एक संस्मरण: बयालीस साल पहले
हाल ही में 29 अगस्त को “गांधी” फिल्म के निर्देशक एटनबरो की पुण्यतिथि थी। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें याद करते हुए “गांधी” फिल्म की श्रेष्ठता का वर्णन किया है। तानाशाही के विरोध में महात्मा गांधी के सिद्धांत, विचार और कार्यशैली आज भी मौजूं हैं।आज अपने देश में उन्हें अधिक प्रभावी और व्यापक रूप में प्रसारित किए जाने की जरूरत है।
रवींद्र शुक्ला
बयालीस साल पहले की यानी फरवरी 1983 की बात है। मैं पत्रकारिता के एक अंतर्राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के लिए में मनीला (फिलीपींस) गया था। उन्ही दिनों वहां अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव आयोजित हुआ था। उसमें ‘गांधी’ फिल्म भी प्रमुख फिल्म के रूप में दिखाई गई। बहुत धूम थी इस फिल्म की। मनीला में जगह जगह पोस्टर लगे थे। अखबारों ढेरों लेख व समीक्षाएं छ्प रहीं थीं।
मैने और वहा॔ मेरे मित्र गोविन्दन वेंकटरमानी (चेन्नई के प्रसिद्ध अखबार ‘द हिन्दू’ के साप्ताहिक कृषि स्तंभ के प्रभारी पत्रकार) ने तय किया कि हम फिल्म देखेंगे। पाठ्यक्रम में बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड आदि देशों आए हमारे कुछ अन्य साथी भी यह फिल्म देखना चाह रहे थे। किंतु उसकी टिकट पा लेना मुश्किल था। तब इंटरनेट से टिकट बुकिंग का जमाना नहीं था। टिकट खिडकी पर जाकर ही टिकट लाना पड़ता।

उस समय फिलीपींस में राष्ट्रपति थे – फर्डिनांड मार्कोस, जो खुद वहां एक तानाशाह के रूप में कुख्यात हो चुके थे । वे 1965 में फिलीपींस के राष्ट्रपति बने थे। उनका कार्यकाल जब 1971 में समाप्त होने वाला था, उसके ठीक पहले उन्होंने देश में “मार्शल ला” लगाकर पूरी सत्ता अपने हाथों मे केन्द्रित कर ली थी। उसी दौरान उनकी पत्नी इमेल्दा मार्कोस मंत्री थीं, जो वहां के कुख्यात गिरोह “कू क्लक्स क्लान” की सरपरस्त मानी जातीं थीं।
फिलीपींस की जनता मे मार्कोस दंपत्ति की दमनकारी रीति नीति, परिवारवाद और लूट खसोट के खिलाफ गहरी नाराजी थी। हम मनीला के मध्य में घनी बस्ती वाले ‘सांता मेसा’ इलाके में स्थित कम्यूनिकेशन फाउंडेशन आफ एशिया (सीएफए) में रह रहे थे। वही हमारा निवास-सह- प्रशिक्षण केन्द्र था। वहां हमें मार्कोस के खिलाफ जन आक्रोश सहज ही देखने को मिलता था। उस समय मार्कोस प्रशासन ने खूब कोशिश की थी कि “गांधी” फिल्म का प्रदर्शन फिल्म फेस्टिवल में नहीं हो पाए। किन्तु उसे सफलता नहीं मिली थी।
इस फिल्म को देखने के लिए फिलीपींस में इतनी ज्यादा भीड़ उमड़ रही थी कि हर शो फुल थे। हमें हमारे प्रशिक्षण सत्रों के समय से इतर या यों खाली समय वाले शो के टिकट नहीं मिले। वेंकटरमानी ने मनीला स्थित भारतीय राजदूतावास से संपर्क किया। किंतु उसने भी अपनी असमर्थता जता दी। कोशिश करते-करते हफ्ता भर बीत गया और फिल्मोत्सव समाप्त हो गया। हम मनीला में ‘गांधी’ फिल्म नहीं देख पाए। मैंने इस वाकये पर एक छोटा सा लेख लिखा और उसे वही से भारत आने वाले यात्री के माध्यम से दिल्ली भेजा जिन्होंने उसे डाक से नईदुनिया इंदौर को भेज दिया। वह लेख नईदुनिया के फरवरी 1983 के एक रविवारीय संस्करण में छपा।
हमने “गांधी” फिल्म बाद में तब देखी, जब वह भारत में रिलीज हुई। तब स्पष्ट हो गया कि फिलीपींस की जनता में उसके प्रति जबर्दस्त रुझान क्यों था। आखिर वह भी तो तानाशाही और अन्याय के खिलाफ संघर्षरत थी। उसे “गांधी” के विचारों और कार्यशैली समझना की चाहत रही होगी।
कुछ ही अरसे बाद खबरें आईं कि फिलीपींस में राष्ट्रपति फर्डिनांड मार्कोस के शासन का पतन हो गया। प्रजातंत्र समर्थक जन शक्ति क्रांति “एडसा” ने उन्हें अपदस्थ कर दिया। वे भागकर अमेरिका चले गए और उन्होंने वहीं निर्वासित रहकर शेष जिदगी बिताई।
वहीं हवाई द्वीप में 1989 में उनकी मृत्यु हुई। उनका शव भी फिलीपींस नहीं आने दिया गया। उसे हवाई द्वीप में दफन किया गया। बाद में उनके परिवारजनों ने फर्डिनांड मार्कोस के अवशेष फिलीपींस लाने के लिए लंबी अदालती लडी। बाद की सरकारों ने फर्डिनांड मार्कोस के खिलाफ जन आक्रोश को देखते हुए उनके अवशेष फिलीपींस नहीं आने दिए। अंत में 2016 में एक समझौता हुआ जिसके तहत फर्डिनांड मार्कोस के अवशेष अमेरिका के हवाई द्वीप से लाकार राजधानी मनीला के बाहर दफन किये गए। तब भी वहां उन्हें वह राजकीय सम्मान नहीं दिया गया, जो एक पूर्व राष्ट्रपति को दिवंगत होने पर दिया जाता है।


