अमरीका के साथ हुई हाल की ‘ट्रेड-डील’ के बारे में जितना, जो कुछ पता चल रहा है उससे उजागर हो रहा है कि यह ‘डील’ भारत के किसानों के लिए भांति-भांति के संकट खड़े करेगी। सोयाबीन उनमें से एक है।‘ट्रेड…
नीलगायों और जंगली सुअरों का फसलों को चौपट करने के लिए खेतों में उतरना एक तरह से कथित ‘वैज्ञानिक वानिकी’ का ही नतीजा है। कई इलाकों में वन्यप्राणियों के वन-निवासियों से घातक द्वंद्व भी इसी पद्धति से उपजे हैं। इनसे…
चार दिन बाद शुरु होने वाले संसद के मानसून सत्र में, उम्मीद है, किसानों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यानि ‘एमएसपी’ की कानूनी गारंटी पर गंभीरता से चर्चा हो। क्या हैं, ‘एमएसपी’ को कानूनी हक बनाने में अडंगे? और ये…
रोजगार और व्यवसाय को बढ़ाने के लिए एक तजबीज आई है – स्टार्टअप, लेकिन उन्हें परवान चढाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। मसलन – स्टार्टअप को कारगर बनाने के लिए गंभीरता से किया गया शोध। तैयारी की…
इन दिनों सोयाबीन को लेकर मध्यप्रदेश में भारी बवाल मचा है। फसल की लागत और लगातार बढ़ते अन्य खर्चों के चलते किसान सोयाबीन का ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़वाने के लिए आंदोलनरत हैं और सरकार इसे लेकर ना-नुकुर कर रही है।…
बहुपठित उपन्यास ‘रागदरबारी’ के एक प्रसंग में कहा गया है कि लगता है, शिक्षा-व्यवस्था सड़क किनारे की ऐसी आवारा कुतिया है जिसे हर कोई गुजरता आदमी बेवजह लात जमा देता है। आजकल शिक्षा में किए जा रहे ना-ना प्रकार के…
दो हजार रुपए के नोटों की वापसी को सरकार और ‘आरबीआई’ यूं तो ‘क्लीन नोट’ यानि चार-पांच साल चल चुके कटे-फटे–गले नोटों को बदलने की सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं, लेकिन जिस तरह से इसे किया गया उसने ‘आरबीआई’ की…
किसी भी देश की आर्थिक सेहत में बैंकों की भूमिका अहम होती है,लेकिन आजकल तीसरी दुनिया, खासकर भारत सरीखे देशों में बैंकों को आम जनता को लूटने की नायाब तरकीब की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। नतीजे में समूचा…
साठ के दशक में लाई गई ‘हरित-क्रांति’ ने बेहद सीमित, खासकर गेहूं-चावल की, फसलों को बेतरह बढ़ावा दिया था, लेकिन इसने कई पौष्टिक, कम लागत की आसान फसलों को दरकिनार कर दिया था। क्या आज के दौर में फिर से…
महामारी के टीके द्वारा हमारा लक्ष्य है कि कम से कम 80 प्रतिशत लोगों का टीकाकरण हो जाए ताकि समाज में एक ‘कवच’ बन जाए और महामारी को फैलने का रास्ता ना मिले। यह एक सार्वजनिक ज़रूरत है। इसे मात्र…