खेती को खतरे में धकेलते व्यापार समझौते और कानून

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पिछले कुछ हफ्तों में भारत ने ‘यूरोपियन संघ’ और अमरीका के साथ दो अलग-अलग व्यापार समझौते किए हैं। इन दोनों समझौतों में ‘यूरोपियन संघ’ के 27 देशों और अमरीका के भारी-भरकम सब्सीडी वाले कृषि उत्पादों को भारत में खपाने की तजबीज प्रमुख है, लेकिन इससे हमारी छोटी जोत की, मंहगी लागत या बुनियादी जरूरतों तक से बेजार खेती और उसमें लगे किसानों का क्या होगा?


निलेश देसाई

 खेती केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का आधार रही है और इसकी धुरी रही है – बीज। हजारों वर्षों से किसानों ने बीजों को चुना, सहेजा और साझा किया, जिससे जैव-विविधता का एक विशाल भंडार निर्मित हुआ, लेकिन 21वीं सदी में यह परंपरा एक कानूनी जुर्म में बदलती दिख रही है। केन्या और कोलंबिया ने जो चेतावनियां दी थीं, वे अब भारत के ‘बीज विधेयक 2025,’ ‘यूरोपियन यूनियन’ और अमरीका के साथ हुए व्यापार समझौतों तथा कृषि के डिजिटल रूपांतरण के चलते भारत के सामने खड़ी हो गई हैं। क्या हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ अपनी ही जमीन पर, अपने ही पूर्वजों के बीज उगाना अवैध हो जाएगा? 

केन्या और कोलंबिया : बीज गुलामी के वैश्विक उदाहरण 

वर्ष 2012 में केन्या ने अपने ‘सीड्स एंड प्लांट वैरायटीज एक्ट’ में संशोधन किया। इस बदलाव के पीछे कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि ‘अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों’ का दबाव था। कानून ने प्रावधान किया कि बिना पंजीकरण और प्रमाणन के किसी भी बीज का आदान-प्रदान या बिक्री अपराध होगी, जिसके लिए 2 साल की जेल या भारी जुर्माने की व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप केन्या का छोटा किसान, जो सदियों से स्थानीय किस्मों पर निर्भर था, रातों-रात अपनी ही विरासत उगाने के अपराध में धर लिया गया। 

कोलंबिया में भी यही हुआ। अमेरिका के साथ ‘मुक्त व्यापार समझौते’ की शर्तों को पूरा करने के लिए सरकार ने ‘रेसोल्यूशन 970’ के तहत किसानों का अनाज जब्त कर उसे नष्ट कर दिया। इन दोनों देशों ने एक ही सबक दिया – जब बीज पर कानून का पहरा बैठता है, तो किसान की आजादी और देश की खाद्य संप्रभुता दोनों मर जाते हैं। 

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भारत का बीज विधेयक 2025′ : सुरक्षा या नियंत्रण? 

भारत में प्रस्तावित ‘बीज विधेयक 2025’ पुराने 1966 के कानून को बदलने की तैयारी में है। सरकार का तर्क है कि यह कानून बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा और किसानों की आय बढ़ाएगा। हालांकि, इसकी परतों को उधेड़ने पर कुछ गंभीर चिंताएं सामने आती हैं। मसलन – विधेयक में व्यावसायिक बीजों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है। यद्यपि किसानों को अपने उपयोग के लिए बीज बचाने की छूट है, लेकिन ‘व्यावसायिक बिक्री’ की परिभाषा इतनी जटिल हो सकती है कि छोटा किसान अपने पड़ोसी को बीज बेचने से पहले सौ बार सोचेगा। 

विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर ₹50,000 से लेकर ₹30 लाख तक के जुर्माने और जेल का प्रावधान है। यह कानून बड़ी बीज कंपनियों को ‘शिकायतकर्ता’ की भूमिका में लाकर छोटे किसानों को अदालतों में घसीटने का हथियार बन सकता है। 

‘भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026: बदलता समीकरण 

अभी, फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच हुए हालिया व्यापार अनुबंध ने भारतीय कृषि के लिए एक नया ‘अग्निपथ’ तैयार कर दिया है। अमेरिका का दबाव हमेशा से ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों’ को सख्त करने पर रहा है। 

इस अनुबंध से भारत के कुछ बड़े किसानों को अमेरिकी बाजार में पहुंच मिलेगी, लेकिन इसकी कीमत छोटे और मझोले किसानों को चुकानी पड़ सकती है। अमेरिका से आने वाले सस्ते और सब्सिडी वाले कृषि उत्पाद (जैसे मक्का, सोयाबीन और डेयरी उत्पाद) भारतीय किसानों की घरेलू कीमतों को गिरा सकते हैं। 

अमेरिका लंबे समय से भारत में ‘जीन संवर्धित’ (जीएम) बीजों के प्रवेश का रास्ता खोलने का दबाव बनाता रहा है। यदि इन अनुबंधों के प्रभाव में भारत अपनी नीतियों में ढील देता है, तो हमारे देशी बीजों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। भारत-अमरीका समझौते के करीब सालभर लटके रहने की वजह भी ‘जीएम’ उत्पादों को प्रवेश नहीं देने का यही विवाद था।   

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बजट और डिजिटलाइजेशन: एग्री-स्टैकका मायाजाल 

2026 के बजट में कृषि के डिजिटलाइजेशन और डिजिटल ‘एग्री-स्टैक’ के लिए अभूतपूर्व बजटीय आवंटन किया गया है। ‘एग्री स्टैक’ सरकार द्वारा स्थापित किया जा रहा ‘डिजिटल फॉउन्डेशन’ है जिसका उद्देश्य भारत में कृषि को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाना और डेटा तथा डिजिटल सेवाओं का उपयोग करके किसानों के लिए बेहतर परिणाम प्राप्त करना है। हर खेत का अपना ‘डिजिटल आईडी’ और हर फसल की ‘क्यूआर कोड’ सुनने में तो आधुनिक लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे खतरे को समझना जरूरी है।

जब किसान के खेत का पूरा डेटा (कौन सा बीज बोया गया, कितनी खाद डाली गई) डिजिटल सर्वर पर होगा, तो बड़ी बीज कंपनियां इस डेटा का उपयोग किसानों को लक्षित विज्ञापन देने या उन्हें अपनी विशेष किस्मों के जाल में फंसाने के लिए करेंगी। यदि ‘बीज विधेयक 2025’ में देशी बीजों पर कोई प्रतिबंध लगता है, तो ‘डिजिटलाइजेशन’ उस प्रतिबंध को लागू करने का सबसे प्रभावी हथियार बनेगा। ‘सैटेलाइट इमेजिंग’ और ‘डिजिटल रिकॉर्ड्स’ के जरिए यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि किस किसान ने ‘अपंजीकृत’ बीज बोए हैं। 

भारत – यूरोपीय संघ ‘मुक्त व्यापार समझौते’ की चुनौती 

अभी 27 जनवरी ’26 को हुए ‘मुक्त व्यापार समझौते’ में यदि भारत ‘यूरोपीय संघ’ के साथ व्यापार के लालच में ‘यूपीओवी’ (इंटरनेशनल यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ न्यू वैराइटीज ऑफ प्लॉन्ट्स) के मानकों को अपनाता है, तो हमारी ‘पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम (2001)’ की वह धारा (धारा 39) खत्म हो जाएगी जो किसानों को बीज बेचने का कानूनी अधिकार देती है। यह भारतीय कृषि के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है। 

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‘यूरोपीय संघ’ के साथ की व्यापार वार्ताओं में अक्सर ‘यूपीओवी’ की सदस्यता की शर्त रखी जाती है। केन्या ने यही गलती की थी।

बीज संप्रभुता की सुरक्षा ही समाधान  

केन्या और कोलंबिया के उदाहरण हमें जगाने के लिए हैं। भारत को अपनी नीतियों में कानूनी कवच लगाना होगा। ‘बीज विधेयक 2025’ में यह स्पष्ट और अपरिवर्तनीय प्रावधान होना चाहिए कि किसी भी स्थिति में किसान का बीज साझा करना ‘जुर्म’ नहीं माना जाएगा। सरकार को कॉर्पोरेट बीजों की बजाय ‘सामुदायिक बीज बैंकों’ को वित्तीय सहायता देनी चाहिए। किसानों के डेटा पर पहला अधिकार किसानों का होना चाहिए, न कि बड़ी कंपनियों का। कृषि विश्वविद्यालयों को हाइब्रिड के बजाय देशी बीजों की उत्पादकता सुधारने पर शोध करना चाहिए।

भारत के सामने आज जो परिदृश्य है, वह केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि संस्कृति और अस्तित्व का है। केन्या में जो हुआ, वह कानून की एक भूल थी; भारत में जो होने जा रहा है, वह एक सचेत निर्णय होगा। यदि हम व्यापारिक समझौतों और ‘डिजिटलाइजेशन’ की चमक में अपने ‘बीज’ खो देते हैं, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों की ‘खाद्य सुरक्षा’ को कॉर्पोरेट तिजोरियों में गिरवी रख देंगे। समय की मांग है कि हम ‘विकास’ की ऐसी परिभाषा चुनें जिसमें किसान के हाथ में हल भी हो और अपनी मिट्टी का आजाद बीज भी। क्योंकि, जिस देश का बीज गिरवी होता है, उस देश की थाली कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती। (सप्रेस)

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