जीवन के बचाव के लिए ‘धरती रक्षा दशक’

भारत डोगरा

पर्यावरण के संकट, जल-जंगल-जमीन के बाद अब मानवीय जीवन को अपनी गिरफ्त में लेने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में ‘धरती रक्षा दशक’ जैसे आपातकालीन उपायों के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

जनवरी 2020 की पहली तारीख को जो नया वर्ष आरंभ हुआ है, यह कोई साधारण वर्ष नहीं है। इसका आगमन एक ऐसे समय में हुआ है जब कई मायनों में विश्व जीवन के अस्तित्व मात्र को बचाने की चुनौतियों से जूझ रहा है। एक जनवरी को महज एक वर्ष आरंभ नहीं हुआ है, एक नया दशक भी आरंभ हुआ है यानि 2020-29 का दशक आरंभ हुआ है। यह दशक भी कोई साधारण या सामान्य दशक नहीं है। विश्व के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने विशेष बयान जारी कर याद दिलाया है कि जलवायु परिवर्तन के संकट के समाधान के लिए यह दशक ही सबसे महत्वपूर्ण दशक है। इस संकट के ‘टिंपिंग प्वाईंट’ यानि चेतावनी है, कि यदि ‘ग्रीनहाऊस गैसों’ का उत्सर्जन एक सीमा से बाहर निकला तो यह मानव नियंत्रण की परिधि से बाहर जा सकता है।

नवीनतम अध्ययन बता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के संकट के समयबद्ध समाधान के जो विश्व स्तर के प्रयास अभी तक हुए हैं वे बहुत अपर्याप्त हैं। इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन के साथ लगभग दस ऐसी गंभीर समस्याएं हैं जो धरती की जीवनदायिनी क्षमता को संकटग्रस्त करती हैं। व्यवहारिक जीवन में इन सबका असर एक साथ झेलना पड़ता है। अतः इन सभी पर्यावरणीय समस्याओं (जैसे जल-संकट, ओजोन-परत के क्षरण का संकट, वायु प्रदूषण, खतरनाक रसायनों व उत्पादों में तेज वृद्धि आदि) के समयबद्ध समाधान योजनाबद्ध ढंग से देश व दुनिया के स्तर पर प्राप्त करना बहुत जरूरी है।

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इसी तरह महाविनाशक हथियारों का संकट भी ऐसा संकट है जिसका समयबद्ध समाधान प्राप्त करना बहुत जरूरी है। विश्व में 14500 परमाणु हथियार हैं व इनमें से मात्र एक प्रतिशत के उपयोग भर से धरती पर जीवन बुरी तरह संकटग्रस्त हो सकता है। इतना ही नहीं, परमाणु हथियारों के खतरनाक उपयोग की संभावना को कम करने वाले समझौते अधिक मजबूत होने के स्थान पर पहले से कमजोर हो रहे हैं या टूट रहे हैं। इन महाविनाशक हथियारों के अतिरिक्त रोबोट हथियारों का विकास बहुत तेजी से किया जा रहा है व निकट भविष्य में यह रोबोट हथियार बहुत ही गंभीर संकट के रूप में हमारे सामने आने की पूरी संभावना है।

इस तरह पर्यावरण की क्षति व महाविनाशक हथियारों के अभूतपूर्ण संकट धरती पर तेजी से बढ़ रहे हैं व धरती की जीवनदायिनी क्षमता को बहुत खतरे में डाल रहे हैं। इस स्थिति में यह बहुत जरूरी है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा के लिए पर्यावरण रक्षा के प्रयासों को और अमन-शांति के प्रयासों को अधिक मजबूत किया जाए और इन प्रयासों के आपसी समन्वय और एकता को बढ़ाया जाए।

यह आज विश्व की सबसे बड़ी जरूरत है और इसे विश्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाने के लिए हम सभी को प्रयास करने चाहिए। इसके साथ ही यह कहना भी जरूरी है कि यह सब प्रयास न्याय व समता के दायरे में ही होने चाहिए। मौजूदा दौर में न्याय व समता की जरूरत पहले से और अधिक बढ़ गई है। अतः हम सभी को न्याय व समता की राह पर चलते हुए पर्यावरण व हिंसा तथा हथियारों की सबसे बड़ी समस्याओं के समयबद्ध समाधान प्राप्त करने चाहिए।

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इस संदर्भ में यदि वर्ष 2020 से 2029 के कालखंड को विश्व स्तर पर ‘धरती रक्षा दशक’ घोषित किया जाए तो इससे बहुत सहायता मिलेगी। इस तरह का एक अभियान इस समय चल भी रहा है जिसमें ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के महासचिव से मांग की गई है कि आगामी दशक को ‘धरती रक्षा दशक’ घोषित किया जाए। इस मांग को देश के अनेक जाने-माने विद्वानों व समाजसेवियों, विशेषकर गांधीजी की सोच से जुड़े विद्वानों व समाजसेवियों व संगठनों का समर्थन मिला है। यदि इस दिशा में प्रयास और प्रबल किए जाएं और आगामी दशक को वास्तव में विश्व स्तर पर ‘धरती रक्षा दशक’ घोषित कर दिया जाए तो इससे धरती की रक्षा संबंधी अनेक कार्यवाहियों की संभावना बहुत बढ़ जाएगी।

इस राह पर चलते हुए हम विश्व के अनेक प्रेरणादायक व्यक्तियों व संगठनों से मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हैं। इस संदर्भ में महात्मा गांधी की सोच विशेष तौर पर बहुत प्रेरणादायक व सहायक है क्योंकि उन्होंने बहुत पहले ही पर्यावरण के संकट को समझ लिया था और इसके समाधान के लिए सादगी और समता के बुनियादी जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित किया था। आज इस संदेश को याद रखना बहुत जरूरी है क्योंकि विश्व में पर्यावरण की रक्षा करने वाले कई व्यक्ति व संगठन भी सादगी व समता के महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। दूसरी ओर गांधीजी के विचार से जुड़े लोगों के लिए यह संदेश बहुत स्पष्ट है। (सप्रेस)

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