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कस्‍तूरबा : गांधी संग बलिदान की अमर स्वर्ण-ज्योति

कस्‍तूरबा : गांधी संग बलिदान की अमर स्वर्ण-ज्योति

कस्‍तूरबा केवल महात्मा गांधी की जीवनसंगिनी ही नहीं थीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की एक अद्वितीय,प्रचंड क्रांतिकारी शक्ति भी थीं। उनका जीवन त्याग, निर्भीकता और अनवरत संकल्प का ऐसा ओजस्वी महाकाव्य है, जो प्रत्येक भारतीय के हृदय में प्रेरणा का अखंड दीप प्रज्ज्वलित करता...

प्रो. आरके जैन

कस्‍तूरबा केवल महात्मा गांधी की जीवनसंगिनी ही नहीं थीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की एक अद्वितीय,प्रचंड क्रांतिकारी शक्ति भी थीं। उनका जीवन त्याग, निर्भीकता और अनवरत संकल्प का ऐसा ओजस्वी महाकाव्य है, जो प्रत्येक भारतीय के हृदय में प्रेरणा का अखंड दीप प्रज्ज्वलित करता है। सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध उनकी अदम्य संग्रामशीलता और नारी शक्ति को स्वावलंबी बनाने का उनका अथक संकल्प उन्हें एक सच्ची योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

22 फरवरी: कस्तूरबा गांधी ‘बा’ पुण्य स्‍मरण

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा एक ऐसी तेजस्वी महागाथा है, जिसमें असंख्य शूरवीरों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की बलिवेदी पर आहुति चढ़ाई। किंतु, कुछ ऐसी महान आत्माएं उभरीं, जिनका बलिदान और समर्पण किसी एक घटना या आंदोलन की परिधि में बंधकर नहीं रहा। ऐसी ही एक अनुपम, अलौकिक विभूति थीं कस्तूरबा गांधी, जिन्हें संपूर्ण भारत ‘बा’ कहकर श्रद्धा और प्रेम से संबोधित करता है। उनकी पुण्यतिथि (22 फरवरी) पर राष्ट्र उनके तपस्वी त्याग, अडिग संकल्प और अमर बलिदान को कृतज्ञतापूर्वक नमन करता है। वे केवल महात्मा गांधी की जीवनसंगिनी ही नहीं थीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की एक अद्वितीय, प्रचंड क्रांतिकारी शक्ति भी थीं। उनका जीवन त्याग, निर्भीकता और अनवरत संकल्प का ऐसा ओजस्वी महाकाव्य है, जो प्रत्येक भारतीय के हृदय में प्रेरणा का अखंड दीप प्रज्ज्वलित करता है। सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध उनकी अदम्य संग्रामशीलता और नारी शक्ति को स्वावलंबी बनाने का उनका अथक संकल्प उन्हें एक सच्ची योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

11 अप्रैल 1869 को गुजरात के पोरबंदर में अवतरित कस्तूरबा का बाल्यकाल एक परंपरागत परिवार की शीतल छांव में बीता। औपचारिक शिक्षा का प्रकाश उन तक न पहुंच सका, परंतु उनके संस्कारों की गहनता और जीवन की कठोर तपस्या ने उन्हें एक अडिग, तेजस्वी व्यक्तित्व का स्वामित्व प्रदान किया। मात्र 13 वसंतों की कोमल आयु में उनका विवाह मोहनदास करमचंद गांधी से संपन्न हुआ। यह विवाह केवल पारिवारिक बंधन का सूत्र नहीं था, अपितु दो प्रबल आत्माओं का ऐसा संगम था, जिसने भारत के इतिहास में अमिट स्वर्णाक्षर अंकित किए। विवाह के प्रारंभिक क्षण सौम्य और साधारण थे, किंतु जैसे-जैसे गांधीजी के जीवन का परम ध्येय प्रकाशमान हुआ, कस्तूरबा भी उनके पथ पर एक अविचल सहचरी बनकर चल पड़ीं। प्रत्येक संकट में उन्होंने अपने अदम्य साहस और असीम धैर्य का परिचय दिया, और संघर्ष की प्रचंड अग्नि में स्वयं को खरे स्वर्ण-सा परिष्कृत कर दिखाया।

जब दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी ने भारतीयों के अधिकारों के लिए सत्याग्रह का शंखनाद किया, तब कस्तूरबा इस महासंग्राम की अटल शक्ति स्तंभ बनकर प्रखर हुईं। रंगभेद और अत्याचार के विरुद्ध उनकी तेजस्वी हुंकार आकाश को चीरती गूंजी। वे न केवल इस आंदोलन में सहभागी बनीं, बल्कि बारंबार कारागार की सलाखों के पीछे भी निर्भीकता से कदम रखा। नारी शक्ति को अन्याय के सामने अडिग खड़े होने और अपने अधिकारों के लिए प्रचंड संग्राम करने की प्रबल प्रेरणा प्रदान की। उनका ओजपूर्ण स्वभाव और सिद्धांतों पर अविचल निष्ठा दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष में एक प्रदीप्त प्रकाश-पुंज बनकर दमक उठा। कारागार की अमानुषिक यातनाएं भी उनके संकल्प को विचलित न कर सकीं, और वे अपने प्रण पर अटूट रहीं।

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भारत की पावन धरती पर लौटते ही कस्तूरबा ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी को और भी प्रखर कर दिया। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने नारियों को विदेशी वस्तुओं का परित्याग कर स्वदेशी को अंगीकार करने का ओजस्वी आह्वान किया। गली-गली, गांव-गांव घूमकर उन्होंने नारी शक्ति को एकजुट किया, खादी को जीवन का प्राण-तत्व बनाने की प्रेरणा प्रदान की, और स्वच्छता व शिक्षा के अमर मूल्यों का दीप प्रज्ज्वलित किया। उनका अडिग विश्वास था कि भारत की सच्ची स्वाधीनता तब तक अधूरी रहेगी, जब तक देश की आधी प्राण-शक्ति—महिलाएं—इस संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर न चलें। उन्होंने यह सप्रमाण स्थापित किया कि स्वतंत्रता का यह महायज्ञ केवल पुरुषों का एकमात्र कर्तव्य नहीं, बल्कि नारी शक्ति का भी उतना ही प्रबल और अनुपम योगदान है।

1930 का दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन कस्तूरबा के साहस और नेतृत्व का स्वर्णिम अध्याय बना। उन्होंने नारी शक्ति को इस महायज्ञ का प्राण बनाया, उन्हें ब्रिटिश शासन की क्रूर ज्यादतियों के विरुद्ध एक अटूट संगठित किया। ब्रिटिश दमन की क्रूरता भी उनके अदम्य हौसले को भंग न कर सकी। अहिंसा के पावन पथ को उन्होंने न केवल अंगीकार किया, बल्कि इसे अपने जीवन का प्रदीप्त तप बना लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में, जब गांधीजी को बंधक बना लिया गया, तब कस्तूरबा ने संग्राम की प्रबल कमान थामी। कारागार की ऊंची दीवारों के भीतर भी उनका संकल्प अविचल रहा, और उन्होंने हार को कभी स्वीकार नहीं किया।  

कस्तूरबा का योगदान केवल राजनीतिक क्षितिज तक सीमित न रहा। सामाजिक सुधारों की प्रज्ज्वलित मशाल थामे वे छुआछूत, जातिवाद और बाल विवाह जैसी घोर कुप्रथाओं के विरुद्ध अडिग रहीं। हरिजनों के कल्याण और नारी शिक्षा के लिए उनका समर्पण एक अनुपम तपोमयी अग्नि बनकर दमक उठा। उनका अटल विश्वास था कि समाज का सच्चा उद्धार तब तक असंभव है, जब तक नारी शक्ति जागृत, और प्रबल न हो। घर की चारदीवारी को लांघकर अपनी ओजस्वी हुंकार को आकाश तक गूंजाने और समाज के नवनिर्माण में प्रचंड योगदान देने की प्रेरणा उन्होंने नारियों के हृदय में प्रदीप्त की। उनका जीवन एक ऐसा प्रखर दर्पण ठहरा, जो नारी शक्ति की असीम संभावनाओं को विश्व पटल पर तेजस्वी किरणों से उजागर करता है।

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उनका जीवन एक ऐसी अनुपम गाथा था, जो त्याग, तपस्या और अनवरत समर्पण की जीवंत मिसाल बनकर उभरी। उनकी आत्मा में स्वतंत्रता की ज्वाला इस कदर प्रज्वलित थी कि कारागार की कठोर अग्निपरीक्षा भी उसे बुझा न सकी। वहाँ की निर्मम यातनाओं ने उनके शरीर को क्षीण किया, किंतु उनकी इच्छाशक्ति का प्रकाश और आत्मा का तेज कभी मंद न पड़ा। वह एक योद्धा थी, जिसने शारीरिक बंधनों को तोड़ा नहीं, बल्कि अपनी अडिग संकल्पशक्ति से उन्हें तुच्छ सिद्ध कर दिया। पुणे के आगाखान महल में, जहाँ चारदीवारी और बेड़ियाँ उन्हें कैद करने का दंभ भरती थीं, उन्होंने अंतिम दिनों तक अपने आदर्शों को जीवित रखा। 22 फरवरी 1944 को, जब उन्होंने अंतिम प्राण-श्वास त्यागा, तो वह क्षण मात्र एक देह का अंत नहीं था। वह स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रचंड युग का अवसान था, एक ऐसी महाशक्ति का प्रस्थान था, जिसने अपने जीवन से असंख्य दिलों में साहस और बलिदान की चिंगारी प्रज्वलित की। राष्ट्र उनके समक्ष नतमस्तक हुआ। अश्रु-नम नेत्रों से उन्हें विदाई दी गई, किंतु वह विदाई केवल शारीरिक थी। उनका संघर्ष, उनका बलिदान और उनकी अटूट भावना समय की सीमाओं को लाँघकर अमरत्व को प्राप्त हुई।

कस्तूरबा गांधी का जीवन हमें यह ओजस्वी संदेश देता है कि अटल संकल्प, अनंत धैर्य और सत्यनिष्ठा से कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं। उन्होंने नारी शक्ति को एक नवीन, प्रदीप्त आयाम प्रदान किया और यह अविचल सत्य स्थापित किया कि स्वतंत्रता संग्राम में नारियां भी पुरुषों के समान सशक्त और प्रभावशाली हैं। आज भी उनके तेजस्वी आदर्श हमारे हृदय में प्रेरणा का प्रखर दीप जलाते हैं—कि हम अन्याय के समक्ष निर्भीकता से खड़े हों, सत्य और अहिंसा के पावन मार्ग पर अडिग रहें, और अपने कर्तव्यों को असीम तपस्या के साथ संपूर्ण करें।

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वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थीं, अपितु भारतीय संस्कृति और नैतिकता की प्रदीप्त प्रतिमा थीं, जिनका ओजस्वी प्रकाश युग-युगांतर तक हमारे पथ को आलोकित करता रहेगा। वह आज भी हमारे बीच जीवित हैं—हर उस स्वर में जो स्वतंत्रता की बात करता है, हर उस कदम में जो अन्याय के विरुद्ध उठता है। उनकी पुण्यतिथि एक शोक-दिवस नहीं, अपितु उनके अदम्य साहस और त्याग को स्मरण करने का पावन अवसर है। वे थी, हैं और सदा रहेंगी—हमारी प्रेरणा-स्रोत, हमारे स्वाभिमान की प्रतीक। उनकी पुण्यतिथि पर हम कृतज्ञ हृदय से उन्हें नमन करते हैं, जिनका त्याग, साहस और सेवा सदा प्रेरणादायक रहेगी। हे ‘बा’, आपकी पवित्र स्मृति के समक्ष कोटि-कोटि प्रणाम—आपके बलिदान ने इस राष्ट्र के आकाश में एक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की, जो अनंत काल तक हमें प्रेरित करती रहेगी।

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