सुरेश भाई

गंगा : मैली रह गईं मोक्षदायिनी

हमारे समाज के पाखंड को देखने का एक आसान तरीका नदियों की बदहाली का भी है। जिन नदियों को हम अहर्निश पूजते, माता का दर्जा तक देते हैं, उनमें तरह-तरह की औद्योगिक, रासायनिक और अस्पताली गंदगियों को उडेलते हुए कोई…

सद्भावना के लिए ‘सर्व धर्म समभाव’

महात्मा गांधी ने आजाद भारत के लिए कई तरह की योजनाओं, कार्यक्रमों और नीतियों की कल्पना की थीं, लेकिन दुर्भाग्य से वे आजादी के साढे पांच महीनों में ही हम से सदा के लिए विदा हो गए। बाद में उनके…

Uttarakhand : विकास की खातिर हिमालय की हत्या

सब जानते हैं कि भारत, खासकर उत्तर भारत के प्राकृतिक वजूद के लिए हिमालय का होना कितना जरूरी है, लेकिन तिल-तिल मरते हिमालय को बचाने की पहल कोई नहीं करता। कभी, कोई वैज्ञानिक या स्थानीय समाज इसको लेकर आवाज उठाते…

जंगल बचाने की चुनौती

हाल के दिनों में बुंदेलखंड के बक्सवाहा इलाके में हीरा-खनन की खातिर लाखों पेड़ों की बलि देने की प्रस्तावित परियोजना ने सभी का ध्यान खींचा है। हीरा बनाम प्राणवायु की इस बहस में देशभर के लोग हिस्सेदारी कर रहे हैं।…

उत्तराखण्ड : घटती कृषि भूमि

विकास की जिस अवधारण को लेकर हम अपनी कथित प्रगति करने में लगे हैं, उसमें सभी तरह के प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी साफ दिखाई देती है। उत्तराखंड इससे अछूता नहीं है जहां थोडे समय में करीब सवा लाख हैक्टेयर कृषि…

बिहारी लाल : मौन सेवक व कर्मयोगी की तरह निभाते रहे भूमिका

स्‍मृति शेष : श्रध्‍दांजलि महात्मा गांधी, विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण के विचारों को आत्मसात करने वाले समाजसेवी एवं सर्वोदयी नेता बिहारी लाल नागवाण ने गांधीवादी परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ समाज में व्याप्त कुरूतियों को उखाड़ फेंकने के…

‘विकास’ की बलि चढ़ता हिमालय

उत्तराखंड की ताजा त्रासदी ने एक बार फिर उस सनातन सवाल को उछाल दिया है कि आखिर विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियां हमारे विनाश की वजह क्यों बनती जा रहीं हैं? क्या उत्तराखंड में बनी और बन रहीं…

कोविड में कितनी साफ रहीं, गंगा?

आंकडे बताते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौर में लगे लॉकडाउन में गंगा और यमुना सरीखी उसकी सहायक नदियां निर्मल हो गई थीं। इस भुलावे में रहकर कि महामारी के चलते गंगा साफ हो जायेगी, यह सवाल नागरिकों के जिन्दा…

‘घसयारियों’ को मान दिलाने वाले त्रेपन नहीं रहे

कुछ दिन पहले उत्‍तराखंड के ख्‍यात सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान हमसे सदा के लिए विदा हुए हैं। प्रस्‍तुत है, उनके साथी रहे सुरेश भाई के ये संस्‍मरण। हिमालय पर्वत की तरह अपने ही स्थान पर अडिग रहने वाले त्रेपन…

रक्षा करने के लिए पेड़ों को बांधी जाती है, राखी

सिर्फ सरकारों के भरोसे प्रकृति-पर्यावरण की रक्षा नहीं हो सकती, उसमें समाज को हाथ बंटाना पड़ता है। यह काम यदि किसी अच्‍छी, बरसों पुरानी सामाजिक परम्‍परा की मार्फत होने लगे तो जाहिर है, वे अधिक मजबूत और स्‍थायी होते हैं।…