भारत सरीखे कृषि प्रधान देश में वैश्विक व्यापार समझौतों का सीधा असर कृषि और किसानों पर होता है। वैसे भी हमारे यहां कृषि और पशुपालन, प्राथमिक रूप से व्यापार की बजाए पेट भरने की तकनीक मानी जाती है और ऐसे में इनके साथ की जाने वाली मामूली सी छेड़छाड़ सीधे खाद्य-सुरक्षा को संकट में डाल सकती हैं। ऐसे में हाल के वैश्विक व्यापार समझौतों का हमारे पशुपालकों पर क्या असर होगा?
निलेश देसाई
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल आधार ‘हल और हंसिया’ नहीं, बल्कि वह खूंटा है जिससे बंधी गाय, भैंस या बकरी किसी भी आपदा में किसान की रसोई जलने की गारंटी देती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और मांस उत्पादन में भी अग्रणी है, लेकिन आज, फरवरी 2026 के इस मोड़ पर, भारत का पशुपालन क्षेत्र एक ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ‘बजट 2026’ की तकनीक-आधारित आधुनिकता की चमक है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और ‘यूरोपीय संघ’ के साथ हुए व्यापार समझौतों का वह चक्रव्यूह है।
वैश्विक समझौतों के ‘बारीक अक्षर’
फरवरी 2026 में हुए ‘भारत-अमेरिका व्यापार अनुबंध’ को सरकार ने ‘ऐतिहासिक’ करार दिया है। वाणिज्य मंत्रालय का तर्क है कि इससे भारत के डेयरी और कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखते हुए व्यापार के नए रास्ते खुले हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दुनिया में ‘सुरक्षा’ एक सापेक्ष शब्द है। अमेरिका लंबे समय से भारत के ‘पोल्ट्री’ (मुर्गी पालन) और ‘डेयरी’ बाजार पर नजर गड़ाए हुए है।
सबसे बड़ा खतरा ‘चिकन लेग्स’ की ‘डंपिंग’ का है। अमेरिका में ‘ब्रेस्ट मीट’ की मांग अधिक है और वहां ‘चिकन लेग्स’ को उप-उत्पाद मानकर बहुत कम कीमत पर बेचा जाता है। यदि व्यापारिक दबाव के तहत भारत इन पर ‘आयात शुल्क’ घटाता है, तो भारत के वे लाखों छोटे पोल्ट्री किसान जो 100-200 मुर्गियों से अपनी आजीविका चलाते हैं, रातों-रात बाजार से बाहर हो जाएंगे। वे अमेरिकी कंपनियों की उस कीमत का मुकाबला कभी नहीं कर पाएंगे जिसे वहां की सरकार भारी सब्सिडी देती है।
यही डर डेयरी क्षेत्र में भी है। ‘यूरोपीय संघ’ के साथ चल रही बातचीत में अक्सर ‘प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों’ पर रियायत मांगी जाती है। यदि विदेशी मक्खन, पनीर और मिल्क पाउडर बिना किसी रोक-टोक के भारतीय बाजारों में आए, तो हमारी सहकारी समितियों का ढांचा चरमरा सकता है, जो करोड़ों छोटे दुग्ध उत्पादकों को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) जैसा भरोसा देता है।
बजट 2026 : तकनीक का मरहम या डिजिटल बेड़ियाँ?
इस वैश्विक दबाव के बीच, वित्तमंत्री ने ‘बजट 2026’ में पशुपालन क्षेत्र के लिए 6,153 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। सरकार का तर्क है कि तकनीक के जरिए हम पशुपालक की उत्पादकता बढ़ाएंगे, ताकि वह वैश्विक बाजार में मुकाबला कर सके, लेकिन यहाँ एक गहरा अंतर्विरोध है। एक तरफ हम ‘पशु आधार’ और ‘डिजिटल टैगिंग’ की बात कर रहे हैं, जो सुनने में आधुनिक लगता है, लेकिन क्या 5-10 बकरी पालने वाला एक छोटा किसान इस डिजिटल जटिलता को समझ पाएगा?
घाना और मेक्सिको: इतिहास की अनसुनी चेतावनी
ऐसे में उन देशों की याद करना जरूरी है जिन्होंने व्यापार समझौतों के नाम पर अपने पशुपालकों की बलि दे दी। घाना कभी पोल्ट्री में आत्मनिर्भर था, लेकिन 2000 के दशक में यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौतों ने वहां के बाजारों को ‘फ्रोजन चिकन’ से भर दिया। परिणाम? घाना का अपना पोल्ट्री उद्योग 90% तक नष्ट हो गया। आज वहां के बाजारों में स्थानीय मांस गायब है।
मेक्सिको ने 1994 में अमेरिका के साथ ‘मुक्त व्यापार समझौता’ किया। वहां के छोटे सुअर और बकरी पालकों को लगा कि उन्हें अमेरिकी बाजार मिलेगा, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। अमेरिकी कॉर्पोरेट फार्मों ने अपनी सब्सिडी की दम पर मेक्सिको के स्थानीय बाजार पर कब्जा कर लिया। लाखों छोटे किसान विस्थापित हुए और वे शहरों में मजदूर बनने को मजबूर हो गए। क्या भारत भी उसी रास्ते पर बढ़ रहा है?
‘बीज विधेयक 2025’ और चारे की राजनीति
पशुपालन का सीधा संबंध चारे से है। प्रस्तावित ‘बीज विधेयक 2025’ बीजों पर कॉर्पोरेट एकाधिकार को बढ़ावा दे सकता है। पशुपालक के लिए चारा (मक्का, सोयाबीन, ज्वार) मुख्य इनपुट है। यदि बीजों की लागत बढ़ती है, तो पशुओं को पालना महंगा होगा। यदि हम अपनी स्वदेशी किस्मों की बजाय कंपनियों के ‘संकर’ बीजों पर निर्भर हो गए, तो पशुपालक की आत्मनिर्भरता समाप्त हो जाएगी। बीज और पशुपालन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; एक की आजादी छिनी, तो दूसरा खुद-ब-खुद गुलाम हो जाएगा।
क्या बजट व्यापार समझौतों का मुकाबला कर पाएगा?
‘बजट 2026’ में की गई 27% की वृद्धि सराहनीय है, लेकिन क्या यह अंतरराष्ट्रीय समझौतों के असर रोकने के लिए काफी है?
- असमान लड़ाई: भारत सरकार अपने पशुपालकों को जो मदद दे रही है, वह अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा अपने किसानों को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सब्सिडी के सामने ऊँट के मुँह में जीरा है।
- बाजार बनाम सब्सिडी: यदि समझौतों के तहत आयात शुल्क 0% कर दिया जाता है, तो बजट की मामूली सब्सिडी किसान का घर नहीं बचा पाएगी।
- कॉर्पोरेट कब्जा: बजट का बड़ा हिस्सा तकनीक और स्टार्टअप्स पर केंद्रित है। डर यह है कि यह पैसा छोटे पालकों तक पहुँचने के बजाय उन ‘एग्री-टेक’ कंपनियों की जेब में जाएगा जो पशुपालन को केवल एक डेटा और मुनाफे की मशीन मानती हैं।
समाधान की राह : संप्रभुता का संरक्षण
भारत को यदि अपनी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो उसे ‘विकास’ की परिभाषा बदलनी होगी। हमें केवल ‘निर्यात’ के आंकड़ों को नहीं, बल्कि ‘अंतिम छोर के पशुपालक’ की आय को पैमाना बनाना होगा।
- सुरक्षात्मक टैरिफ : सरकार को किसी भी दबाव में आकर डेयरी और पोल्ट्री पर आयात शुल्क कम नहीं करना चाहिए। ‘रेड लाइन’ केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर दिखनी चाहिए।
- डिजिटल सुरक्षा, न कि निगरानी : तकनीक का उपयोग किसान को सुविधा देने के लिए हो, न कि उसे बाजार से बाहर करने के लिए।
- स्वदेशी नस्लों का संवर्धन : हमारी बकरियां और मुर्गियां कम खर्च में बेहतर प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं। हमें विदेशी नस्लों के बजाय अपनी स्थानीय नस्लों के सुधार पर निवेश करना चाहिए।
- सहकारी समितियों का सुदृढ़ीकरण : ‘अमूल’ जैसे मॉडलों को पोल्ट्री और बकरी पालन में भी लागू करना होगा, ताकि कॉर्पोरेट कंपनियां सीधे किसान का शोषण न कर सकें।
भारत के सामने आज जो परिदृश्य है, वह केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सुरक्षा और संस्कृति का है। पशुपालन करोड़ों भूमिहीन दलितों, पिछड़ों और महिलाओं का एकमात्र सहारा है। यदि व्यापारिक समझौतों की चमक में हमने अपने इस ‘मूक,’ लेकिन ‘मजबूत’ आधार को खो दिया, तो हम अपनी खाद्य सुरक्षा को कॉर्पोरेट तिजोरियों में गिरवी रख देंगे। समय की मांग है कि बजट की राशि का उपयोग छोटे पशुपालकों के लिए ‘कवच’ बनाने में किया जाए, न कि कॉर्पोरेट के लिए ‘कालीन’ बिछाने में। जिस देश का पशुपालक और बीज किसी कंपनी की शर्तों पर निर्भर हो जाता है, उस देश की थाली कभी स्वतंत्र नहीं रह सकती। (सप्रेस)


