स्वावलंबी खादी : अन्नपूर्णा से आत्मनिर्भरता की ओर — प्रो. उल्हास जाजू

अखिल भारतीय चरखा संघ के शताब्दी वर्ष पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संवाद

वर्धा, 16 अक्‍टूबर। अखिल भारतीय चरखा संघ के शताब्दी वर्ष (1925–2025) के उपलक्ष्य में खादी मिशन सेवा ट्रस्ट एवं मुदित शिक्षा संस्था, वर्धा के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय राष्ट्रीय ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा है। 15 अक्टूबर को प्रारंभ हुई परिचर्चा में देशभर के 86 खादी संस्थाओं के प्रतिनिधि, गांधीवादी कार्यकर्ता, खादी-प्रेमी, शिक्षाविद् एवं विद्यार्थी सम्मिलित हुए।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुदित शिक्षा संस्था के निदेशक डॉ. पंकज कुमार सिंह के उद्बोधन से हुआ। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने 22 सितंबर 1925 को पटना में ‘अखिल भारतीय चरखा संघ’ की स्थापना की थी। इस अवसर पर गांधीजी ने कहा था चरखा संघ इस विचार से बनाया गया है कि वह सक्रिय रूप से काम करने वाला संगठन हो… चरखा संघ के पास विदेशी कपड़े के बहिष्कार करने के साधन तथा सामर्थ्य दोनों होंगे।

प्रथम वक्ता प्रो. (डॉ.) उल्हास जाजू (सेवाग्राम) ने ‘खादी के स्वावलंबन’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गांधीजी ने खादी को “अन्नपूर्णा” और “रोटी के लिए मक्खन देने वाली” संज्ञा दी थी। उन्होंने बताया कि बुनकरों को पर्याप्त आमदनी न मिल पाने की स्थिति में गांधीजी ने 1934 में यह मंत्र दिया “जो काते वह पहने, जो पहने वह काते।” इस मंत्र में शोषण-मुक्ति और शासन-मुक्ति दोनों का भाव समाहित था। प्रो. जाजू ने अपने दादा श्रीकृष्ण दास जाजू, जो अखिल भारतीय चरखा संघ के मंत्री रहे, का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने गांधीजी के मार्गदर्शन में स्वावलंबी खादी के नव संस्करण की नींव रखी, जो बाजारवादी खादी से भिन्न थी।

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इसके बाद डॉ. राजीव रंजन गिरि (एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने “खादी : विरासत का वैभव और वर्तमान की चुनौतियाँ” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि “गांधीजी ने तिलक स्वराज फंड के माध्यम से चरखे को घर-घर तक पहुँचाया। खादी आजादी का प्रतीक बनी, और इसे पहनने वाले लोगों के प्रति समाज में आस्था का भाव उत्पन्न हुआ।”

तीसरे वक्ता डॉ. महेश कुमार सिंह, प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी, महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगीकरण संस्थान (MGIRI), वर्धा ने कहा कि “खादी का नाम लेते ही हमें गांधी, स्वतंत्रता संग्राम और आजादी की याद आती है। हम सबका दायित्व है कि खादी की मूल भावना को बनाए रखते हुए चरखा और करघा में तकनीकी नवाचार को आगे बढ़ाएँ।”

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन खादी मिशन सेवा ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी प्रो. पुष्पेंद्र दुबे ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. नृपेंद्र प्रसाद मोदी (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) ने किया।

अखिल भारतीय चरखा संघ के बारे में

उल्‍लेखनीय है कि महात्मा गांधी द्वारा स्थापित अखिल भारतीय चरखा संघ अपने शताब्दी वर्ष (1925–2025) में प्रवेश कर चुका है। 22 सितंबर 1925 को पटना में स्थापित इस संगठन ने देश में स्वदेशी और स्वावलंबन की भावना को सशक्त आधार प्रदान किया। गांधीजी ने इसे न केवल ग्रामीण आजीविका का माध्यम बताया, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का आर्थिक और नैतिक स्तंभ भी कहा।

चरखा संघ की स्थापना का उद्देश्य गाँव-गाँव में कातने-बुनने की परंपरा को पुनर्जीवित करना, ग्रामीणों को सम्मानजनक आजीविका देना और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत की नींव रखना था। गांधीजी का विश्वास था कि “चरखा केवल आर्थिक साधन नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का प्रतीक है।”

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संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में खादी को जनांदोलन का रूप दिया और लाखों बुनकरों, कतिनों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं को जोड़ा। खादी की यह परंपरा आज भी आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और सतत विकास के मूल्यों को जीवित रखे हुए है।

शताब्दी वर्ष के अवसर पर देशभर में खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े संस्थान गांधीजी के इस विचार को पुनः जागृत करने के लिए कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं कि आत्मनिर्भर भारत का मार्ग गाँवों से होकर जाता है।

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