सत्ता, सेठ और समाज में बढ़ी पूंजी की हवस ने अब पवित्र तीर्थों को पैसा कूटने वाले पर्यटन-स्थलों में तब्दील कर दिया है। यह इस हद तक हो रहा है कि तीर्थस्थलों के आसपास के लोगों, पर्यावरण और जीवन तक पर खतरा मंड़राने लगा है। ‘देव-भूमि’ उत्तराखंड और हिमाचलप्रदेश के बारे में कहा जाने लगा है कि बढ़ते पर्यटन के चलते उनकी उम्र अब कुछ सालों की ही बची है। ऐसे में क्या तीर्थों की पर्यटन केन्द्रों में तब्दीली को रोका नहीं जाना चाहिए?
हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने धार्मिक स्थानों को प्रभावित करने वाली दो बड़ी परियोजनाएं वापस ली हैं। उज्जैन में ‘लैण्ड पुलिंग एक्ट’ को लेकर संतों एवं किसानों के विरोध के बाद इसे वापस लेने की घोषणा की गई। यह पारंपरिक भूमि अधिग्रहण के विकल्प की तरह एक ऐसी नीति है जिसमें सरकार विकास कार्यों के लिए किसानों की जमीन लेती है और विकसित करने के बाद लगभग 50% हिस्सा वापस कर देती है। इसके अलावा ओंकारेश्वर में प्रस्तावित ‘ममलेश्वर-लोक योजना’ भी निरस्त की गई जिसका विरोध स्थानीय लोग कर रहे थे। इसके पूर्व जैन समाज ने भी अपने धर्मस्थल ‘सम्मेद शिखरजी’ को केन्द्र तथा झारखंड राज्य की पर्यटन सूची से बाहर करवाया था।
ये सभी निर्णय धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाये रखने के साथ-साथ पर्यावरण हितैषी भी हैं। धार्मिक-स्थलों को पर्यटन-स्थलों में तब्दील करने से उस क्षेत्र की ‘धारण क्षमता’ से ज्यादा यात्री आते हैं जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है, प्रदूषण फैलता है और निष्पादन के अभाव में कूड़े-कचरे की समस्या भी पैदा होती है। पिछले वर्षों में केदारनाथ, जोशीमठ, उत्तरकाशी, चमोली, सिक्किम एवं कुल्लू आदि स्थानों पर आयी आपदाओं में एक बड़ा कारण बड़ी संख्या में यहां पहुंचे यात्रियों से बिगड़ा पर्यावरण रहा है।
जलवायु परिवर्तन से पैदा ‘चरम मौसम’ की दुर्घटनाओं ने इन आपदाओं में आग में घी का कार्य किया है। उत्तराखण्ड के चारों तीर्थ स्थान (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री) बहुत कुछ पर्यटन केन्द्र में बदल गये हैं। वर्ष 2000 के दशक में इन स्थलों पर 10 लाख यात्री प्रतिवर्ष आते थे, परन्तु अब संख्या 50 लाख तक पहुँच गयी है। केदारनाथ में वर्ष 2025 में 17 लाख 68 हजार लोगों ने बाबा केदारनाथ के दर्शन किए एवं 2300 टन कचरा गौरीकुण्ड से धाम के मध्य फेंका गया। इस कचरे को उपचारित करने के पूर्व सोनप्रयाग तक लाने में लगभग 25 करोड़ रुपये खर्च होने की गणना की गयी थी। उपचार के अभाव में यह कचरा पर्यावरण के सभी भागों को प्रदूषित कर सकता है।
इस प्रकार बढ़ती पर्यटकों की संख्या से हिमालय की पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इससे बचने का एकमात्र उपाय यात्रियों की संख्या घटाना ही है। इस संदर्भ में ‘जी.बी. पंत हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान, अल्मोड़ा’ एवं ‘उत्तराखंड उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय’ ने संयुक्त अध्ययन कर इन तीर्थ स्थलों पर यात्रियों की प्रतिदिन की संख्या का निर्धारण किया है जो इन स्थलों की ‘धारण-क्षमता’ पर आधारित है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री के लिए निर्धारित संख्या क्रमश – 15,778, 13,111, 8,178 तथा 6,160 बतायी गयी है। इस अध्ययन में पिछले 23 वर्षों (2000 से 2023 तक) के डाटा, चारों धाम का क्षेत्रफल, भौगोलिक स्थिति, मौसम तथा आधारभूत व्यवस्था आदि शामिल किये गए हैं। बढ़ते पर्यटन की पूंजी का मोह छोड़कर इस अध्ययन के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि व्यवस्था की जाए तो पारिस्थितिकी संतुलन बनेगा एवं नष्ट हुई प्रकृति को दोबारा फलने-फूलने का मौका मिलेगा।
मध्यप्रदेश के उज्जैन में ‘महाकाल-लोक’ बनने (अक्टूबर 2022) के बाद वहां का पर्यावरण भी बिगड़ने लगा है। ‘मंदिर प्रबंधन समिति’ द्वारा वर्ष 2024 में दी गयी एक जानकारी के अनुसार मंदिर में चार वर्ष पूर्व तक 24-25 हजार दर्शनार्थी प्रतिदिन आते थे, परन्तु अब यह संख्या बढ़कर एक लाख तक हो गयी है। त्यौहारों के दिनों में यह संख्या तीन लाख तक पहुंच जाती है। शहर में पिछले 3-4 वर्षों में सड़क निर्माण, सडक-चौड़ीकरण, हेलीपेड, मेडिसिटी, आवास भवन, पूल, फ्लाय-ओवर एवं अन्य विकास योजनाओं के लिए कई क्षेत्रों में पुराने हजारों छायादार पेड़ काटे गए हैं, हालांकि कुछ संस्थाओं तथा स्थानीय लोगों ने पेड़ कटाई का विरोध भी किया था।
उज्जैन जिले में 6091 वर्ग किलोमीटर भूमि का केवल 0.69 प्रतिशत (42 वर्ग किलोमीटर) में ही वन-क्षेत्र है। पेड़ों की कटाई तथा निर्माण कार्यों से उड़ती धूल आदि से वायु गुणवत्ता, भूजल स्तर तथा मौसम पर विपरित प्रभाव होने लगा है। संस्था ‘रेस्पायर लिविंग साइंस’ की एक रिपोर्ट (जनवरी 2024) अनुसार नवी-मुम्बई तथा उज्जैन में वायु-प्रदूषण (2.5 पीएम के संदर्भ में) 46 बढ़ा है। वर्षभर का औसत ‘वायु-गुणवत्ता सूचकांक’ (ए.क्यू.आई) भी 100 के आसपास रहने लगा है। बेमौसम बरसात के साथ गर्मी एवं सर्दी भी ज्यादा होने लगी है।
धार्मिक स्थानों पर पर्यटकों की संख्या बढ़ने से वहां की अर्थव्यवस्था एवं रोजगार में भले ही वृद्धि हुई हो, परन्तु इससे पर्यावरण की हानि को भी नकारा नहीं जा सकता है। इस संदर्भ में मध्यप्रदेश सरकार को अन्य ‘लोक’ बनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रस्तावित ‘लोकों’ में ‘रामराजा-लोक’ (ओरछा), ‘हनुमान-लोक’ (जाम-सावली), ‘देवी-लोक’ (सलकनपुर), ‘रविदास-लोक’ (सागर), ‘पशुपतिनाथ-लोक’ (मंदसौर) तथा ‘अहिल्याबाई-लोक’ (खरगोन) प्रमुख हैं। हमारे यहां की सोच में तो कण-कण में भगवान का वास बताया गया है, फिर तीर्थ स्थानों पर बढ़ती भीड़ क्या इस सोच का विरोधाभास नहीं है? आचार्य विद्यासागरजी ने एक बार बिल्कुल सही कहा था कि सभी तीर्थ-स्थलों को पर्यटन से मुक्त कर पवित्र-क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिये। (सप्रेस)


