लुप्त होती कठपुतली कला को नई पीढ़ी से जोड़ने की पहल

वाराणसी में सात दिवसीय कठपुतली निर्माण कार्यशाला का आयोजन

वाराणसी, 29 मई। देश की प्राचीन लोककला ‘कठपुतली’ को बचाने और युवाओं से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए ‘क्रिएटिव पपेट थियेटर ट्रस्ट, वाराणसी’ द्वारा चौरामाता मंदिर प्रांगण में सात दिवसीय कठपुतली निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। 22 से 28 मई तक चली इस कार्यशाला में दर्जनों ग्रामीण बच्चों ने भाग लिया और अपनी कल्पनाशक्ति, कौशल और संवेदनशीलता के जरिए कठपुतली कला की बारीकियों को आत्मसात किया।

बदलते समय के साथ-साथ जब पारंपरिक लोक कलाएं जैसे कठपुतली लगभग हाशिये पर चली गई हैं, यह कार्यशाला न केवल एक कलात्मक प्रशिक्षण का माध्यम बनी, बल्कि लोक विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी साबित हुई। आयोजकों का मानना है कि जब तक युवा पीढ़ी लोक कलाओं से नहीं जुड़ती, तब तक इनका संरक्षण संभव नहीं है।

इस कार्यशाला की विशेषता यह रही कि सभी प्रतिभागी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए बच्चे थे। उन्होंने कठपुतली निर्माण की तकनीकी जानकारी के साथ-साथ अपने हाथों से कठपुतलियाँ बनाईं, संवाद तैयार किए, मंच सजाया और अंत में प्रस्तुति दी। इन प्रस्तुतियों में शिक्षा, बाल अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, भ्रूण हत्या और स्वच्छता जैसे विषयों को बाल-सुलभ लेकिन प्रभावी भाषा में प्रस्तुत किया गया।

कार्यशाला के दौरान बच्चों ने न केवल चरित्र निर्माण और संवाद लेखन सीखा, बल्कि समूहों में काम करते हुए सहयोग, नेतृत्व और रचनात्मकता का भी अभ्यास किया। उन्हें भारतीय लोककला पर आधारित वृत्तचित्र भी दिखाए गए, जिससे विषय के प्रति उनकी समझ और रुचि गहराई।

कार्यशाला समन्वयक श्री मिथिलेश दुबे ने बताया,  “हमारा उद्देश्य बच्चों को मंच देना ही नहीं, बल्कि उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संवैधानिक समझ और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। बच्चों ने बहुत कम समय में जिस तरह से जटिल विषयों को सहज रूप से प्रस्तुत किया, वह उनके उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करता है।”

समापन समारोह में दर्शकों को संविधान के मूलभूत अधिकारों और कर्तव्यों, पर्यावरण संरक्षण, बाल अधिकार, शिक्षा का अधिकार, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता अभियान, भ्रूण हत्या जैसी ज्वलंत सामाजिक समस्याओं पर आधारित कठपुतली नाटकों की झलक देखने को मिली। इन प्रस्तुतियों की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि वे बाल सुलभ भाषा में थीं, लेकिन उनमें विषय की गंभीरता और संदेश की गहराई भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही थी।

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समापन समारोह में स्थानीय नागरिक, अभिभावक, लोककला प्रेमी और शिक्षाविद बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने बच्चों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए इस प्रयास को एक सांस्कृतिक नवजागरण की संज्ञा दी।

वरिष्ठ लोककला विशेषज्ञ और अतिथि वक्ता ने कहा, “कठपुतली कला गांव-गांव में घूमकर कहानियां सुनाने की परंपरा का हिस्सा रही है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक चेतना और संवाद का माध्यम भी रही है। आज जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों में डूबे हैं, ऐसे में बच्चों को इस जीवंत परंपरा से जोड़ना अत्यंत सराहनीय है।”

कार्यशाला के अंत में प्रतिभागी बच्चों को प्रमाण पत्र और स्मृति-चिन्ह भेंट किए गए। बच्चों के माता-पिता ने इस पहल पर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि इस तरह की गतिविधियां बच्चों में आत्मविश्वास, रचनात्मकता और सामाजिक समझ बढ़ाती हैं।

यह कार्यशाला एक मिसाल है कि यदि सही सोच और सामूहिक प्रयास हो तो लुप्त होती लोककलाओं को फिर से जीवंत किया जा सकता है — और नई पीढ़ी न केवल इसका उत्तराधिकारी बन सकती है, बल्कि संवाहक भी।

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