कुछ दिन पहले तक केन्द्र की भाजपा सरकार के लाडले माने जाने वाले सोनम वांगचुक और उनके संगी-साथी अचानक देशद्रोही, विदेशी पूंजी पर पलने वाले और हिंसा भडकाने वाले कैसे और क्यों हो गए? ध्यान से देखें तो सरकारों का…
हिमालय में जारी विनाश की वजह क्या सिर्फ भगवानजी की बरसाई जा रही आपदा या ‘जलवायु – परिवर्तन’ भर है? क्या इसमें हम इंसानों की भी कोई भागीदारी है? जैसे ऊर्जा, बाढ़-नियंत्रण और सिंचाई के कथित लाभों के लिए इफरात…
आजादी के नतीजे में हमें जो सर्वाधिक काम की बात मिली है, वह है लोकतंत्र, लेकिन क्या हम उसे ठीक तरह से वापर रहे हैं? क्या आज, 78 साल बाद एक देश, एक समाज और एक राज्य की हैसियत से…
कई बार सरकारें भी जनहित में कारगर फैसले ले लेती हैं। हाल में बैलों की खेती को प्रोत्साहन देने का राजस्थान सरकार का फैसला इसी तरह का है। ध्यान से देखें तो बैलों से की जाने वाली खेती का अर्थशास्त्र…
करीब सवा तीन सौ साल पहले रुखसत हुए औरंगजेब की कब्र उखाड़ने से लगाकर बरसों पुराने गैर-हिन्दू उपासना-गृहों को खोदकर उन्हें हिन्दू साबित करने की मौजूदा हुलफुलाहट ने, एक समाज की हैसियत से हमें बेहद अज्ञानी और इतिहास-विमुख साबित कर…
आजकल दुनियाभर में जंगल की आग सचमुच ‘जंगल की आग’ की तरह फैल रही है। सुदूर अमरीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से लगाकर हमारे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तक दावाग्नि की चपेट में आ रहे हैं। कैसे निपटें इस संकट से? दुनिया…
सत्ता पर काबिज होने की ललक ने हमारी राजनीतिक जमातों को साम्प्रदायिक बना डाला है, लेकिन क्या इससे हम एक बेहतर समाज बना पाएंगे? प्रस्तुत है, इसी की पड़ताल करता कुलभूषण उपमन्यु का यह लेख। हम भाजपाई हो सकते हैं…
प्रजातंत्र में निष्पक्ष चिंतन राज्य, सरकार और समाज को सर्वजन-हिताय बनाए रखता है, लेकिन हमारे यहां के मौजूदा पार्टी-प्रधान ढांचे ने पक्षधरता की बेहद कमजोर छवि बनाई है। नतीजे में समूचा तंत्र शिथिल होता जा रहा है। क्या हैं, पक्षधरता…
अपनी शुरुआत में भले ही प्रजातंत्र ने गहरी असहमतियां झेली हों, लेकिन धीरे-धीरे वह एक ऐसी शासन-प्रणाली बन गया जिसके बिना दुनिया के अधिकांश देश अपने काम-काज नहीं चला पाते। जिन देशों में प्रजातंत्र नहीं है वहां उसे लाने के…