लोकतंत्र में नागरिकत्व की प्राणप्रतिष्ठा

अनिल त्रिवेदी

बहत्तर साल के लोकतंत्र में भारत के नागरिकों में लोकतांत्रिक नागरिक संस्कार और नागरिक दायित्वों की समझ और प्रतिबध्दता का स्वरूप कैसा हैं? इस सवाल का उत्तर ही तय करेगा भारत के नागरिक अपने जीवनकाल में नागरिक दायित्व को लेकर गंभीर हैं,लापरवाह हैं या तटस्थ हैं उन्हें इन सबसे कोई लेना देना नहीं हैं। नागरिक उत्तरदायित्व को समझें और निभाये बिना लोकतंत्र का स्वरूप निखर नहीं सकता।लोकतंत्र का अर्थ अपने मत से जन प्रतिनिधि और सरकार चुनना मात्र नहीं हैं।

    आज से करीब तीस साल पहले स्वाधीनता संग्राम और समाजवादी आन्दोलन के अग्रणी मामा बालेश्वरदयाल से एक शाम उनकी बामनिया स्थित कुटिया में देश की राजनीति पर लम्बी चर्चा के दौरान मैंने मामाजी से पूछा था आगे आने वाले समय में हमारा देश कैसा होगा ? मामाजी ने जवाब दिया अनिल जैसा देश के नौजवान चाहेंगे वैसा देश बनेगा। हमारे देश में आज सबसे अधिक नौजवान नागरिक हैं। एक अरब पैंतीस करोड़ भारतीय नागरिकों में से लगभग एक अरब से ज्यादा नागरिक नौजवान हैं। भारत में जहां जाओ या देखो नौजवान ही नौजवान ही नज़र आते हैं। बहत्तर साल के लोकतंत्र में भारत के नागरिकों में लोकतांत्रिक नागरिक संस्कार और नागरिक दायित्वों की समझ और प्रतिबध्दता का स्वरूप कैसा हैं?इस सवाल का उत्तर ही तय करेगा भारत के नागरिक अपने जीवनकाल में नागरिक दायित्व को लेकर गंभीर हैं,लापरवाह हैं या तटस्थ हैं उन्हें इन सबसे कोई लेना देना नहीं हैं।    

नागरिक उत्तरदायित्व को समझें और निभाये बिना लोकतंत्र का स्वरूप निखर नहीं सकता। लोकतंत्र का अर्थ अपने मत से जन प्रतिनिधि और सरकार चुनना मात्र नहीं हैं। नागरिकों के हक,अधिकार और संविधान के ढांचे में गरिमामय रुप से जीते रहने के लिये कल्याणकारी राज्य व्यवस्था को देश के हर हिस्से में खड़ा करना देश के नागरिकों का नागरिक दायित्व हैं।

       लोकतंत्र सब के सामूहिक सदभाव,समझ,सहभागिता और निरन्तर जागरूकता, सक्रियता से चलने वाला राजनैतिक,सामाजिक,आर्थिक अवसरों कों हर नागरिक तक बराबरी से पहुंचाने का तत्रं हैं।लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनी हुई सरकार नहीं हैं।लोकतंत्र का अर्थ नागरिकों की जिन्दगीभर जीवन के हर आयाम में जागरूक भागीदारी हैं।लोकतत्रं में नागरिकों के मन में सरकार या शासकदल का भय या डर नहीं होता।सरकार और शासकदल के मन में यह सावधानी होना चाहिये की हमसे कोई लोकविरोधी निर्णय हुआ तो लोग उसे स्वीकार नहीं करेगें।लोगों का यह लोकतांत्रिक दायित्व हैं की राज्य,समाज,धर्म और नागरिक स्वयं भी मनमानी और अन्याय न कर सकें।सच्चा लोकतत्रं तब स्वरूप लेता है जब राज्य और समाज परस्पर नागरिकों को निर्भय,निष्पक्ष और नीतिवान बनने का हर सम्भव प्रयास करे ।यह प्रयास हीं राज्य और समाज का प्राणतत्व हैं कि दोनों मिलकर उत्तरदायित्वपूर्ण नागरिकों की निरन्तर प्राणप्रतिष्ठा करें।

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    कमजोर मन के,संकल्प हीन,भयभीत और विचारहीन नागरिक लोकतंत्र और समाज को प्राणहीन और श्रीहीन बना देते हैं और नागरिक अपने कर्मों से नागरिकत्व को निष्प्राण और निष्प्रयोजन भीड़ में बदल ड़ालते हैं।भीड़ तंत्र लोकतंत्र नहीं हैं। भीड़ को तीतर बीतर करना किसी भी  सरकार के लिये चुटकी बजाने जैसा आसान काम हैं।पर जीवन की चेतना से भरपूर सक्रियता के साथ राजकाज और समाज को लगातार चौकन्ना रखने वाले नागरिकों से संवाद करने में  सरकार भी संकोच करती हैं। सरकार के मन में नागरिकों की चेतना का दबाव ही चैतन्य लोकतंत्र की निशानी हैं।

        लोकतंत्र लापरवाह और मौज मस्ती में पड़े लोगों का तंत्र नहीं हैं। देश के सारे नागरिक चैतन्य और सतत सक्रिय मानस के हैं तो न तो विधायिका,न कार्यपालिका और नहीं न्यायपालिका नागरिक हितों की अवहेलना करने की बात सपने में भी नहीं सोंच सकती।लोकतंत्र में चुने हुए जनप्रतिनिधि नागरिकों के हितों के रखवाले होते हैं। उत्तरदायी और कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को नागरिकों के कल्याण के लिये सतत सक्रिय और प्रतिबद्ध होना पहली अनिवार्यता हैं। लोकतंत्र नागरिकों,जनप्रतिनिधि याने पंच सरपंच से लेकर पार्षद,विधायक,सांसद तथा मंत्री,मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक से यह अपेक्षा करता है कि इनमें से हर कोई  नागरिकों के प्रति अपने उत्तर दायित्व के प्रति हर समय चैतन्य रहे और लापरवाही ,मनमानी और निष्क्रियता से लोकतंत्र के मूल स्वरूप को कमजोर न होने दें। लोकतंत्र लोगों के लिये लोगों की शासन व्यवस्था हैं जिसे बनाये रखना जन प्रतिनिधियों का मूल उत्तरदायित्व हैं।

      लोकतंत्र में सरकार चुनने का अधिकार नागरिकों का संविधान सम्मत अधिकार हैं। पर यदि चुनी हुई सरकार अन्यायी हो जाय संविधान अनुसार काम नहीं करें जन विरोधी निर्णय ले,लोगों के गरिमामय रूप से जीवन जीने के मूलभूत अधिकार को छीन ले और चैतन्य नागरिक विचार शून्य हो जाय या अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार के होते हुए भी मौन हो जावे । तो इसे नागरिकों काअनागरिकत्व ही कहा जावेगा। लोकतंत्र में आजादी का अर्थ एकांगी नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी को सर्वसुलभ बनाना राज,समाज और नागरिकों का सामुहिक उत्तरदायित्व हैं। राज लापरवाह हो या मनमानाऔर अन्यायी हो जावे तो समाज और नागरिक अलख जगाने के उत्तरदायित्व को टाल नहीं सकते। लोकतंत्र लोगों के लिये होता हैं और लोग यदि अपने अधिकारों के हनन को चुपचाप टुकुर टुकुर तमाशाबीन बने रह सहते हैं तो सरकार से ज्यादा दोष नागरिकों की चुप्पी और लापरवाही का माना जायेगा। आज़ादी के लिये लड़ने वाले समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया का लोकतंत्र को जीवन्त बनाने की दृष्टि से मानना था” जिन्दा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती” याने लोकतंत्र में मतदान कर सरकार बनाने से ही न तो लोकतंत्र चलता हैं न नागरिकत्व। चुनी हुई सरकार के कामकाज की अखंड निगरानी से लोकतंत्र भी जीवन्त होता हैं और नागरिक स्वयं भी अपने हाथों अपनी प्राण प्रतिष्ठा कर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का प्राणप्रण से निर्वाह करते हैं।

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      जिन्दा कौम न होना यानी ऐसे नागरिक जो जिन्दा होते हुए भी जिन्दा नहीं होते और उदास और लापरवाह बन जाते।हम ने तो सरकार चुन दी अब जो करना हैं सरकार करें ऐसे उदगार निकाल कर कौम की जीवनी शक्ति पर  ही सवाल खड़ा कर देते हैं। आज के काल के नागरिक का जीवन आभासी प्रचार माध्यमों के प्रभाव में ज्यादा आता महसूस होता हैं।नागरिक जीवन पर प्रचार तंत्र का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता दिखाई देता हैं।राज्य की गतिविधि पर नागरिकों के अभिमत का कोई दबाव नहीं हैं।युवा आबादी के बुनियादी सवालों पर नागरिक समाज में छिटपुट चर्चा भी नहीं चलती।

      लोकतंत्र में नागरिक ज़बान खामोश रहे और प्रचार माध्यम मनचाहे विषयों पर मनमानी और नियंत्रित बहस लोकतंत्र का जीवन्त स्वरूप नहीं हैं।लोहिया ने कहा था जिन्दाकौम पांच साल इंतजार नहीं करती पर लोकतंत्र में नागरिक पहल तो दूर की बात हैं नागरिक जीवन के बुनियादी सवालों पर बहस तो चलती ही नहीं चौबिस धण्टे बारह महिने प्रचार माध्यमों में बनावटी बहस चलती हैं।वयोवृद्ध आबादी यदा-कदा ऐतिहासिक राजनैतिक सामाजिक बुनियादी सवालों को बुदबूदाती रहती है पर अधिकांश नागरिक घनघोर सन्नाटे की तरह निरन्तर मौन रहकर टुकर टुकूर देखते रहते हैं।लोकतंत्र और नागरिक दोनों की आभा उनकी वैचारिक तेजस्विता से हैं।निजी और सार्वजनिक जीवन में नागरिकत्व की प्राण प्रतिष्ठा नागरिक की निर्भयता,वैचारिक व्यापकता और राज और समाज को निरन्तर न्यायपूर्ण दिशा में सतत सक्रियता के साथ जीवन्त बनाये रखने से होती हैं ।राज और समाज की मनमानी और अनदेखी को अनदेखा कर चुप रहने से नहीं।हमारी अनदेखी और अनमनापन लोकतंत्र और नागरिकत्व दोनों की प्रखरता और तेजस्विता को क्षीण ही करता है।बेबस और कमजोर जीवन नागरिकत्व के दायित्वबोध में कमी का परिचायक हैं। सतत चैतन्य नागरिक ही स्वयं अपनी और लोकतत्रं की प्राण प्रतिष्ठा का मूल कारक है।

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