नरेंद्र चौधरी

जहरीली खेती से जुड़ा है, ‘भोपाल गैस कांड’

2-3 दिसंबर 1984 : भोपाल गैस त्रासदी के 37 साल लंबे, दुखद और तकलीफ देह 37 साल गुजारने के बाद क्या हम यह कहने लायक हो पाए हैं कि अब कोई दूसरा ‘भोपाल गैस कांड’ नहीं होगा? जहरीले रासायनिक खादों,…

कोरोना : हम इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं?

कोरोना वायरस की भीषण त्रासदी ने केन्द्र और राज्य सरकारों की लापरवाहियों की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने समय रहते थोडी समझदारी से काम लिया होता तो आज हम इस बदहाली में नहीं फंसे होते। वे केवल ‘केन्द्रीय स्वास्थ्य…

कोविड-19 : आपदा में गंवाया अवसर

साल-सवा साल के कोविड-19 के दौर ने हमें इतना तो बता ही दिया है कि किसी आपदा से निपट पाने में हम बेहद फिसड्डी हैं। लॉकडाउन, दवाओं, अस्पतालों, ऑक्सीजन आदि जीवन रक्षक जरूरतों की बदइंतजामी ने हजारों लोगों के जीवन…

राष्‍ट्रवाद और आत्‍मनिर्भरता पर क्‍या कहते थे, ‘गुरुदेव?’

‘गुरुदेव’ रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की बात करें तो राष्‍ट्रवाद और आत्‍मनिर्भरता का उल्‍लेख आ ही जाता है, लेकिन क्‍या उनके हवाले से ये दोनों मूल्‍य ठीक उसी तरह जाने-पहचाने जा सकते हैं जिस तरह आजकल इन्‍हें उपयोग किया जा रहा है?…

कोविड-19 : कुछ सबक, कुछ सवाल

कोविड-19 को ‘परास्‍त’ करने की आपाधापी में कई तरह की गफलतें हो रही हैं और ऐसे में सरकारें अपनी-अपनी ‘पीठ ठुकवाने’ में मशगूल हैं। कहा जा रहा है कि महामारी मानी जाने वाली इस बला से हम अव्‍वल और बेहतर…

ग्रहण को लेकर मान्यताएं समाज में इतनी गहरी हैं कि इन्हें बदलने में समय लगेगा

सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण पर एक पिता का पुत्रवधू को लिखा एक खुला पत्र अभी हाल ही में पिछले माह 5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच तीन ग्रहण – एक सूर्य ग्रहण और दो चन्द्रग्रहण पडे। इन ग्रहणों…

अंधविश्‍वास की बजाए अक्‍ल से जीतें, कोरोना का मोर्चा

कई तरह की अच्‍छाई-बुराई, समझ-नासमझी और विश्‍वास-अंधविश्‍वास महामारी के दौर में और भी तीखे रूप में उभर कर सामने आ जाते हैं, लेकिन क्‍या बुराई, नासमझी और अंधविश्‍वास के सहारे संकट पर काबू पाया जा सकता है? कोरोना वायरस के…