विचार-विमर्श के ‘बीज-मंत्र’

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बदहाली के मौजूदा समय से पार पाने या कम-से-कम उसका एक रास्ता पहचानने के लिए हम आखिर किसके पास जाएं? क्या हमें इस मशक्कत में अपने समय के लेखकों, संपादकों की कुछ मदद मिल सकेगी? हम लोगों के वरिष्ठ साथी और शिक्षक डॉ. कश्मीर उप्पल ने अपने मित्र गिरधर राठी से उनके लेखन की मार्फत इसमें सहायता मांगी।


वर्तमान में पूरे विश्व के साथ ही हमारे देश में भी आर्थिक – सामाजिक – राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। भूमंडलीकरण की शुरुआत में दुनिया के देशों के लिए ‘ग्लोबल -विलेज’ मुहावरा लोकप्रिय हुआ था। उस समय तो नहीं, लेकिन आज दिख रहा है कि विश्व की महाशक्तियों के द्वन्द्व में विश्व के देश भूमंडल के किसी गांव की तरह उहापोह में फंसे हुए हैं। विश्व के इस बदलते परिदृश्य को समझने के लिए अध्ययन की एक पूर्व-पीठिका आवश्यक है।

इस समय हमारे देश की जनसंख्या में युवा सबसे अधिक हैं। इसमें से पढ़ी-लिखी युवा जनसंख्या को ‘जेन-जी’ और ‘अल्फा-जी’ आदि कहा जाता है। यह युवा पीढ़ी कई देशों की व्यवस्था में परिवर्तन के लिए अग्रगामी सिद्ध हुई है और इन परिवर्तनों में युवा-पीढ़ी की सोच-समझ की सीमाएं भी दिखने लगी हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण युवाओं का नवगठित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर बढ़ता आकर्षण है।

इस पीढ़ी के पास जानकारियां तो बहुत हैं, परन्तु राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास के चरणों की दूरदृष्टि नहीं है, देश के विचारकों एवं लेखकों के अध्ययन से उपजा अनुभव एवं उससे स्थापित होने वाला संवाद नहीं है। बीसवीं शताब्दी में महत्वपूर्ण लेखकों की पुस्तकों, छोटी-छोटी पुस्तिकाओं और लघु – पत्रिकाओं ने हमारी कई पीढ़ियों का निर्माण किया था। इक्कीसवीं शताब्दी की इलेक्ट्रानिक, कम्प्यूटर और मोबाईल क्रान्ति ने हमारा मानो वैचारिक धरातल ही हटा दिया है।

देश के इस वातावरण में सामाजिक परिवर्तन के पुराने औजारों को एक नया रुप देकर प्रस्तुत करना जरुरी हो गया है। हमें पुस्तकों में कैद होकर रह गए हमारे लेखकों के ‘बीज-मंत्रों’ को फैलाना होगा जो अपनी-अपनी आजादी की राह देख रहे हैं। इसके लिए हमें उन लेखकों के पास जाना होगा जिन्होंने व्यापक अध्ययन और अनुभव के आधार पर अपने समय की समीक्षा लिखी हो।

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ऐसे में हमारे सामने एक नाम गिरधर राठी का आता है। अस्सी वर्षीय गिरधर राठी ने अपने युवाकाल से ही अखबारों की संपादकी करते हुए उच्च राजनीति को बहुत करीब से देखा व समझा है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं भी की हैं। राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक के रुप में उनके विचारों का विषय-वितान बहुत फैला हुआ है। इसलिए गिरधर राठी की पुस्तकों का एक नयी दृष्टि से पुनरावलोकन आवश्यक हो जाता है।

मसलन, आजकल हमारे देश में हिन्दू-धर्म को लेकर बड़ी-बड़ी व्याख्याएं सुनने को मिल जाती हैं। गिरधर राठी सीधी सरल भाषा में कहते हैं कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी खूबी है कि उसने अन्य सभी धर्मों, सम्प्रदायों और मतवादों को उदारता से देखा, समझा और सहजीवी बनाया है। इसके प्रतीक राम जो एक विराट मानवीय सहिष्णुता और मर्यादा के प्रतीक थे, आज सहसा हिंसक और शत्रु अन्वेषक कैसे बन गये हैं? इस बात को असम और बंगाल के राज्यों के चुनावों के घटनाक्रम से अच्छी तरह देखा-समझा जा सकता है।

गिरधर राठी हमारे सामने आजादी की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। वे प्रश्न करते हैं कि एक बार आजादी मिल जाये, जैसे इस देश को 1947 में मिली, क्या उसके बाद उस पर कुछ सोचना शेष नहीं रह जाता? क्या ‘आजादी’ ऐसा कोई तत्व नहीं है जिसे निरन्तर हासिल रखने के लिए उसकी सतत पड़ताल, परिभाषा और रक्षा करना हर समय जरुरी होता है?

आजकल, विशेषकर युवाओं में आधुनिक (मार्डन) जीवन-शैली का ऐसा बुखार चढ़ा है कि इसकी धुन में वे पश्चिमीकरण को ही आधुनिकता समझने लगे हैं। यह स्मरण रखना होगा कि आधुनिकता मोटे तौर पर चार-पांच सौ साल पुरानी चीज है जो पश्चिम में ‘पुनर्जागरण’ (रैनेसाँ) से चली, उसकी एक दूसरी उठान ‘ज्ञानोदय’ में मिलती है जिसमें तर्कशीलता, वैज्ञानिकता आदि तत्व शामिल हैं। आधुनिकता तर्कशीलता के बाहर की चीज नहीं है। याद रखें जहां तर्क नहीं, वहां पुरातनपंथ है। आधुनिकता की पहचान अपनी अस्मिता के निरन्तर परीक्षण- परिष्कार पर और अपनी परम्परा को निरन्तर नया करते जाने में निहित है।

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आजकल ‘उत्तर-आधुनिकता’ (पोस्ट मार्डनिज्म) की भी बहुत चर्चा होने लगी है। ‘उत्तर आधुनिकता’ कुछ और नहीं, वरन् आज की अत्यंत जटिल और संश्लिष्ट परिस्थितियों को समझने का एक तरीका है। जैसे पर्यावरण आन्दोलन ‘उत्तर-आधुनिकता’ की देन है, आधुनिकता की नहीं। आधुनिकता के तहत तो हम जंगल काट रहे थे और उसे विकास समझते थे। ‘उत्तर आधुनिकता’ ने पर्यावरण- आन्दोलन के माध्यम से दुनिया को उसके विज्ञान की सीमाएं दिखा दी हैं। इस आन्दोलन में मनुष्य और प्रकृति के नये संबंधों की ओर हमारा ध्यान खींचा है।

‘उत्तर-आधुनिकता’ ने स्थानीयता का महत्व भी रेखांकित किया है। यह एक दूसरे प्रकार की स्थानीयता है। इसमें आजादी, अपनी गहरी पहचान, स्वायत्ता और स्वतंत्रता की बात सोच सकते हैं। वैश्वीकरण के दौर में ‘विचारधारा के अंत’ की बात चली थी। विश्व की वर्तमान व्यवस्था में यह स्पष्ट हो गया है कि मार्क्सवाद, समाजवाद या समाजवादी पद्धतियां बहुत अलग-अलग नहीं हैं, ये सब उद्योगवाद के ही पहलू हैं। इनके मूल आधार वही हैं, इनमें सिर्फ अपने मालिकाना रिश्तों को कुछ बदलने की बात होती है। इन विचारधाराओं में जो नया शक्तिशाली वर्ग पैदा हो रहा है, वह भी बहुत कुछ एक जैसा ही है।

गिरधर राठी की पुस्तकों में बहुत से ऐसे सवाल हैं जिन पर चिन्तन जरुरी है। हमारा शिक्षित-वर्ग पश्चिम की बौद्धिक दासता से मुक्त होकर अपनी सोच-समझ के औजारों का अनुसंधान नहीं कर पा रहा है। यदि हम ऐसा करने में सफल नहीं होते हैं तो संस्कृति, समाज, अर्थनीति और राजनीति में परावलम्बी और दोयम दर्जे के नागरिक ही बनकर रह जायेंगे। हमारे लिए जरुरी है कि विश्व में प्रचलित विकास के मॉडल को समझें। हमें विश्व की व्यवस्थाओं के साथ-साथ अपने देश में सुप्त पडे़ विकास के आदर्श को भी याद रखना है।

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हमें अमेरिका और चीन की चमक-दमक में उसे ही अपना आदर्श नहीं मान लेना है। गिरधर राठी बहुत सहज-सरल भाव से पूंजीवाद और साम्यवाद की गुत्थियों को खोलते हैं। आजकल अमेरिका, चीन और रुस जैसी महाशक्तियों ने विश्व के देशों की व्यवस्थाओं को उलझन में डाल रखा है। गिरधर राठी कहते हैं कि पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों औद्योगीकीकरण के संस्करण है। वे कहते हैं पूंजीवादी विकास के मॉडल ने जितनी विषमता पैदा की है उतनी ही साम्यवादी मॉडल ने भी की है। इस विश्लेषण में गिरधर राठी कहते हैं कि मार्क्स को व्यवहार में उतारने की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं। महात्मा गांधी के विचारों को अमलीजामा पहनाने की कोशिश किसी गली-मोहल्ले तक में नहीं हुई है, जबकि मार्क्सवाद की तरह गांधीवाद भी ‘आचरण का दर्शन’ है। विश्व के देशों के विकास की चमक-दमक के मोह से बचते हुए हमें राजनेताओं और पूंजीपतियों के घालमेल से उत्पन्न विकास की तरंगों में भी नहीं फंसना है। याद रखें, महान लेखक अपने देश में एक तरह से ‘द्वितीय-राजसत्ता’ होते हैं। हमें देश में निर्मित संशय के काल में अपनी ‘द्वितीय राजसत्ता’ के पास जाना चाहिए। यही इस समय के संकट का कर्तव्य है। (सप्रेस)

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