा खोखला होकर भरभरा जाएगा। इस सरकार की भी अपनी कोई नैतिक रीढ़ नहीं है। यह सत्ता-लोभ की गोंद से चिपकी हुई है और सांप्रदायिकता व दूसरी तमाम संकीर्णताओं के उन्माद को अपनी ताकत बना रही है। यह बहुमत खो चुकी है और जिस बैसाखी पर यह चल रही है वह लगातार कमजोर होती जा रही है।
दूसरी तरफ, राजनीतिक सार्थकता की निम्नतम पायदान पर खड़ा खंड़-खंड़ विपक्ष है। इसे यहां से उठना ही है, क्योंकि इससे नीचे जाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। राहुल गांधी को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने न केवल कांग्रेस को खड़ा रखा है, बल्कि विपक्ष का राष्ट्रीय कद भी बना कर रखा है। ‘इंडिया गठबंधन’ कांग्रेस की अक्षमता व दूसरे घटकों की असीमित महात्वाकांक्षा का शिकार रहा है। ये सभी साथ आने के लिए साथ नहीं आए, अपना-अपना सिक्का जमाने व जताने के लिए साथ आए। इन्होंने राज्यों को राज की तरह बांट लिया – बंगाल ममता का, उत्तरप्रदेश अखिलेश का, बिहार यशस्वी का, महाराष्ट्र उद्धव का, वामपंथियों ने केरल को अपना घोषित कर लिया, कश्मीर अब्दुल्ला-मुफ्ती की अपनी खिचड़ी कश्मीर में। कांग्रेस को इन सबने अपने राज से दूर रखने की सावधानी रखी और अब हाल यह है कि ये सब टके सेर हुए जा रहे हैं। ये चाहते थे कि जो बचा है, राहुल उसी में सीमित रहें। इस हाल में भी राहुल भारत से छोटी पहचान से जुड़े नहीं।
उन्होंने इन सबसे अलग होकर जब कदम बाहर निकाला तो ‘भारत जोड़ो’ की हवा बहाई। भाजपा को पता है कि जाति-धर्म-भाषा-लिंग से ऊपर उठी यह भारतीयता उसके लिए खतरा है और राहुल कांग्रेस को साथ लेकर देश में यह भाव जगा सकते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा का हर छुटभैय्या राहुल को पप्पू और नेहरूवाली कांग्रेस को नाकारा साबित करने में जुटा रहा। शुरू में इसने एक माहौल बनाया भी, जिसे अंधभक्तों ने ख़ूब उछाला, लेकिन इतिहास भी अपना चक्र पूरा करता ही है। अब उस माहौल की हवा निकल रही है। यह नई राजनीतिक बेचैनी है जो संघ परिवार को घेरती जा रही है।
जब दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की बेचैनी फैली हो तभी नई पहल का सही समय होता है। तिकड़म अलग चीज है। इस कला में भाजपा व उसकी सरकार को महारत हासिल है। जिसने नैतिकता, संविधान, लोकतांत्रिक परंपरा आदि-आदि को गंदे कपड़ों-सा उतार फेंका हो, उन सबके लिए ऐसी महारत हासिल करना संभव है। भाजपा इसी मुकाम पर खड़ी है। वह कोई नई पहल नहीं कर सकती। इसलिए कोई नई पहल संभव है तो ‘इंडिया’ की तरफ से ही संभव है। शर्त यह है कि वह पहल शुद्ध हो, संविधानसम्मत हो, लोकतंत्र के बुनियादी असूलों को पूरा करती हो और सारे देश को समेटकर चलती हो। विपक्ष वाली तिकड़मों की भी यहां जगह नहीं होगी। क्या कांग्रेस के नेतृत्ववाली ‘इंडिया’ में यह समझ व प्रतीति है? देश यही समझना चाहता है, देश यही होता हुआ देखना चाहता है। (सप्रेस)


