झाबुआ से लौटकर कुमार सिद्धार्थ की रिपोर्ट
झाबुआ, 2 मार्च। आदिवासी अंचल का प्रसिद्ध लोकपर्व भगौरिया इस बार झाबुआ के उत्कृष्ट मैदान में पूरे उत्साह, परंपरा और बदलते सामाजिक-राजनीतिक रंगों के साथ देखने को मिला। होली से पहले लगने वाले भगौरिया हाटों की श्रृंखला में यह मेला क्षेत्र के सबसे बड़े आयोजनों में से एक रहा, जिसमें आसपास के सैकड़ों गांवों से लगभग क लाख से अधिक आदिवासी महिला-पुरुष, युवक-युवतियां और बच्चे शामिल हुए।
सुबह से ही झाबुआ शहर की ओर आने वाले मार्गों पर ग्रामीणों के समूह दिखाई देने लगे थे। कोई पैदल, कोई मोटरसाइकिल से तो कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर मेले में पहुंच रहा था। पांच से दस किलोमीटर दूर बसे गांवों से लोग पारंपरिक वेशभूषा में सजे हुए उत्सव में शामिल होने के लिए निकले। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, उत्कृष्ट मैदान में भीड़ बढ़ती गई और दोपहर तक पूरा मैदान रंगों, संगीत और नृत्य से भर गया।
भगौरिया को आदिवासी समाज में केवल मेला नहीं, बल्कि सामाजिक मिलन का अवसर माना जाता है। भील-भिलाला समुदाय में सदियों से यह परंपरा रही है कि होली से पहले अलग-अलग स्थानों पर भगौरिया हाट भरते हैं, जहां लोग आपसी मेल-मिलाप करते हैं, रिश्ते तय होते हैं और सामूहिक उत्सव मनाया जाता है।
भगोरिया मेल-मिलाप, आनंद और उल्लास का उत्सव है। माना जाता है कि इसमें युवा अपनी पसंद के साथी को गुलाल लगाकर या पान खिलाकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। भगोरिया में मनपसंद के साथी के साथ भागकर विवाह करने की मान्यता भी प्रचलित है।

इस बार के मेले में भी पारंपरिक स्वरूप साफ दिखाई दिया, लेकिन उसके साथ आधुनिकता की झलक भी नजर आई। युवक-युवतियां रंग-बिरंगे कपड़ों में, आंखों पर काला चश्मा लगाए, हाथों में मोबाइल लिए मेले में घूमते दिखाई दिए। युवतियों के पारंपरिक घाघरा-चोली और चांदी के आभूषणों के साथ आधुनिक फैशन का मेल भी देखने को मिला।
ढोल-मांदल की थाप पर थिरकते समूह
भगोरिया मेले मेले का सबसे आकर्षक दृश्य बड़े-बड़े ढोल और मांदल की थाप पर पारंपरिक आदिवासी नृत्य किया जाता है, जिसमें विभिन्न दल ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं। अलग-अलग गांवों से आए लोग अपने दल के साथ मैदान में प्रवेश करते और गोल घेरा बनाकर नृत्य करने लगते। कई जगह युवक-युवतियों के अलग दल थे, तो कहीं पूरा गांव एक साथ नाचता दिखाई दिया।
ढोल की तेज आवाज और सामूहिक नृत्य का उत्साह इतना अधिक था कि पूरा मैदान मानो एक साथ थिरक रहा हो। बुजुर्ग भी पीछे नहीं रहे और कई स्थानों पर उन्हें भी नृत्य में शामिल होते देखा गया।
झंडों के साथ निकले जुलूस, दिखे राजनीति के रंग
इस बार के भगौरिया मेले की एक विशेष बात यह रही कि इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेतृत्व में आदिवासी समुदाय के जुलूस भी शामिल हुए। दोपहर के बाद अलग-अलग दिशाओं से ढोल-नगाड़ों और मंजीरों के साथ झंडे लेकर समूह मैदान की ओर बढ़ते दिखाई दिए। इन जुलूसों में सैकड़ों की संख्या में महिला-पुरुष शामिल थे। कई समूहों के आगे-आगे स्थानीय नेता चल रहे थे, जबकि पीछे युवक-युवतियां नाचते-गाते हुए आगे बढ़ रहे थे।
मेले में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और भारतीय आदिवासी संघ से जुड़े कार्यकर्ता अपने-अपने झंडों के साथ पहुंचे। हालांकि यह राजनीतिक उपस्थिति उत्सव के माहौल पर हावी नहीं हुई, लेकिन यह साफ दिखाई दिया कि भगौरिया जैसे बड़े सामाजिक आयोजनों में अब राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से भाग लेने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना था कि भगौरिया हमेशा से समाज का उत्सव रहा है, लेकिन अब इसमें जनसमूह अधिक होने के कारण राजनीतिक दल भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
मेले में लगीं दुकानें, झूले और फोटो स्टूडियो
उत्कृष्ट मैदान में मेले की रौनक बढ़ाने के लिए दर्जनों झूले लगाए गए थे। बच्चों के लिए छोटे-बड़े झूले, खिलौनों की दुकानें, रंगीन डंडे, चूड़ियां, बिंदियां और सजावटी सामान बिक रहा था। भगोरिया हाट (बाजार) में जरूरत की वस्तुएं, मिठाइयाँ और पारंपरिक आभूषण बिकते हैं। खाने-पीने की दुकानों पर भी काफी भीड़ रही। कुल्फी, पानी-पताशे, पकौड़ी, मिठाई, चाट और स्थानीय व्यंजन लोगों को आकर्षित कर रहे थे।
मेले में फोटो खिंचवाने का भी विशेष उत्साह दिखाई दिया। कई अस्थायी फोटो स्टूडियो लगाए गए थे, जहां युवक-युवतियां अलग-अलग पोज में तस्वीर खिंचवा रहे थे। मोबाइल कैमरे के साथ-साथ पारंपरिक फोटोग्राफी का आकर्षण भी बना रहा। पारंपरिक चांदी के गहनों और कढ़ाई वाले ब्लाउज के साथ युवा धूप का चश्मा और ब्रांडेड जूते पहनकर कैमरे के सामने पोज देते नजर आए।
शांतिपूर्ण रहा आयोजन, प्रशासन सतर्क

मेले में हजारों की भीड़ होने के बावजूद पूरा आयोजन शांतिपूर्ण रहा। पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे। मैदान के आसपास पुलिस बल तैनात रहा और यातायात व्यवस्था भी नियंत्रित रखी गई। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार मेले के दौरान किसी प्रकार की अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली। आदिवासी समाज के लोग अनुशासित तरीके से समूहों में आए और उत्सव में शामिल होकर शाम तक वापस लौट गए।
भगोरिया पर्व होली के सात दिन पहले से शुरू होकर होलिका दहन तक चलता है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी और खरगोन जिलों के विभिन्न गाँवों में साप्ताहिक बाजार के दिन आयोजित होता है। भगोरिया मेला आदिवासी संस्कृति, उमंग और जीवन को करीब से जानने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।
बदलते समय के साथ बदलता भगौरिया
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले भगौरिया में लोग बैलगाड़ियों से आते थे और केवल मांदल-ढोल की आवाज सुनाई देती थी। अब मोटरसाइकिल, मोबाइल और डीजे भी दिखाई देते हैं। पहले यह केवल सामाजिक मेल-मिलाप का पर्व था, अब इसमें बाजार, मनोरंजन और राजनीति भी जुड़ गई है।
इसके बावजूद भगौरिया की मूल भावना आज भी वही है — मिलना, नाचना, गाना और समुदाय के साथ खुशी बांटना।
झाबुआ के उत्कृष्ट मैदान में लगा इस वर्ष का भगौरिया मेला एक बार फिर यह साबित कर गया कि आदिवासी अंचल की परंपराएं आज भी जीवित हैं और बदलते समय के साथ नए रंगों को अपनाते हुए आगे बढ़ रही हैं।


