‘एकता परिषद’ के अध्यक्ष डॉ. रनसिंह परमार का यूं अचानक हम सबसे सदा के लिए विदा होना, हालांकि एक बार फिर जीवन की क्षणभंगुरता को ही उजागर करता है, लेकिन थोड़े धीरज से देखें तो उनकी कमी कई जगहों पर, कई तरह से महसूस की जाती रहेगी। वे अनेक संस्थाओं, संगठनों, औपचारिक-अनौपचारिक समूहों और अनेक संगी-साथियों के जीवन में गहराई से जुड़े रहे थे।
जयन्त सिंह तोमर
लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने बागियों के आत्मसमर्पण के लिए चंबल क्षेत्र के जौरा को ही क्यों चुना, इसकी पृष्ठभूमि में जब हम जाते हैं तो डॉ. रनसिंह परमार जैसे कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ताओं का महत्व हमें समझ में आने लगता है। गत 13 मार्च को 72 वर्ष की आयु में रनसिंह जी ने रायपुर में तिल्दा के पास ‘प्रयोग आश्रम’ में आखिरी सांस ली। निधन से थोड़ी देर पहले उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि समाज के अंदर छिपी जो ढांचागत हिंसा, शोषण, दमन और अत्याचार है उसे समाप्त करने के लिए अभियान चलाने का समय आ गया है।
स्वतंत्र भारत में डॉ.एसएन सुब्बराव और राजगोपाल पीवी जैसे गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता यदि शांति और राष्ट्रीय एकता की दिशा में अनगिनत शिविर व पदयात्राएं करने में सफल रहे तो उसकी बुनियाद में रनसिंह परमार जैसे निष्ठावान कार्यकर्ता ही रहे। एक तरह से वे सदैव सुब्बरावजी और राजाजी के ‘प्रथम सत्याग्रही’ रहे। अप्रैल 1972 में जब जेपी की अगुवाई में सैकड़ों बागियों ने महात्मा गांधी के चित्र के सामने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया तब रनसिंह जी बीस साल के थे और सुब्बरावजी के साथ गांव – गांव में श्रमदान करते हुए रास्ते, पुलिया आदि बनाते जाते थे और उनके गीत के सुर में सुर मिलाते – ‘नौजवान आओ रे.. नौजवान गाओ रे,’ या फिर ‘हम करें राष्ट्र निर्माण बनाएं मिट्टी से अब सोना।’
साल 1969 में महात्मा गांधी की जन्मशताब्दी पर साल भर चलाई गई ‘सद्भावना रेलयात्रा’ के निदेशक के रूप में सुब्बरावजी को जो धनराशि मिली थी उससे उन्होंने चंबल के जौरा कस्बे में ‘महात्मा गांधी सेवाश्रम’ की नींव डाली थी। यहां पीपल, इमली, सेमल जैसे कुछ पुराने पेड़ थे और पटियों की छत वाला छोटे कमरों का आवास। श्रमदान सहित अनेक अभियानों की रूपरेखा यहीं बनती। परशुरामसिंह सिकरवार और रनसिंह परमार जैसे अनेक नौजवानों ने यहीं युवा शिविर किए और गीत गाते हुए गैंती- फावड़े से मिट्टी खोदी, रास्ते – पुलिया और खरंजे बनाये। दस्यु समस्या से ग्रस्त अंचल में श्रम की गरिमा और शांति – अहिंसा का यह एक अनूठा अभियान था। हालांकि तब भी सूरज ढलने से पहले चौखट के सरदल में मोटी, गोल लकड़ी फंसाकर दरवाजे बंद कर लिए जाते थे, क्योंकि बागी – समस्या चरम पर थी। वे कभी भी किसी को पकड़कर ले जा सकते थे और बदले में फिरौती मांग सकते थे।
जेपी शायद जौरा क्षेत्र को बागियों के आत्मसमर्पण के लिए नहीं चुनते, अगर सुब्बरावजी ने श्रमदान के माध्यम से अनगिनत शांति सैनिक और कार्यकर्ता तैयार न किए होते। जेपी तो अप्रैल 1972 में केवल दो दिन यहां रहे। बागियों के समर्पण से पहले के तमाम काम और समर्पण के बाद का फालो- अप तो यहां के अनाम कार्यकर्ताओं की वजह से ही सम्भव हुआ। बागी समर्पण के दस्तावेज, रपट, रिपोर्ताज और लिपिबद्ध इतिहास में तो राजगोपाल पीवी का नाम भी कहीं नहीं दिखता, जबकि वे आगंतुकों की मेजबानी करने, चिठ्ठी लिखने और विदाई के समय पेठे का डिब्बा सबके थैलों में रखने के काम में व्यस्त रहते थे। ऐसे न जाने कितने कार्यकर्ता थे। रनसिंहजी बहुत बाद में इसलिए पहचाने गए कि आश्रम के प्रबंध का भार उन पर आया और सुब्बरावजी और राजगोपालजी के प्रत्येक अभियान के पिछले चालीस साल तक समानांतर क्रियान्वयन की वे धुरी रहे।
रनसिंहजी चंबल नदी के किनारे मृगपुरा गांव में साल 1954 में एक किसान परिवार में जन्मे थे। देश जब आपातकाल के दौर से गुजरा और उबरा तब रनसिंह कृषि विज्ञान में चने की उन्नत खेती को लेकर अपनी पीएचडी के तहत अनुसंधान कर रहे थे। यह वही समय है जब सुब्बरावजी आगरा जिले में यमुना नदी के किनारे बटेश्वर और राजस्थान में धौलपुर के तालाबशाही में बागी – समूहों से आत्मसमर्पण करा रहे थे। देश में आपातकाल लगा था। उसकी गहमागहमी में बागी समर्पण की इन घटनाओं को उतना स्थान नहीं मिल पाया जितना मिलना चाहिए था।
सुब्बरावजी ने रनसिंह को चेताया था कि देश की गरीबी प्रयोगशाला में बैठने से उतनी जल्दी खत्म नहीं होगी, जितनी कि सामाजिक क्षेत्र में आने से। उस दिन के बाद रनसिंह परमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे अंतिम समय तक सुब्बरावजी और राजगोपालजी की छाया बन कर रहे। सैकड़ों युवा शिविर और पदयात्राओं से उन्हें इतना अनुभव मिला कि लाख-लाख पदयात्रियों को भी वे शांतिपूर्वक, पंक्तिबद्ध और व्यवस्थित ढंग से सैकड़ों मील तक ले जा सकते थे। रनसिंह को पता होता था कि कितने बड़े मैदान में कितने लोग बन सकते हैं, कितने कदम चलने पर कितने मील होते हैं और किसी जगह पर कितने लोग खड़े हो सकते हैं, कितने बैठ सकते हैं।
पदयात्रा की योजना बनाते समय रनसिंहजी को पता होता था कि कितनी दूर पड़ाव रहेगा, शिविर कैसे होंगे, सबके नहाने-धोने का इंतजाम कैसे होगा, भोजन और पानी की व्यवस्था कैसी रहेगी, सड़क पर यातायात और आवागमन प्रभावित न हो उसके लिए क्या करना होगा और किसी को कोई तकलीफ़ हो तो दवा कहां मिलेगी। ऐसी ढेरों बातें और उनका माकूल इंतजाम।

सुब्बरावजी के प्रति उनके मन में गहरी आस्था थी और राजगोपालजी का रनसिंहजी के प्रति वैसा ही गहरा प्रेम। ‘जौरा आश्रम’ में सुब्बरावजी की स्मृति में संग्रहालय, स्मारक, प्रतिमा आदि रनसिंहजी के ही प्रयासों का फल है। दिल्ली में ‘गांधी शांति प्रतिष्ठान’ के जिस कक्ष में सुब्बरावजी रहते थे वहां उन्हें मिले स्मृति- चिह्न भी थे जिन्हें सुब्बरावजी के देहांत के बाद ‘जौरा आश्रम’ लाकर संग्रहालय बनाकर रखा गया। सुब्बरावजी द्वारा स्थापित ‘राष्ट्रीय युवा योजना’ के भी बाद में रनसिंहजी सचिव बने।
‘एकता परिषद’ की स्थापना राजगोपालजी ने ठीक उस समय की थी जब दुनिया में वैश्वीकरण – निजीकरण और उदारवाद की शुरुआत हुई थी। लगभग तीस साल बाद जब राजगोपालजी ने इस संगठन के अध्यक्ष पद से अवकाश लिया तब इसकी जिम्मेदारी रनसिंहजी को ही सौंपी गई। राजगोपालजी का दुनिया भर के महत्वपूर्ण जनसंगठनों, संस्थाओं और व्यक्तियों से जो जीवंत संपर्क है उसे बनाए रखना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन रनसिंहजी ने खुद को समय के अनुसार तैयार किया। वे केवल प्रबंधक भर नहीं थे। शांति – सत्याग्रह – संघर्ष और रचना के विचारक के रूप में भी उन्होंने अपना अलग स्थान बनाया। ‘जौरा आश्रम’ में शहद, खादी, कच्ची घानी के सरसों तेल, साबुन, गमछे आदि की इकाई उनकी देखरेख में विकसित हुईं। हजारों लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा और देशभर में घूम-घूमकर सत्याग्रही भी तैयार किए।
‘जनादेश,’ ‘जनसंवाद,’ ‘जन-सत्याग्रह,’ ‘जनांदोलन,’ ‘भूमि – अधिकार यात्रा’ से लेकर ‘जय – जगत यात्रा’ जैसे अनेक बड़े अभियानों को उसके विचारों के अनुसार क्रियान्वित करने में रनसिंहजी और उनके साथियों की भूमिका सदैव स्मरणीय है। ‘जय – जगत’ यात्रा तो एक तरह से पूरी पृथ्वी की ही यात्रा थी। कोविड महामारी के कारण उसे आधे रास्ते में छोड़ना पड़ा, लेकिन यह अधूरी यात्रा भी दुनिया भर के वंचित आदिवासियों और पर्यावरण प्रेमियों के समर्थन में शुरू की गई यात्राओं के इतिहास में एक मील का पत्थर है जिसने जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को मुखरता से उठाया।
इन पंक्तियों के लेखक को रनसिंहजी ने लगभग हर बैठक, सम्मेलन और अभियानों का महत्वपूर्ण सहभागी बनाया और अनेक अवसरों पर मंच पर सम्मान के साथ बिठाया। कुछ अवसर ऐसे आये जब मैंने अपनी असहमति को ऐसे ढ़ंग से व्यक्त किया जो शालीनता और मर्यादा की परिधि का अतिक्रमण करती थी, लेकिन रनसिंह जी ने हमेशा सहनशीलता का परिचय दिया और ऐसे खट्टे-मीठे अवसरों के बाद भी हमेशा प्रेम और आदर से बुलाया। मेरी स्मृति में ऐसी कोई सुबह नहीं है जब रनसिंहजी तरोताजा, स्वच्छ और मुस्कुराते हुए न दिखे हों। संस्था और संगठन के कठिन दिनों में उन्होंने रेल के साधारण दर्जें में यात्रा करने का निर्णय लिया था।
आज मृगपुरा के लोग भलीभांति समझ रहे होंगे कि ‘कस्तूरी कुंडलि बसै मृग ढूंढ़ै बन माहि।’ अभियान कैसा भी हो, व्यवस्था और अनुशासन की जरूरत तो हर जगह रहती है। अंतर केवल इतना होता है कि नेपोलियन बोनापार्ट जैसे सेनानायक यदि अपने अंतिम समय की नीम – बेहोशी में सैनिकों और हरावलदस्तों को आवाज लगाते हैं तो रनसिंह परमार जैसे नायक ऐसी ही स्थिति में कहते होंगे – ‘सत्याग्रहियो. . मारेंगे नहीं, मानेंगे नहीं, दुनिया में शांति के लिए आगे बढ़ो।’ (सप्रेस)


