Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

संकट में पहाड़, मनुष्य और पर्यावरण

डॉ.ए.के.अरुण

गांधी विचार को मानने वालों में बेहद वरिष्ठ और सम्मानित राधा बहन अपनी देशभर की अनेक जिम्मेदारियों के अलावा बरसों से हिमालय में रहकर उसकी बर्बादी भी देख रही हैं। वे बस भर उन योजनाओं पर उंगली उठाती रहती हैं जो विकास के नाम पर पहाडों का विनाश करने में लगी हैं।

डॉ.ए.के.अरुण

 वैश्विक स्तर पर की जा रही पर्यावरण की चिंता के बीच उत्तराखंड के कौसानी में ‘लक्ष्मी आश्रम’ की गतिविधियां और वहाँ के संचालकों की सोच की बात करना आज बेहद ज़रूरी लगता है। अभी विगत हफ़्ते ही जब हम लोग (एके अरुण, वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार, सविता वर्मा एवं अनामिका) तेज वर्षा के बावजूद सुश्री राधा भट्ट से मिलने ‘लक्ष्मी आश्रम’ पहुँचे। आश्रम के नज़दीक छात्राएँ रास्ते और परिसर की सफ़ाई करती मिलीं। ‘लक्ष्मी आश्रम’ की सचिव और संचालिका सुश्री नीमा वैष्णव हमें राधा दीदी के कमरे तक लायीं। हमें उसी कमरे में बिठाया गया जहां वर्षों पहले अंग्रेजों ने महात्मा गांधी की दत्तक-पुत्री तथा उनकी सहयोगी सरला बहन को हाउस-अरेस्ट करके रखा था।

दरअसल यह सरला बहन ही थीं जिन्होंने ‘लक्ष्मी आश्रम’ की स्थापना की थी। बताते हैं कि सन् 1942 में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ द्वारा आहूत ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान सरला बहन आंदोलनकारियों के परिवारों की मदद के लिए कौसानी से कई-कई मील की पैदल यात्रा कर अल्मोड़ा, रामगढ़ आदि जगहों तक जाती थीं। मूलत: अंग्रेज सरला बहन का असली नाम कैथरीन मैरी हैलीमैन था। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वे ब्रिटेन से सन् 1931 में भारत आ गई थीं। सन् 1940 में वे कौसानी आ गईं और वहीं आश्रम बनाकर रहने लगीं। बाद में सुश्री राधा भट्ट ने कोई सत्रह वर्ष की उम्र में सरला बहन के साथ ‘लक्ष्मी आश्रम’ में रहना प्रारंभ किया। आठ जुलाई 1982 को सरला बहन के निधन के उपरांत सुश्री राधा भट्ट उनकी उत्तराधिकारी बनीं और उन्होंने ‘लक्ष्मी आश्रम’ की ज़िम्मेवारी सम्हाली।

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उत्तराखंड के पहाड़ और मनुष्य के पर्यावरण पर चर्चा करते हुए राधा बहन कहती हैं कि देश दुनिया के पर्यावरण और लोगों के जीवन पर गहराते संकट की भयावहता दिल दहला देने वाली है। पर्यावरण, मानव जीवन और जन-स्वास्थ्य पर लिखते-पढ़ते मुझे चार दशक बीत चुके हैं। दुनिया में व्याप्त पर्यावरणीय और मानवीय संकट को जानना कोई मुश्किल नहीं है, लेकिन राधा बहन से इस संकट की पुष्टि बेहद महत्वपूर्ण है। राधा बहन कहती हैं कि पहाड़ ख़ाली हो रहे हैं। आधुनिकता, तकनीकी चकाचौंध तथा पूंजी के लालच ने जहाँ उत्तराखंड के आम लोगों को महानगरों में जाकर काम करने को मजबूर किया है, वहीं धन के लालची व्यापारियों ने पहाड़ और उत्तराखंड को लूटने-कमाने का ज़रिया बना लिया है।

विकास के नाम पर पहाड़ों की खुदाई, जंगल की कटाई आदि से यहाँ के नैसर्गिक जलस्रोत नष्ट हो रहे हैं और पहाड़ की ख़ूबसूरत नदियां सूखकर बेरौनक़ और बेपानी हो चुकी हैं। पहाड़ के ग्लेशियर, नदियों की बात कुछ और है, लेकिन यहाँ के जंगलों-पहाड़ों से निकलने वाले जलस्रोत अब सूख रहे हैं। नदियाँ वीरान हैं, उनमें पानी की जगह पत्थर ही दिखाई देते हैं जो पर्यावरणीय संकट की ही एक अभिव्यक्ति है। इससे यहाँ के जानवर, वनस्पति और जीवन प्रभावित हो रहे हैं।

पहाड़ से पलायन की एक वाजिब वजह यह भी है जिससे पहाड़ के गाँव धीरे-धीरे ख़ाली हो रहे हैं। उत्तराखंड से लोगों के पलायन में रोज़गार के अवसरों की कमी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की दिक्कतें, कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ भी शामिल हैं। प्रदेश के दूर-दराज़ के गाँवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव तथा बेहतर जीवन की तलाश में यहाँ के लोग पलायन के लिए मजबूर हैं।

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डेढ़ करोड़ की आबादी वाले उत्तराखंड में लगभग 10 लाख युवा बेरोज़गार हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग एक लाख युवा बेरोजगारों की सूची में शामिल हो रहे हैं, जबकि राज्य में रोज़गार की संभावनाओं की कमी नहीं है। उत्तराखंड के सरकारी आंकड़ों को देखें तो बीते पांच वर्षों में बेरोजगारों का आंकड़ा लगभग नौ लाख पार कर चुका है, जिसमें मात्र 17 हज़ार युवाओं को ही रोज़गार मिल पाया है। हालांकि राज्य ने विगत पाँच वर्षों में कोई सात सौ रोज़गार-मेले आयोजित किए हैं।

उत्तराखंड में पर्यावरण की कई गंभीर समस्याएं हैं जो देश और दुनिया को प्रभावित करती हैं। इनमें जलवायु-परिवर्तन, जंगल में आग, जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण आदि प्रमुख हैं। उत्तराखंड में ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों के जलस्तर में बदलाव आ रहा है। कई जगहों पर पेड़ सूख रहे हैं। दुर्लभ जीवों के आवास प्रभावित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से पारंपरिक फसलों के उत्पादन में भी कमी आ रही है। प्रदेश के जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं जिससे वनभूमि और पर्यावरण का बहुत नुक़सान हो रहा है। उत्तराखंड की नदियों और झीलों में औद्योगिक कचरा तथा प्लास्टिक की वजह से पर्यावरण संकट बढा है।

बीते कई वर्षों से यहाँ वायु-प्रदूषण भी बढ़ा है। आंकड़ों में उत्तराखंड का औसत ‘वायु गुणवत्ता सूचकांक’ (एक्यूआई) वैसे तो अभी भी स्वीकार्य स्तर पर ही है, लेकिन देहरादून, हरिद्वार में बढ़ते प्रदूषण के चलते वातावरण में वायु-गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में हरिद्वार प्रदेश का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है। हालाँकि उत्तराखंड में ‘औसत वायु गुणवत्ता,’ ख़ासकर PM 2.5 का स्तर फ़िलहाल स्वीकृत मानक के अनुसार ही है।

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‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के परिप्रेक्ष्य में उत्तराखंड को देखें तो विगत एक वर्ष में लगभग 1630.71 हेक्टेयर जंगल जलकर नष्ट हो गए हैं। इस दौरान प्रदेश के जंगलों में 1198 आग की घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में लगभग 458.48 हेक्टेयर से ज़्यादा भूमि खनन अतिक्रमण की जद में है, हालाँकि प्रशासन इसमें से 1355.99 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के दावे करता है। कुल मिलाकर स्थिति चिंताजनक ही है।

उत्तराखण्ड में पर्यावरण की रक्षा के लिए वहाँ की महिलाओं का योगदान ऐतिहासिक रूप से याद किया जाता है। ‘चिपको आंदोलन’ इसका प्रमाण है। आज भी उत्तराखण्ड की महिलाएँ सामुदायक रूप से पर्यावरण की रक्षा के लिए सक्रिय हैं। पहाड़ बचेंगे तो नदियाँ बचेंगी, पेड़ बचेंगे। पेड़ बचेंगे तो वर्षा होगी, पर्यावरण बचेगा। इसलिए हे मनुष्य, पहाड़ को नष्ट मत करो, पहाड़ पर घूमने जाओ तो वहाँ प्लास्टिक कचरा मत फैलाओ। ज़्यादा-से-ज़्यादा पेड़ लगाओ। ‘विश्व पर्यावरण दिवस,’ पांच जून पर आपका यह छोटा संकल्प पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। (सप्रेस)


लेखक एक होम्योपैथिक चिकित्सक एवं जनस्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं तथा ‘युवा संवाद’ मासिक पत्रिका के संपादक हैं।

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