पर्यावरण का जो संकट अब ठेठ हमारी देहरी तक पहुंच गया है और जिसे लेकर सालाना कर्मकांड की तरह कई दिवस भी मना लेते हैं, क्या वह हमारे ही जीवन-यापन के धतकरमों का नतीजा नहीं है? मसलन, दिनों-दिन बढ़ता-फैलता कचरे का पहाड़ किसी आसमानी-सुल्तानी शह की करामात तो नहीं है ! क्या हमें अपनी इस आत्महंता बेहूदगी को समझना और उसे निपटाना जरूरी नहीं लगता?
संदीप जोशी
जनता सत्ता के राष्ट्रवाद में सराबोर है, लेकिन क्या वह उतना ही समाज में किए जाने वाले रचनात्मक कार्यों के प्रति भी सजग है? समाज ने अपने रचनात्मक कार्य भी सत्ता के भरोसे छोड़ दिए हैं। आज हमारा धर्म, हमारा व्यवहार व व्यापार और हमारे पर्यावरण तक को सत्ता ही परिभाषित कर रही है। यहां तक कि हम अपने हर विचार व व्यवहार के लिए सत्तानीति पर आश्रित हैं। ‘डबल इंजन’ सरकार का सिंगल अजेंडा यही है कि सत्ता कायम कैसे रखी जाए। क्यों हर साल एक बार ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाकर साल भर प्रकृति के साथ सहजीवन का तिरस्कार होता रहता है?
इस साल भी यही हुआ। समाज में विकास की तेज रफ्तार के लिए जनता द्वारा किए जाने वाले रचनात्मक कार्यक्रमों को फिर भुलाया गया। सत्ता तेज रफ्तार के विकास का स्वांग तो जनता को भरमाने या हैरान करने के लिए रचती है। आज हर तरफ मंडराते युद्ध के कारण जो जीवन, धन व वन का क्षय हो रहा है उसमें सत्ता के कुछ सिरफिरों के लिए हमारा पर्यावरण नगण्य हो गया है और हमने भी पर्यावरण के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भुला दिया है। हम भी तेज विकास की रफ्तार में अपनी गाड़ी को दौड़ाते हुए पर्यावरण की अनदेखी और उत्तरदायित्व की नासमझी कर रहे हैं। उसे ही विकास मान रहे हैं। जो भी हमारे इस तेज रफ्तार विकास के आड़े आ रहा है उसको हम जलवायु परिवर्तन के बहाने से छुपाने, ढांकने में लगे हैं।
खबर आई कि हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय पर्यटन स्थल कसौल के जंगलों में पर्यटन से उपजा, आसपास के कई सौ होटलों का कचरा जंगल के मुहाने पर डाला जा रहा था। सवाल उठे तो उस कचरे को कई ट्रकों में भरकर संरक्षित जंगल के और अंदर बेशर्मी से ले जाकर छुपाया गया। उस पर मिट्टी डाल दी गयी। शहरों में तो ऐसे कचरे के पहाड़ बन ही रहे हैं, मगर अब पहाड़ों में भी कचरे के शहर बनने की शुरुआत हो गयी है। सुविधा संपन्न सत्ता ऐसे ही विकास के नाम पर समाज को ठगती व लूटती है। अपन आज इतना कचरा पैदा कर रहे हैं जितना सहेज नहीं सकते। कचरा हम कर रहे हैं और उसको सहेजने का जिम्मा दूसरों पर डाल रहे हैं। क्या सत्ता के लिए पर्यटन ही एक मात्र विकास का पैमाना हो गया है?
हमारे शहरों को ‘ड्रीम सिटी’ बनाने का सपना दिखाया गया। भारत में ही लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क व सिंगापुर बनाने का वादा किया गया। इसके लिए हर बड़े शहर के मुहाने पर कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए गए। अपन मानें या न मानें, सपनों के शहर की आकांक्षा में हमारे पर्यावरण का संकट हमने ही रचा है। हमारे द्वारा किए गए कचरे से हमारी सेवा करने वाले हमारे लिए नए पहाड़ बना रहे हैं। हम उन पहाड़ों को अनदेखा कर, छोड़कर हिमाचल, उत्तराखंड, कश्मीर व अन्य जगहों के पहाड़ों पर पर्यटन करने जा रहे हैं।
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हम एक तरफ अपनी नदियों में औद्योगिक कचरा जाने दे रहे हैं और दूसरी तरफ, पहाड़ों की नदियों का सौंदर्य भोगना चाहते हैं। वहां के तालाब, ताल व झरने देखने जाते हैं और अपने यहां इन्हीं में कचरा भरने व इन पर मॉल बनने दे रहे हैं। सत्ता ने भी इन्हीं दूरदराज के स्थानों को पर्यटन के पैसे व आय से देखना शुरू कर दिया है। आज अपन प्रतिवर्ष 6.2 करोड टन कचरा पैदा करते हैं जिसमें से मुश्किल से 20 प्रतिशत को ही वैज्ञानिक तरीके से सहेजा जा रहा है। इसी तेज रफ्तार विकास के सपने के कारण हम अपनी समस्याओं को जलवायु परिवर्तन के बहाने से छुपाते हैं।
सृष्टि के इतिहास में ऐसा कोई समय दर्ज नहीं है जब जलवायु परिवर्तन नहीं हो रहा हो या न हुआ हो। परिवर्तन ही सृष्टि की परंपरा रही है। आज बस उसकी गति हमारी लालसा के कारण तेज हो गयी है। यही तेज रफ्तार लालसा या आकांक्षा सृष्टि के हर पहलू को प्रभावित कर रही है। सांस लेने वाली हवा से लेकर बदलते मौसम तक को हम देख रहे हैं, मगर क्या समझ भी पा रहे हैं? सबसे पहले महात्मा गांधी ने ही आगाह किया था, “धरती पर सभी की जरूरत के लिए पर्याप्त है, मगर एक के भी लालच के लिए कम है।” क्या इस विचार पर ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनता है?
वर्षों पहले प्रकृति के प्रति संवेदना व आभार प्रकट करने का यह धार्मिक मंत्र मन में चलता व बना रहा है। “अगर हम ऐसे जीते हैं कि हमारे जीने के मायने हैं और उससे कोई अहित नहीं हो रहा, तो कोई चिंता की बात नहीं, लेकिन अगर हम ऐसे जीते हैं कि हमारे जीने के कोई मायने नहीं हैं और अहित भी हो रहा है, तो निश्चित रूप से समाज में डर और गहन चिंतन होना ही चाहिए।” गांधीजी के लिए आजादी का आंदोलन यह मायने भी रखता था कि अहिंसा और सत्य के रास्ते राष्ट्र की सबसे छोटी इकाई को सम्मान के साथ ऊपर उठाते हुए विकास करना। समभाव के समाज के लिए व्यक्ति का वैचारिक, व्यवहारिक विकास करना। सत्ता को समाज के लिए और अधिक सार्थक बनाना।
एक छोटी किताब – ‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ – भी सेवाग्राम से बारडोली तक की रेलयात्रा में गांधीजी ने लिखी। काशीनाथ त्रिवेदी द्वारा किया गया इसका अनुवाद पहली बार सन् 1941 में छपा। स्वतंत्रता आती दिख रही थी इसलिए ये कांग्रेस की सत्तानीति के लिए और स्वतंत्रता के आंदोलन में लगे लोगों के लिए अपील थी। उस किताब में समाज कार्य के अठारह मूल विचार थे। (1) सांप्रदायिक एकता, (2) अस्पृश्यता निवारण, (3) निषेध, (4) खादी, (5) ग्रामोद्योग, (6) ग्राम स्वच्छता, (7) बुनियादी शिक्षा, (8) वयस्क शिक्षा, (9) महिलाएं, (10) स्वास्थ्य और सफाई का ज्ञान, (11) प्रांतीय भाषाएं, (12) राष्ट्रीय भाषा, (13) आर्थिक असमानता, (14) किसान, (15) मजदूर, (16) आदिवासी, (17) कुष्ठ रोगी और (18) छात्र।
सत्ता के करने के लिए और समाज की सेवा से जुड़े ये रचनात्मक कार्यक्रम गांधीजी ने नए स्वतंत्र भारत के विकास की रूपरेखा के तौर पर गढ़े थे। ये वो कार्यक्रम हैं जो समाज का हर व्यक्ति अपने स्तर पर, कहीं भी रहते हुए कर सकता है। आज कांग्रेस अपने अहिंसक आंदोलन की विरासत को और गांधी को भूल गयी है। भाजपा अपने विकास का इतिहास रचने के चक्कर में गांधी को भुला देना चाहती है। सभी को गांधी सिर्फ चुनावी वादों में याद आते हैं। जनता ही है जो अपने गांधी को सत्ता से पूछे जाने वाले सवालों के लिए अपनी अहिंसक लाठी बना सकती है। आजादी के 78 साल बाद भी इन्हीं रचनात्मक कार्यक्रमों में लगकर अपन विश्वगुरु भी बन सकते हैं। इन्हीं से अपना पर्यावरण संरक्षित रहकर संवर भी सकता है। सत्ता के राष्ट्रवाद में यही जनता का रचनात्मक धर्म होगा। (सप्रेस)
श्री संदीप जोशी सामाजिक कार्यकर्त्ता एवं लेखक हैं।


