भारत-अमेरिका ट्रेड डील के खिलाफ किसानों की हुंकार : चंडीगढ़ में बना ‘संयुक्त मोर्चे’ का नया स्वरूप

देश की कृषि और आर्थिक संप्रभुता को लेकर मंडराते खतरों के बीच, 25 जून को चंडीगढ़ का किसान भवन एक ऐतिहासिक बैठक का गवाह बना। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में देश भर के किसान, मजदूर और सामाजिक संगठन एक मंच पर आ गए हैं। इस बैठक में केवल एक ट्रेड डील का विरोध नहीं, बल्कि उस डर और आक्रोश को भी महसूस किया गया जो खेती-किसानी के भविष्य को लेकर देश के अन्नदाता के मन में घर कर गया है।

एसकेएम (गैर-राजनीतिक), एकेएमएम (गैर-राजनीतिक), आजाद किसान मोर्चा, और राष्ट्रीय किसान महासंघ,भारतीय किसान ब्रिगेड, सिफा समेत देश के तमाम बड़े किसान संगठनों ने आज एक ऐसी लकीर खींची है जो किसी भी राजनीतिक सीमा से ऊपर है। हरियाणा और पंजाब से लेकर महाराष्ट्र, केरल, ओडिशा और उत्तराखंड तक—भारत के अलग-अलग कोनों से आए प्रतिनिधियों ने एक स्वर में घोषणा की है कि वे इस डील के खिलाफ अब एक होकर लड़ेंगे। भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार गुरनाम सिंह चढूनी की अगुवाई में हुई इस चर्चा में हर चेहरा इस बात को लेकर गंभीर था कि यह डील सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के रोजगार से जुड़ी है।

 इस बैठक में कई दिग्गज किसान नेता शामिल हुए, जिनमें गुरनाम सिंह चढ़ूनी, बलबीर सिंह राजेवाल, वी.एम.सिंह, प्रकाश पोहरे और सरवन सिंह पंधेर प्रमुख थे। बैठक के दौरान वक्ताओं ने बेहद तल्ख तेवर अपनाते हुए साफ कर दिया कि कृषि और पशुपालन के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी का कहना है कि ​केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील भारतीय किसानों के लिए एक ‘डेथ वारंट’ है। इस समझौते से अमेरिकी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों की डंपिंग होगी, जिससे हमारे छोटे किसान पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे और डेयरी व पोल्ट्री सेक्टर का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। यह डील न केवल खतरनाक जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों को भारत में लाएगी, बल्कि हमारी MSP प्रणाली को भी खत्म कर देगी। मैं सरकार को चेतावनी देता हूँ कि अन्नदाता के भविष्य से खिलवाड़ करना बंद करे। यदि यह जन-विरोधी समझौता लागू हुआ, तो देश में पिछले आंदोलन से भी बड़ा और व्यापक सत्याग्रह छेड़ा जाएगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार की होगी।

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राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक वी एम सिंह ने देश भर के किसानों से आह्वान किया कि कल से ही अपने गाँव, ब्लॉक, तहसील और जिला मुख्यालयों पर जाकर प्रशासनिक अधिकारियों को इस डील के खिलाफ कड़ा ज्ञापन सौंपें। जब हर तहसील से विरोध की आवाज उठेगी और मीडिया के जरिए यह सरकार तक पहुँचेगी, तब कहीं जाकर इनके कान पर जूँ रेंगेगी। यह ज्ञापन आने वाले उस निर्णायक सत्याग्रह की पहली सीढ़ी है, जिसे सरकार को झेलना ही पड़ेगा। अपनी ताकत दिखाएं, क्योंकि आपकी खामोशी ही इस सरकार का हौसला बढ़ा रही है।

चंडीगढ़ में आयोजित किसान सम्मेलन में भारतीय किसान ब्रिगेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सिफा के कार्यकारी अध्यक्ष प्रखर किसान नेता प्रकाश पोहरे ने देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा किया है। पोहरे ने ‘अमेरिकन काउंसिल फॉर यंग पॉलिटिकल लीडर्स’ (ACYPL) के साथ भारत के शीर्ष नेतृत्व के जुड़ाव को सीधे तौर पर भारतीय हितों के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री,3 कैबिनेट मंत्री और देश के उच्च पदों पर बैठे 150 से अधिक आईएएस अधिकारी अमेरिका के ACYPL कार्यक्रम से प्रशिक्षित हों, तो उनसे भारतीय किसानों के हक में निर्णय लेने की उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि नीतियां भारत के बजाय अमेरिकी हितों को साधने वाली ही होंगी। पोहरे ने इस बात पर जोर दिया कि 1991 के बाद से यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है। चुनिंदा लोगों को अमेरिका बुलाकर प्रशिक्षित किया गया, उन्हें तैयार किया गया और फिर सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बैठाया गया ताकि भारत की प्रशासनिक धुरी पर नियंत्रण बना रहे। प्रकाश पोहरे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो नीतियां आज देश में लागू हो रही हैं, वे विदेशी दबाव का नतीजा हैं। जब नीति-निर्धारक स्वयं विदेशी प्रोग्राम के ‘एल्मनाई’ हों, तो देश की वास्तविक आजादी खतरे में है। आम भारतवासी को यह समझना होगा कि यदि निर्णय विदेशी हितों के लिए लिए जा रहे हैं, तो हम केवल नाम के स्वतंत्र हैं।

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पोहरे का यह बयान व्यवस्था के भीतर छिपे विदेशी हस्तक्षेप और उसके कारण भारतीय कृषि एवं अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के प्रति एक चेतावनी है।

बैठक सिर्फ एक चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें आगे के संघर्ष को और धार देने का खाका भी तैयार किया गया है। आने वाली 1 जुलाई को फिर से चंडीगढ़ के किसान भवन में सभी सहभागी संगठनों के प्रमुखों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है।

इस बैठक का उद्देश्य केवल विरोध जताना नहीं, बल्कि एक ठोस और निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा तैयार करना है। साथ ही, उन संगठनों को भी इस साझा मंच पर आमंत्रित किया गया है जो किन्हीं कारणों से आज नहीं जुड़ सके थे, ताकि यह संघर्ष और अधिक व्यापक और ताकतवर बनकर उभरे। कुल मिलाकर, आज चंडीगढ़ से उठी यह आवाज़ एक बड़े आंदोलन की आहट है। अब गेंद सरकार के पाले में है—देखना यह होगा कि क्या नीति-निर्माता किसानों की इन चिंताओं को गंभीरता से लेते हैं या फिर देश फिर से एक बड़े जनांदोलन के मुहाने पर खड़ा होने वाला है।

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