आजादी पर्व : क्‍या बोल के लब आजाद है तेरे?

संध्‍या राजपुरोहित

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक महिलाओं ने साहस, त्याग और नेतृत्व से देश का गौरव बढ़ाया है। रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू से लेकर निर्मला सीतारमण और पीवी सिंधु तक, स्त्रियों ने हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी। फिर भी घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक असमानता और निर्णयों से वंचित रहना आज भी सशक्त भारत की अधूरी कहानी कहता है।

संध्‍या राजपुरोहित

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीर नारियों ने विभिन्न रूपों में अपना अमूल्य योगदान दिया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता की रक्षा के लिए वीरता से तलवार उठाई, सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों की शिक्षा की मशाल जलाकर समाज में जागृति फैलायी। इनके साथ ही बिगम हजरत महल ने 1857 के संग्राम में अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दी, कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और महिला जागरण में अग्रणी भूमिका निभाई, एनी बेसेंट ने होमरूल आंदोलन से स्वतंत्रता की अलख जगाई, सरोजिनी नायडू ने ‘भारत कोकिला’ बनकर जन-जन में उत्साह भरा, और मातंगिनी हाज़रा, दुर्गावती देवी, कल्पना दत्त, अरुणा आसफ़ अली जैसी अनेक नारियों ने साहस, त्याग और संघर्ष से इतिहास रचा।

आज हम 21वीं सदी में हैं, विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष तक पहुँच चुके हैं। हमारे देश की महिलाएँ आज मंत्रालय से लेकर मिसाइल डिज़ाइन में जुटी हैं और अंतर्राष्ट्रीय खेलों में पदक जीत रही हैं। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, ‘मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया’ कही जाने वाली वैज्ञानिक डॉ. टेसी थॉमस, खेल की दुनिया में चमकती मिताली राज, पीवी सिंधु,दिव्या देशमुख  और मैरी कॉम जैसी महिलाएं इस बात की मिसाल हैं कि जब स्त्री को अवसर दिया जाता है, तो वह केवल स्वयं नहीं, पूरे राष्ट्र को नई दिशा दे सकती है।

आजादी के 78 वर्षों के बाद भी वर्तमान भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति विरोधाभासों से भरी है। एक ओर महिलाओं को घरेलू हिंसा, यौन शोषण, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक नियंत्रण का शिकार होना पड़ रहा है। ऐसे में हम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2020-21) को देखे तो पाएंगे कि वर्ष 15-49 आयु वर्ग की महिलाओं में 33% ने घरेलू हिंसा का अनुभव किया है। केवल 42% महिलाओं को अपने स्वास्थ्य से संबंधित निर्णय लेने की स्वतंत्रता है। लगभग 63% महिलाएं ही बैंक खातों का स्वतंत्र उपयोग कर पाती हैं। आर्थिक स्वतंत्रता की बात करें तो अधिकतर महिलाएं अपने खातों का प्रयोग भी पति या घर के किसी पुरुष सदस्य की अनुमति से करती हैं। यह आंकड़े उस सामाजिक असमानता का दर्पण हैं। ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि आधी आबादी को आज़ादी मिलने की कल्पना अभी अधूरी है।

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समाज की बुनियादी इकाई ‘परिवार’ में भी ग्रामीण हो या शहरी महिलाओं की आवाज़ कमजोर है। बेटी से उसकी शिक्षा या करियर का चुनाव पूछे बिना कर लिया जाता है। बहू को “घर की इज्ज़त” के नाम पर मौन धारण करने की शिक्षा दी जाती है, और मां को त्याग और समर्पण की मूर्ति मानकर उसकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। निर्णयों में महिलाएं अब भी हाशिए पर हैं, चाहे वह घर का वित्तीय प्रबंधन हो, बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा फैसला, या खुद की चिकित्सा से जुड़ा निर्णय।

भारत के अधिकांश गाँवों में महिला सरपंच केवल नाम मात्र की होती हैं। निर्णय अक्सर उनके पति या पुरुष परिजन लेते हैं। पंचायत की बैठकों में वे उपस्थित तो रहती हैं, लेकिन पर्दे या घूंघट के पीछे। उन्हें यह तक नहीं बताया जाता कि किन मुद्दों पर चर्चा हो रही है। कि वहाँ क्या निर्णय लिए गए। उन्हें पता ही नहीं होता सशक्तिकरण के इस खोखले ढाँचे में उनकी आवाज़ कहीं दब जाती है। यह चुप्पी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है — संस्कारों के नाम पर, मर्यादा के नाम पर और परिवार की इज्ज़त के नाम पर। यही चुप्पी धीरे-धीरे एक सामाजिक रीत बन जाती है — जिसमें स्त्री के बोलने को विद्रोह माना जाता है और चुप्पी को ‘सहनशीलता’। 

रेड लाइट इलाकों में रहने वाली महिलाओं की स्थिति तो और भी भयावह है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग आठ लाख महिलाएं वेश्यावृत्ति में संलग्न हैं। इनमें से अधिकांश महिलाएं बाल विवाह, गरीबी, घरेलू हिंसा या मानव तस्करी के चलते इस दलदल में फंसी हैं। इनका जीवन एक ऐसी चुप्पी में बीतता है, जिसे समाज ने ‘चरित्रहीनता’ के लिबास में छुपा दिया है।

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NACO के डाटा को देखे तो अधिकांश महिलाएं गरीबी, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, मानव तस्करी या छलावे का शिकार होकर इस दलदल में फंसी हैं। 2019 में मानव तस्करी से जुड़े मामलों में 90% से अधिक पीड़ित महिलाएँ और किशोरियाँ थीं। रेड लाइट एरिया की अधिकतर लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। एक अध्ययन के अनुसार, केवल 10% बच्चियाँ ही हाई स्कूल तक की पढ़ाई पूरी कर पाती हैं।

क्या ये महिलाएं अपनी मर्ज़ी से यहाँ आई हैं? वे शोषण की मारी हुई, मानव गरिमा से वंचित स्त्रियाँ हैं, इनकी स्थिति उन तमाम कानूनों और नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाती है जो महिला कल्याण के नाम पर बने हैं लेकिन प्रभाव ज़मीनी स्तर पर नहीं दिखता। शहरों की महिलाएं भी पूरी तरह आज़ाद नहीं हैं। एक ओर तो वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर हैं, लेकिन दूसरी ओर कार्यस्थल पर उत्पीड़न, कम वेतन और अवसरों में भेदभाव का सामना कर रही हैं। कई बार उनकी प्रगति को चरित्र से जोड़कर देखा जाता है।

वहीं आदिवासी महिलाओं की, जिनकी उपेक्षा दोहरी है, वे महिला भी हैं और आदिवासी भी। ये महिलाएं जंगल, खेती और जल से जुड़ी हैं। वे अपने समाज की रीढ़ हैं, पर उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों की स्थिति चिंताजनक है। भारत की कुल आबादी का लगभग 8.6% हिस्सा आदिवासी समुदायों का है, जिसमें आधे से अधिक महिलाएं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, आदिवासी महिलाओं की साक्षरता दर केवल 49.35% है, जो राष्ट्रीय महिला औसत 70.3% से काफी कम है। NFHS-5 के अनुसार, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हर चार में से एक लड़की की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है। बाल विवाह, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता और सामाजिक निर्णयों में सहभागिता की कमी — ये सभी उनके जीवन को कठिन बना देते हैं।

जब आदिवासी महिलाएं अपने अधिकारों की बात करती हैं, तो उन्हें उग्रवादी, पिछड़ी या विद्रोही समझा जाता है। उन्हें स्थानीय फैसलों में केवल सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया जाता है, वास्तविक भागीदारी से दूर रखा जाता है। जब तक हम आदिवासी अंचलों की बेटियों को पढ़ने, बोलने और नेतृत्व करने का अवसर नहीं देंगे, तब तक समावेशी सशक्तिकरण अधूरा रहेगा।

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आज जरूरत है एक ऐसी सोच की, जो नारी की चुप्पी को नहीं, उसकी आवाज़ को महत्व दे। एक ऐसी व्यवस्था की, जो कानून और नीतियों को कागज़ से ज़मीन पर लाए। एक ऐसा वातावरण, जहाँ लड़की को बोलने से पहले सौ बार न सोचना पड़े, जहाँ रेड लाइट इलाके की महिला को भी पुनर्वास की संभावना दिखे, और जहाँ आदिवासी अंचल की बेटी को भी यह महसूस हो कि उसका भी एक नाम, एक पहचान, और एक हक़ है। जब कोई स्त्री बोलती है, वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन तमाम स्त्रियों की ओर से बोलती है जो अब भी चुप हैं। वह अपनी चुप्पी ही नहीं, पीढ़ियों की चुप्पी तोड़ती है। जब कोई बेटी दहेज के खिलाफ खड़ी होती है, जब कोई बहू घरेलू हिंसा के विरुद्ध बोलती है, जब कोई आदिवासी महिला वनाधिकार की मांग करती है — तो यह केवल विरोध नहीं, यह सामाजिक चेतना की नई शुरुआत है।

लेकिन बोलना भी साहस मांगता है — और यह साहस तब आता है जब वातावरण सहयोगी हो, जब परिवारों में बेटियों को प्रश्न पूछने की आज़ादी दी जाए, स्कूलों में नेतृत्व की भूमिका सौंपी जाए, पंचायतों में उनकी भागीदारी को औपचारिकता नहीं बल्कि अधिकार माना जाए। जब हर स्त्री— चाहे वह शहर की हो या गाँव की, पढ़ी-लिखी हो या अशिक्षित, वंचित हो या अवसर प्राप्त— बिना डर, संकोच या तिरस्कार के अपनी बात कह सकेगी, तब ही भारत वास्तव में सशक्त कहलाएगा। तब यह पंक्ति केवल कविता नहीं, एक सामाजिक क्रांति का उद्घोष बन जाएगी – “बोल के लब आज़ाद हैं तेरे…”

संध्‍या राजपुरोहित 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्‍चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा के कार्य से सम्‍बद्ध है।

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