प्रकृति का पर्यावरण
पर्यावरण का जो संकट अब ठेठ हमारी देहरी तक पहुंच गया है और जिसे लेकर सालाना कर्मकांड की तरह कई दिवस भी मना लेते हैं, क्या वह हमारे ही जीवन-यापन के धतकरमों का नतीजा नहीं है? मसलन, दिनों-दिन बढ़ता-फैलता कचरे…
सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक
पर्यावरण का जो संकट अब ठेठ हमारी देहरी तक पहुंच गया है और जिसे लेकर सालाना कर्मकांड की तरह कई दिवस भी मना लेते हैं, क्या वह हमारे ही जीवन-यापन के धतकरमों का नतीजा नहीं है? मसलन, दिनों-दिन बढ़ता-फैलता कचरे…