साम्ययोगी समाज का आधार विकेंद्रित अर्थरचना है

14 अगस्‍त को विनोबा विचार प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय संगीति में डॉ.पुष्पेंद्र दुबे

समाज में अशांति का कारण श्रम को टालना है। विषमता का मूल कारण यही है। विज्ञान के साधन इसे दूर करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। गलत आर्थिक रचना ने समाज में यह दुःख उपस्थित किया है। विनोबजी ने नयी अर्थ रचना के लिए साम्ययोग का विचार प्रस्तुत किया। इस अर्थरचना की स्थापना विचार से ही की जा सकती है। साम्ययोगी समाज का आधार विकेंद्रित अर्थरचना है।

उक्त विचार विनोबा जी की 125वीं जयंती के अवसर पर विनोबा विचार प्रवाह में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगीति में डॉ.पुष्पेंद्र दुबे  व्यक्त किए। डॉ. दुबे ने कहा कि समाज में व्याप्त भयानाक विषमता से कई समस्यायें पैदा हो रही हैं। आज परिश्रम करने वाले को नीचा माना जाता है। शरीर श्रम करने वाले को नैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती। आज समाज में अशांति का मुख्य कारण श्रम को टालना है। श्रम का स्थान पैसे ने लिया है और प्रेम का स्थान संघर्ष ने। दोनों के कारण आज दुनिया में दुःख व्याप्त है।

डॉ. दुबे ने कहा कि विनोबा जी के साम्ययोगी समाज की नींव ग्राम आधारित अर्थरचना है और ग्रामदान के बिना गांव असुरक्षित हैं। विकेंद्रित अर्थरचना में खेती और गोपालन के साथ खादी और ग्रामोद्योग गांव की रीढ़ हैं। विनोबा जी साम्ययोग की सिद्धि के लिए दो चीजें जरूरी मानते हैं: श्रमनिष्ठा और श्रमप्रतिष्ठा। डॉ. दुबे ने बताया कि प्रयोगधर्मी विनोबा ने सन् 1950 में स्वावलंबी साम्ययोग का प्रयोग किया। इस प्रयोग में अन्न स्वावलंबन, वस्त्र स्वावलंबन, शिक्षण और आरोग्य स्वावलंबन, कम से कम आठ घंटा मजदूरी, सब कामों का समान मूल्य, समान वेतन और सामूहिक रसोई घर को शामिल किया। साम्ययोग बुनियादी विचार है, जिसके नैतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिणाम होंगे। दुनिया में प्रचलित विचार प्रवाह का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही विनोबा जी को यह कहने की प्रेरणा हुई कि भविष्य में दुनिया में अगर किन्हीं दो शक्तियों का मुकाबला होने वाला है तो वह साम्यवाद और सर्वोदय में होगा। बाकी शक्तियां ज्यादा दिन नहीं टिकेंगी। स्वतंत्रता आंदोलन में खादी आंदोलन की विशेष भूमिका रही। विनोबा जी ने खादी को बगावत का झंडा निरूपित किया। विनोबा जी ने देश में गोवंशहत्याबंदी के लिए मुम्बई के देवनार कतलखाने के सामने सत्याग्रह का आदेश दिया। यह सत्याग्रह तैंतीस सालों तक चला। बैल कतल बंद होने के बाद इस सत्याग्रह का समापन किया गया।

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द्वितीय वक्ता गोग्रास के संपादक श्री अनिल फरसोले ने कहा कि गोवंश अहिंसक जीवन पद्धति का आधार है। गोवंश के प्रति मौलिक चिंतन से इस विचार को समृद्ध किया। कृषि प्रधान भारत का आधार गोवंश है। इसके रक्षण से भारत सहित दुनिया का रक्षण होगा। मांसाहार मुक्ति में गाय का योगदान अप्रतिम है। विनोबा जी ने जीवन की समस्याओं के हल के लिए करुणा तत्व को प्रमुख माना है। इससे मानव जीवन पुष्ट और समृद्ध होगा। संचालन श्री संजय राय ने किया। आभार श्री रमेश भैया ने माना।

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