झाबुआ से लौटकर कुमार सिद्धार्थ की रिपोर्ट झाबुआ, 2 मार्च। आदिवासी अंचल का प्रसिद्ध लोकपर्व भगौरिया इस बार झाबुआ के उत्कृष्ट मैदान में पूरे उत्साह, परंपरा और बदलते सामाजिक-राजनीतिक रंगों के साथ देखने को मिला। होली से पहले लगने वाले…
प्याज, लहसुन और फूलों समेत सब्जियों के लिए ख्यात नासिक अब वाइन उद्योग को बढ़ावा देने में लगा है, लेकिन क्या यह बाजार के अलावा व्यापक समाज के लिए भी मुनासिब होगा? अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों ने यही…
भोपाल, 30 जनवरी। ‘’महात्मा गांधी केवल विचारक या नेता नहीं थे, बल्कि वे कर्म के दार्शनिक थे। उनका दर्शन बोलने में नहीं, बल्कि करने में प्रकट होता है। गांधी को समझने के लिए उन्हें देवता की तरह पूजने के बजाय…
पश्चिमी घाटों को बचाने की लड़ाई को वैज्ञानिक और नैतिक आधार देने वाले प्रख्यात परिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल ‘धरती पुत्र’ के नाम से पहचाने जाते थे। गाडगिल ने भारतीय विज्ञान संस्थान में पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र की स्थापना की और गाडगिल आयोग…
महेंद्रभाई की 23वीं पुण्यतिथि एक ऐसे सार्वजनिक जीवन को याद करने का अवसर है, जिसमें सादगी, सेवा और नैतिक दृढ़ता केंद्रीय मूल्य रहे। सर्वोदय प्रेस सर्विस के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता को सत्ता के समीप नहीं, समाज के पक्ष में…
स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय साक्षी और गांधीवादी विचारक माणकचंद कटारिया (1925–1977) का जीवन सेवा, वैचारिक स्पष्टता और आत्मसंयम की मिसाल है। बाल्यावस्था से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कटारिया ने राजनीति से अधिक समाज-निर्माण को महत्व दिया। इस गांधीवादी विचारक की…
21वीं सदी की दुनिया जलवायु संकट, विषैली हवा और औद्योगिक जोखिमों की भयावह सच्चाइयों से घिरी है, जिनका सबसे तीखा असर महिलाओं पर पड़ता है। वैश्विक शोध जहाँ आपदाओं में महिलाओं की मृत्यु दर चौदह गुना अधिक बताते हैं, वहीं…
प्रकृति से बढ़ती दूरी अब केवल भावनात्मक संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, प्रकृति से अलगाव पर्यावरणीय विनाश का मूल कारण है। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने विकास तो दिया, पर…
पीढियों से हमारे यहां परीक्षा की एकमात्र तरकीब वापरी जा रही है – सालभर रट्टा मारकर आखिरी कुछ दिनों में उसे उत्तर- पुस्तिकाओं में ‘उगलते’ रहने की, लेकिन क्या इससे विद्यार्थियों में प्रतिभा, समझ और रचनात्मकता विकसित होती है? यदि…
चंद्रकांत देवताले (जन्म 7 नवंबर 1936, निधन 14 अगस्त 2017) हिंदी कविता के उन कवियों में से थे, जिन्होंने जीवन की भूख, श्रम और पीड़ा को अलंकारों के बिना, सधे और सधे हुए शब्दों में कहा। उनकी कविता मनुष्य की…