स्मृति शेष : डेविड जेरार्ड हॉपकिंस, 1947–2026
पिछले पाँच दशकों से हिमालयी जीवन, पर्यावरण और समाज के बीच शांत साधक की तरह कार्य करने वाले डेविड जेरार्ड हॉपकिंस जिन्हें सभी स्नेह से “डेविड भाई” कहते थे, ने 9 मार्च 2026 की सुबह लगभग 4 बजे 78 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया।
डेविड भाई केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक ऐसी जीवन दृष्टि के प्रतीक थे जिसमें सादगी, सेवा, अध्ययन और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना का अद्भुत संगम दिखाई देता था। उनका जन्म भले ही 9 दिसंबर 1947 को लंदन में विनीफ्रेड और ग्लिन हॉपकिंस के घर हुआ था, लेकिन उनके जीवन का वास्तविक विस्तार हिमालय की गोद में हुआ।
उन्होंने मिडलसेक्स और केंट के विद्यालयों में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर 1969 में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से भूगोल में बीए ऑनर्स किया और 1971 में लीड्स विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट सर्टिफिकेट ऑफ एजुकेशन प्राप्त किया। भूगोल के विद्यार्थी होने के कारण प्रकृति, पर्यावरण और पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति उनके भीतर गहरी जिज्ञासा और आकर्षण था। यात्रा और पहाड़ों के प्रति यह प्रेम उन्हें यूरोप के विभिन्न हिस्सों—वेल्स, स्कॉटलैंड और नॉर्वे—तक ले गया। अंततः यही आकर्षण उन्हें भारत तक खींच लाया।
सत्तर के दशक की शुरुआत में उन्होंने सड़क मार्ग से तुर्की और अफगानिस्तान के खैबर दर्रे से होकर भारत की यात्रा की। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं थी, बल्कि उनके जीवन की दिशा तय करने वाली यात्रा भी सिद्ध हुई। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक अनुभव संजोए और अनेक तस्वीरें भी खींचीं, जिन्हें एक अमूल्य धरोहर के रूप में देखा जाता है।
भारत आने के बाद उनका जीवन एक नया मोड़ लेता है। गांधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्शों और सरला बहन के कार्यों से प्रेरित होकर वे पहली बार 1972 में उत्तराखंड के कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम आए। यह आगमन अस्थायी नहीं रहा। धीरे-धीरे उनका मन इस स्थान, यहाँ के लोगों और यहाँ के कार्यों से गहराई से जुड़ता चला गया। अंततः 1981 में उन्होंने कौसानी को ही अपना स्थायी निवास बना लिया। कुछ समय बाद उन्हें भारत की नागरिकता भी प्राप्त हो गई और वे पूर्ण रूप से भारतीय जीवन पद्धति में रच-बस गए।
लक्ष्मी आश्रम के साथ उनका संबंध केवल एक कार्यकर्ता का नहीं था, बल्कि एक परिवारजन का था। आश्रम की वरिष्ठ गांधीवादी राधा भट्ट के साथ मिलकर उन्होंने आश्रम के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सर्वोदय मंडल के साथियों के अनुसार वे राधा बहन के “आँख, नाक और कान” की तरह थे। आश्रम के कार्यों को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने, खादी के प्रसार और आश्रम की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका विशेष रही।
वे प्रतिदिन समय पर आश्रम के कार्यालय पहुँचते, छात्राओं को पढ़ाते, खादी भंडारों के संचालन में सहयोग करते और शाम की प्रार्थना में नियमित रूप से भाग लेते थे। उनका जीवन अनुशासन, सादगी और समर्पण का उदाहरण था। आश्रम परिवार उन्हें अपने प्रमुख स्तंभों में से एक मानता था।

डेविड भाई का जीवन केवल आश्रम तक सीमित नहीं था। भूगोल और पर्यावरण के विद्यार्थी के रूप में उन्होंने हिमालयी क्षेत्र को गहराई से समझने का प्रयास किया। उनके पास वर्षों से संकलित वर्षा, हिमपात और तापमान का विस्तृत डेटा था। यह जानकारी हिमालयी पर्यावरण और उसके बदलते स्वरूप को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
उन्होंने अपने अध्ययन और यात्राओं के अनुभवों को भी संजोकर रखा। उनके यात्रा संस्मरण ज्ञानवर्धक थे और हिमालयी भूगोल तथा पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी समझ को प्रकट करते थे।
डेविड भाई का एक महत्वपूर्ण योगदान सरला बहन की जीवनी का अंग्रेजी में अनुवाद भी रहा। इस कार्य के माध्यम से उन्होंने सरला बहन के विचारों और कार्यों को देश-विदेश तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका व्यक्तिगत जीवन भी सेवा और समर्पण की इसी भावना से जुड़ा रहा। उन्होंने लक्ष्मी आश्रम की समर्पित कार्यकर्ता हंसी बहन से विवाह किया। यह संबंध केवल वैवाहिक नहीं था, बल्कि गांधीवादी सर्वोदय और समाज सेवा के प्रति साझा प्रतिबद्धता का भी प्रतीक था।
डेविड भाई का स्वभाव अत्यंत शांत और सरल था। सादगीपूर्ण जीवन, गहरी संवेदनशीलता और अपने काम के प्रति निष्ठा के कारण वे सभी के प्रिय थे। वे कम बोलते थे, लेकिन जब भी बोलते, उनके शब्दों में अनुभव और विचार की गंभीरता होती थी।
जो लोग कौसानी जाते थे, उन्हें उनसे मिलने और बातचीत करने का अवसर मिलता था। कभी-कभी बाजार तक साथ जाना या पंडित जी की दुकान पर बैठकर जलपान करते हुए बातचीत करना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव होता था। उम्र बढ़ने के साथ ऐसे अवसर कम होते गए, लेकिन उनकी मधुर स्मृतियाँ लोगों के मन में आज भी जीवित हैं।
अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने हिमालय के बीच बिताया। जन्म भले ही लंदन में हुआ, लेकिन जीवन भारत और हिमालय के लिए समर्पित रहा। हिमालय क्षेत्र की प्रकृति, समाज और जीवन के बारे में उनके पास गहरी जानकारी थी।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनका जीवन और कार्य प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। लक्ष्मी आश्रम और गांधी विचार परिवार के लिए उनका जाना एक बड़ी रिक्तता है।
मृत्यु जीवन की एक अनिवार्य सच्चाई है। जीवन का एक छोर जन्म है तो दूसरा छोर मृत्यु। इसे स्वीकार करना ही पड़ता है।
फिर भी यह विश्वास बना रहता है कि डेविड भाई अब केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि अपने कार्यों, विचारों और जीवन-मूल्यों के माध्यम से हमारे बीच जीवित रहेंगे।
हिमालय के इस सच्चे साधक, सादगी और सेवा के इस शांत प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। सलाम डेविड भाई। अब आप स्मृति, प्रेरणा और विचार के रूप में हमारे बीच सदैव उपस्थित रहेंगे।

