समाचार

दिल्ली में पेयजल की गुणवत्ता गंभीर संकट के दायरे में : CAG ऑडिट रिपोर्ट का खुलासा

दिल्ली में पेयजल की गुणवत्ता गंभीर संकट के दायरे में : CAG ऑडिट रिपोर्ट का खुलासा

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) द्वारा त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई की मांग नई दिल्ली, 18 जनवरी । भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया ऑडिट रिपोर्ट, जिसे 7 जनवरी 2026 को दिल्ली विधानसभा में प्रस्तुत किया गया, ने दिल्ली...

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) द्वारा त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई की मांग

नई दिल्ली, 18 जनवरी । भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया ऑडिट रिपोर्ट, जिसे 7 जनवरी 2026 को दिल्ली विधानसभा में प्रस्तुत किया गया, ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) द्वारा आपूर्ति किए जा रहे पेयजल की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ उजागर की हैं। रिपोर्ट के निष्कर्ष दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य के संदर्भ में बड़े जोखिमों की ओर इशारा करते हैं।

ऑडिट रपट में उल्लिखित सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भूजल के आधे से अधिक नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। CAG के अनुसार, जाँच किए गए 16, 234 भूजल नमूनों में से 8, 933 नमूने (लगभग 55 प्रतिशत) पेयजल मानकों पर खरे नहीं उतरे। ऑडिट अवधि के दौरान असफल नमूनों का अनुपात अलग-अलग वर्षों में 49 प्रतिशत से लेकर 63 प्रतिशत तक रहा।

CAG रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिल्ली की अनुमानित कुल जल आवश्यकता 1,680 मिलियन यूनिट है, जबकि राज्य लगभग 25 प्रतिशत की लगातार कमी से जूझ रहा है। और भी गंभीर बात यह है कि जल गुणवत्ता परीक्षण अत्यंत अपर्याप्त होने के कारण आपूर्ति किए जा रहे पानी की गुणवत्ता बड़े पैमाने पर अज्ञात बनी हुई है। दिल्ली जल बोर्ड की प्रयोगशालाओं में कर्मचारियों और उपकरणों की भारी कमी है। नतीजतन पानी की जाँच BIS मानकों के अनुसार हो ही नहीं रही थी।

कैग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि “जिन क्षेत्रों में भूजल के नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए, वहाँ से जल-आपूर्ति इस घटिया पानी का उपभोग करने के लिए जनता को मजबूर कर रहा है,  जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।”

See also  विशाखापत्तनम और सूरत हादसों ने उठाए श्रमिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल

ऑडिट में यह भी सामने आया है कि पाँच वर्ष की ऑडिट अवधि के दौरान प्रतिदिन 80–90 मिलियन गैलन (MGD) कच्चा, बिना उपचारित पानी बोरवेल और रैनी वेल्स से सीधे भूमिगत जलाशयों में और कुछ मामलों में सीधे उपभोक्ताओं को आपूर्ति किया गया। बिना उपचारित पानी की यह सीधी आपूर्ति पेयजल सुरक्षा को गंभीर रूप से कमजोर करती है।

रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि जल गुणवत्ता निगरानी की व्यवस्था स्वयं ही कमजोर है, क्योंकि जल शोधन संयंत्रों, जलाशयों, जल आपात इकाइयों और बोरवेलों पर फ्लो मीटर स्थापित नहीं हैं। इसके कारण DJB उपचारित, परिवाहित और आपूर्ति किए गए पानी की मात्रा और गुणवत्ता का सही आकलन नहीं कर पा रहा है। यह स्थिति जलजनित रोगों की रोकथाम से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कैग (CAG) के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड की प्रयोगशालाएँ कर्मचारियों और उपकरणों की कमी के साथ संचालित हो रही थीं और जल नमूनों की जाँच केवल 12 मानकों पर की जा रही थी, जबकि BIS पेयजल मानक (BIS 10500:2012) के तहत 43 मानकों पर परीक्षण अनिवार्य है। आर्सेनिक और सीसा जैसी भारी धातुओं, विषैले पदार्थों, रेडियोधर्मी तत्वों तथा जैविक और विषाणुजन्य मानकों की जाँच नहीं की गई।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि निजी तौर पर संचालित जल शोधन और पुनर्चक्रण संयंत्रों में प्रतिबंधित और कैंसरकारी पॉलीइलेक्ट्रोलाइट्स का उपयोग जारी रहा, जबकि इनके उपयोग पर स्पष्ट निर्देशों के तहत प्रतिबंध है। CAG ने चेतावनी दी है कि पेयजल में रेडियोधर्मी पदार्थों और भारी धातुओं की मौजूदगी घातक हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को महत्वपूर्ण अंगों के  नुकसान समेत एनीमिया और कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं। इन परीक्षणों को न करना दिल्ली निवासियों के सामने गंभीर और दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम खड़ा करता है।

See also  खेती से खत्म होता पानी : उरुग्वे का उदाहरण काफी है

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) की ओर से मित्ररंजन और ऋतु प्रिया ने इस मामले में जवाबदेही तय करने और त्वरित सुधारों की मांग की है। JSA इंडिया ने दिल्ली सरकार, दिल्ली जल बोर्ड और संबंधित नियामक प्राधिकरणों से निम्नलिखित कदम उठाने का आह्वान किया है:

  • बिना उपचारित भूजल की आपूर्ति तुरंत बंद की जाए
  • BIS पेयजल मानकों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए
  • जल परीक्षण प्रयोगशालाओं को आवश्यक उपकरणों से लैस करते हुए उन्नत किया
  • जाए और पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की जाए
  • सभी स्वास्थ्य-संवेद शील मानकों पर व्यापक जल परीक्षण किया जाए
  • जल गुणवत्ता की जाँच हर 15 दिन में अनिवार्य रूप से की जाए
  • सभी जल गुणवत्ता आँकड़ों को पारदर्शिता के  साथ सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य की लंबे समय से उपेक्षा के लिए जवाबदेही तय की जाए
  • सुरक्षित पेयजल तक पहुँच एक मौलिक अधिकार है। इसे सुनिश्चित करने में निरंतर संस्थागत विफलता सार्वजनिक विश्वास और सार्वजनिक स्वास्थ्य दायित्व का गंभीर उल्लंघन है।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख