भोपाल में 12वां डॉ. अजय खरे स्मृति व्याख्यान
भोपाल, 7 मार्च। जन स्वास्थ्य को केवल इलाज के दायरे में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और व्यापक सामाजिक संदर्भों के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। यदि पानी पर टैक्स लगाने की सोच विकसित होती है तो वह दिन दूर नहीं जब हवा पर भी टैक्स लगाया जाने लगे। जब राजनीति खराब होती है तो उसका सीधा असर जन स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
यह विचार मुख्य वक्ता डॉ. सुनील कौल ने यहां आयोजित 12वें डॉ. अजय खरे स्मृति व्याख्यान में व्यक्त किए। वे “स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक: स्वास्थ्य और चिकित्सा पर पुनर्विचार” विषय पर बोल रहे थे। यह व्याख्यान जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. अजय खरे की स्मृति में आयोजित किया जाता है, जो जन-स्वास्थ्य और विज्ञान आंदोलन से गहराई से जुड़े रहे थे।
कार्यक्रम का आयोजन जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
जन स्वास्थ्य सम्मान 2025 प्रदान
इस अवसर पर जन स्वास्थ्य सम्मान 2025 भी प्रदान किए गए। जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिवंगत डॉ. सी. एम. गुलाठी को मरणोपरांत विशेष जन स्वास्थ्य सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्होंने दवाओं और दवा नीतियों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया था।
इसके अलावा वरिष्ठ जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सी. सत्यामाला तथा जन स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यकर्ता विवेक पवार को स्वास्थ्य और उससे जुड़े सामाजिक कारकों पर उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान की घोषणा डॉ. अनंत भान ने की।
टीबी और भूख के संबंध पर शोध का उल्लेख

डॉ. सुनील कौल ने अपने विस्तृत व्याख्यान में डॉ. अनुराग भार्गव द्वारा टीबी (तपेदिक) पर किए गए महत्वपूर्ण शोध का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने टीबी और भूख के बीच के संबंध को वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया है। आज पूरी दुनिया यह मानती है कि टीबी के इलाज में दवा के साथ पर्याप्त और पोषक भोजन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसके बावजूद देश में आज भी लगभग चार लाख लोग हर साल टीबी से मर रहे हैं। पहले जहां टीबी से मौतों में 50 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य था, वहीं वर्तमान में केवल लगभग 25 प्रतिशत कमी ही हासिल की जा सकी है, जबकि टीबी की दवाएं मुफ्त उपलब्ध हैं।
स्वास्थ्य बजट के साथ सामाजिक कारकों की भूमिका
उन्होंने कहा कि जन स्वास्थ्य में लोगों को बचाने के लिए केवल स्वास्थ्य बजट ही नहीं, बल्कि पोषण, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और समानता जैसे अन्य कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आज शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी पैसों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। इसका उदाहरण नीट (NEET) जैसी परीक्षाओं में देखा जा सकता है। “हम जिस रास्ते पर जा रहे हैं, वह भटकाव का रास्ता है,” उन्होंने कहा।
मध्यप्रदेश में कुपोषण पर चिंता
मध्यप्रदेश में कुपोषण की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वर्तमान आंगनवाड़ी मॉडल पर्याप्त है या उसमें बदलाव की जरूरत है। उन्होंने गर्भधारण से लेकर बच्चे के दो वर्ष की आयु तक के पहले 1000 दिनों के पोषण और देखभाल मॉडल पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता बताई।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के बजट का बड़ा हिस्सा गृह मंत्रालय और सेना पर खर्च होता है, जबकि सामाजिक क्षेत्र और जन स्वास्थ्य पर पर्याप्त निवेश नहीं किया जाता।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन स्वास्थ्य संकट बताया
डॉ. कौल ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा को भी गंभीर जन स्वास्थ्य संकट बताया। उनके अनुसार सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल लगभग 35 हजार महिलाएं दहेज या घरेलू हिंसा के कारण जलकर मर जाती हैं, जबकि गैर-सरकारी संस्थाओं के अनुसार यह संख्या करीब 75 हजार तक हो सकती है।
उन्होंने कहा कि मातृ मृत्यु को रोकने के प्रयासों के साथ-साथ महिलाओं के खिलाफ हिंसा को भी जन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से गंभीरता से लेना होगा।
असम में किए गए एक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 58 प्रतिशत पुरुषों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ किसी न किसी प्रकार की हिंसा की है। इसलिए हिंसा को केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज और जन स्वास्थ्य का मुद्दा माना जाना चाहिए।
घृणा और भेदभाव भी स्वास्थ्य के लिए खतरा
उन्होंने कहा कि घृणा, जातिवाद और सांप्रदायिक हिंसा भी जन स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं। वर्ष 2020 में अमेरिका की एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्था ने भी घृणा को जन स्वास्थ्य का मुद्दा माना है।
सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) के संदर्भ में उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल विचार सभी के लिए समान उपचार का था, लेकिन आज स्थिति यह हो गई है कि अगर आपके पास पैसा नहीं है तो इलाज मिलना भी कठिन हो जाता है। इससे अमीर और गरीब दोनों ही असुरक्षित महसूस करते हैं।
जलवायु परिवर्तन भी बड़ा स्वास्थ्य संकट
डॉ. कौल ने कहा कि समाज में जाति और वर्ग आधारित भेदभाव से ऊपर उठकर लोगों की स्वायत्तता और सम्मान को मजबूत करना होगा। उन्होंने जलवायु परिवर्तन को भी एक बड़ा जन स्वास्थ्य संकट बताते हुए कहा कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और कई अध्ययनों में आने वाले वर्षों में इनमें भारी कमी आने की आशंका जताई गई है।
उन्होंने कहा, “हम बेहतर की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन हमें सबसे खराब स्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए।”
समुदाय आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
उन्होंने विकेंद्रीकृत स्वास्थ्य मॉडल की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समुदाय आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आशा कार्यकर्ताओं को दवाएं देने और प्राथमिक उपचार की अधिक ट्रेनिंग दी जा सकती है, ताकि संकट की स्थिति में समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं टिकाऊ बन सकें।
दवाओं की कीमतों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि दवाओं की निर्माण लागत की तुलना में कई गुना अधिक कीमत पर बिक्री होती है, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था में असमानता बढ़ती है।
स्वास्थ्य में सामाजिक विज्ञानों की भागीदारी जरूरी
उन्होंने कहा कि जन स्वास्थ्य को केवल डॉक्टरों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसमें एंथ्रोपोलॉजी, मनोविज्ञान और अन्य सामाजिक विज्ञानों के विशेषज्ञों की भी भागीदारी जरूरी है। अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने आशा व्यक्त करते हुए कहा, “एक जिंगई ढूंढ लाओ, वो भीगी हुई चिंगारी ढूंढ लाओ।”

सामाजिक निर्धारकों को केंद्र में रखने की जरूरत
कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. रजनीश जोशी ने कहा कि हर व्यक्ति का अपना व्यवहार और सामाजिक संदर्भ होता है, जो उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। स्वास्थ्य को केवल डॉक्टर, दवा और इलाज तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने कहा कि शिक्षा, सशक्तिकरण, राजनीतिक इच्छाशक्ति और गरीबी जैसे कारक भी स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करते हैं। सामाजिक निर्धारक (Social Determinants) जन स्वास्थ्य के सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं और इन्हें केंद्र में रखना आवश्यक है।
मध्यप्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि एवं सीएमएचओ इंदौर डॉ. माधव हसानी ने कहा कि डॉ. अजय खरे ने जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो दीप जलाया था, उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सभी की है।
उन्होंने कहा कि भले ही आज वे प्रशासनिक भूमिका में हैं, लेकिन जन स्वास्थ्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पहले की तरह ही बनी हुई है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में सामने आई घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य को केवल इलाज तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसके सामाजिक और पर्यावरणीय कारणों पर भी गंभीरता से काम करना होगा।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ. सुनील कौल का परिचय राकेश दीवान ने दिया। विज्ञान सभा के महासचिव सुभाष शर्मा ने कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. रजनीश जोशी का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन आरती पाण्डेय और धीरेन्द्र आर्य ने किया, जबकि अंत में धन्यवाद ज्ञापन आशीष पारे ने प्रस्तुत किया।


