कृषि संसार : किसानों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’

अरविंद सरदाना

चार दिन बाद शुरु होने वाले संसद के मानसून सत्र में, उम्मीद है, किसानों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यानि ‘एमएसपी’ की कानूनी गारंटी पर गंभीरता से चर्चा हो। क्या हैं, ‘एमएसपी’ को कानूनी हक बनाने में अडंगे? और ये अडंगे कितने प्रासंगिक, अप्रासंगिक हैं?

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) पर देश में लम्बे समय से चर्चा होती आ रही है और इसके क़ानूनी हक़ की कोशिश भी की जाती रही है। कहा जा रहा है कि कानून बनने के बाद ही किसानों को उनकी उपज का ‘एमएसपी’ पूरी तरह हासिल हो सकेगा, लेकिन सरकार की ओर से इसे कानूनी जामा पहनाने में झिझक दिखाई दे रही है। सरकार की इस झिझक से महसूस होता है कि अनकहे रूप से इससे इनकार किया जा रहा है।

‘एमएसपी’ कानून को अव्यावहारिक बताने वाले तर्क देते हैं कि यदि इसे क़ानूनी स्वरूप दिया गया तो सरकार को विवश होकर मंडियों में आने वाली अधिकांश फसलें खरीदना होंगी। यह आर्थिक रूप से संभव नहीं है, इसलिए सरकार ‘एमएसपी’ को व्यापक नहीं बनाना चाहती और न ही वह उसे एक क़ानूनी हक़ बनाना चाहती है। यह एक भ्रमित करने वाला तर्क है। ‘एमएसपी’ का प्रस्तावित कानून है कि यदि मंडियों में औसत भाव (मॉडल प्राइस) ‘एमएसपी’ से कम हैं, तब सरकार को खरीदना होगा। सरकार फसल को गुणवत्ता के नियमानुसार उपार्जन की व्यवस्था कर सकती है या ‘एमएसपी’ और मंडी भाव में अंतर का मुआवजा दे सकती है।

अनुभव से देखा गया है कि कई फसलों में 10 से 35% उपार्जन से मंडी भाव ‘एमएसपी’ के करीब आ जाता है। यह तभी संभव होता है जब उपार्जन के केंद्र गाँव के करीब बनाए जाएँ, किसानों का रजिस्ट्रेशन किया जाये, समय पर केंद्र शुरू हों और समय पर भुगतान हो। ज़रूरत अनुसार मंडी में ही केंद्र बनाए जाएँ। सरकार कुछ फसलों जैसे गेहूँ, धान, कपास के लिए पुख्ता व्यवस्था बनाती है, पर बाकी के लिए व्यवस्था बहुत कमज़ोर है। उपार्जन व्यापक रूप से, कुछ ही राज्यों में किया जा रहा। ‘एमएसपी’ कानून का लक्ष्य है कि इसी प्रकार की व्यवस्था सभी 23 फसलों के लिए हो और सभी राज्यों में कायम हो।

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उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश में गेहूँ के लिए 4500 से अधिक उपार्जन केंद्र बनाए गए और हर जिले में कलेक्टर को व्यवस्था बनाने की जवाबदारी दी गई। उसी प्रकार वर्ष 23-24 में ‘भारतीय कपास निगम’ ने कपास के लिए 11 राज्यों के 145 जिलों में 450 से अधिक ‘उपार्जन केंद्र’ बनाए और सभी प्रमुख मंडियों को कवर किया। तभी भाव को नियंत्रण करने और ‘एमएसपी’ के करीब लाने में सफल रहे। इसकी तुलना दलहन एवं तिलहन से करने पर समझ आता है कि यहाँ व्यवस्था बहुत कमज़ोर है और व्यापक नहीं है। मंडी भाव ‘एमएसपी’ से कम ही रहते हैं।

उपार्जन की व्यापक व्यवस्था के कारण किसानों के पास केंद्र पर जाकर ‘एमएसपी’ भाव पर बेचने का ठोस विकल्प बन जाता है। इसी कारण मंडियों में प्रतिस्पर्धा बनी और भाव ‘एमएसपी’ के निकट आया। अन्य फसलों में यह व्यापक व्यवस्था नहीं की गई और उपार्जन भी सीमित रखा गया।

उपार्जन के दो मुख्य लक्ष्य हैं, एक – सरकार की खाद्य योजनाओं के लिए खाद्यान जुटाना और दूसरा मंडी भाव को नियंत्रित करना। खाद्य योजनाएँ प्रमुख रूप से धान और गेहूँ पर निर्भर हैं। ‘भारतीय खाद्य निगम’ (एफसीआई) का 95% स्टॉक इन दो फसलों से भरा होता है। ‘एमएसपी’ की सूची में आने वाली अन्य फसलों, जैसे तिलहन, दलहन, मोटे अनाज खाद्य योजनाओं में बहुत मामूली रूप से शामिल किए गए हैं। इस कारण सरकारी ‘नाफेड’ (भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ) जैसी संस्था भी सीमित खरीदारी करती है। इससे मंडी के भाव पर प्रभाव नहीं पड़ता और यह आम तौर पर ‘एमएसपी’ से कम ही रहता है।

दूसरी तरफ, मंडी भाव को नियंत्रण करने का लक्ष्य ‘नाफेड’ के नियमों में लिखा है, पर उसे धरातल पर उतारने की व्यापक व्यवस्था नहीं है। इसके पीछे एक अनकहा संकोच है। मंडी भाव को नियंत्रित करने के लिए, सरकारी ज़रूरत से अधिक स्टॉक हो सकता है। तब उसकी व्यवस्था कैसे करें और बाज़ार में पुनः बेचने पर जो घाटा हो सकता है उसकी भरपाई कौन करेगा। इस स्थिति से बचने के लिए ‘नाफेड’ कम उपार्जन करती है। ‘एमएसपी’ को क़ानूनी जामा पहनाने पर यह साफ होगा कि घाटे की भरपाई सरकार करेगी, क्योंकि भाव को नियंत्रण करना उसका सामाजिक दायित्व है।

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हम अन्य फसलों, जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, उड़द, तुवर, मूंग, सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, तिल आदि सभी 23 फसलों, जिनका ‘एमएसपी’ घोषित किया जाता है, के लिए इसी भाव नियंत्रण की अपेक्षा करते हैं। यह क़ानूनी दर्जा मिलने पर किसी भी सरकार को पूरा करना होगा। यह किसानों का हक़ है कोई सौगात नहीं।

इसके लिए हर फसल के मुख्य इलाकों में, जिला स्तर पर, उपार्जन की व्यापक व्यवस्था बनानी होगी। इसके साथ मंडी में भी सुधार लाना होगा। कई राज्यों में मंडी बहुत कमज़ोर हालत में हैं। फसल बिक्री के लिए किसान बिचौलियों की एक लम्बी कड़ी पर निर्भर हैं। किसान सीधे मंडी में खुली नीलामी की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहे हैं। एक सरकारी रपट के अनुसार देश में  7057 मंडियाँ है, पर इनकी ज़रूरत कहीं अधिक है। वर्तमान में हर 400 वर्ग किलोमीटर पर एक मंडी है, जबकि 80 वर्ग किलोमीटर पर एक मंडी होनी चाहिए। बाजार में आने वाली फसल और भौगोलिक परिस्थिति के हिसाब से राज्यों को इसका विस्तार तय करना चाहिए। ‘एमएसपी’ कानून तभी कारगर हो सकता है जब मंडी व्यवस्था और उपार्जन की व्यवस्था दोनों सुचारू हों और एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा में खड़े रहें। जब तक यह व्यवस्था नहीं बनती, वहां ‘भावान्तर फार्मूले’ से किसानों को मुआवजा दिया जाए।

एक और बात ‘एमएसपी’ को कानूनी बनाने से रोकती है- उसके अनुसार ‘एमएसपी कानून को लागू करना संभव नहीं है, क्योंकि इसका खर्चा कोई भी सरकार नहीं उठा पायेगी।’ पर खर्च का अनुमान गलत अवधारणा पर तय किया गया है। सरकार को फसल का उपार्जन एक सीमित मात्रा में ही करना है, जो कि 10 से 35 प्रतिशत होगा। उपार्जन का एक हिस्सा खाद्य योजनाओं के लिए होता है। यह खर्च खाद्य-सुरक्षा के लिए है जिसे नहीं जोड़ना चाहिए। ‘एमएसपी’ कानून का खर्च वह है जो भाव नियंत्रण के लिए किसानों को मुआवजा देने पर खर्च होता हो।

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‘एमएसपी’ कानून लागू करने से कृषि में कई सकारात्मक बदलाव हो सकते हैं। कुछ फसलों पर से फोकस हटकर ‘एमएसपी’ सूची की बाकी फसलों पर उपार्जन की प्रक्रिया होगी। इससे मिश्रित खेती को प्रोत्साहन मिलेगा। खाद्य-सुरक्षा के लिए मोटे अनाजों को, जो अत्यंत पौष्टिक हैं, शामिल किया जाना चाहिए। गेहूँ और धान के अलावा अन्य फसलों पर भी शोध केन्द्रित होगा। दलहन और तिलहन के लिए देश में पैदावार बढ़ सकती है। इस समय विडम्बना है कि अपनी आपूर्ति के लिए हम किसानों को प्रोत्साहन कम कर रहे हैं और बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर हैं। यह आत्मनिर्भरता का कैसा रास्ता है! ‘एमएसपी’ की वर्तमान सूची, सभी कृषि उपज का एक छोटा हिस्सा है। क़ानूनी हक़ मिलने पर सभी वन एवं कृषि उपज के लिए उचित मूल्य की मांग उठेगी और इससे एक बड़े वर्ग को सुरक्षा प्राप्त हो सकेगी। (सप्रेस)

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