भारत की स्वतंत्रता गाथा में कस्तूरबा गांधी का नाम त्याग और तपस्या की अमर मिसाल है। 22 फरवरी 1944 को अंग्रेजों की कैद में उन्होंने प्राण त्यागे, लेकिन उनका संघर्ष, सादगी और सेवा भाव आज भी प्रेरणा देता है। राष्ट्र उन्हें “बा” कहकर स्मरण करता है—एक ऐसी माँ, जिसने देश को परिवार माना।“बा” ने सत्याग्रह, समाज सेवा और मातृत्व के आदर्श से राष्ट्र की चेतना को गढ़ा।
22 फरवरी : कस्तूरबा गांधी 82वां पुण्य स्मरण
डॉ. संतोष गोईन्दी
22 फरवरी, 1944 महाशिवरात्रि का दिन कस्तूरबा गांधी भारत की “बा” ने अंग्रेजों की कैद में ही अपने लम्बे कर्मठ, कठोर तपस्या भरे जीवन की अंतिम सांस ली। आगा खाँ पैलेस, पुणे में बनी “बा” की समाधि बरबस अपने को लगभग 66-67 वर्ष पहले के भारत में पहुँचा देती है।
9 अगस्त 1942 – “भारत छोड़ो” आन्दोलन का प्रस्ताव पास हो चुका है। आज गांधी जी चौपाटी (मुंबई) पर बुलाई गई वृहत सभा को संबोधित करने वाले हैं। अंग्रेज सरकार पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लेती है, तो उस वृहत सभा को अब कौन संबोधित करेगा- तय हुआ कस्तूरबा, संबोधित करेंगी। “बा” के साथ में सुशील नैयर हैं। तो “बा” को भी सजा मिली और जेल पहुँचा दी गई। ऐसी सजा की जेल से वह जीवित लौट न सकीं।
बरसों पहले दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के विरुद्ध, भारतीयों की अस्मिता के लिए चलाए जा रहे सत्याग्रह में स्वयं स्फूर्ति से जा रही प्रथम महिला सत्याग्रही को बापू ने कहा था, “यदि तुम्हारी मृत्यु जेल में होती है तो मैं तुम्हारी जगदम्बा की तरह पूजा करूगां’’। और सच ऐसा हुआ भी। कस्तूरबा जेल में ही गई। जिसके लिए उन्होंने जीवन भर अपार कष्ट झेले, उस भारत स्वतंत्रता को वह देख न सकीं। कस्तूरबा में अपार शौर्य, साहस तथा संयम था।
कस्तूरबा का जन्म पोरबंदर, काठियावाड़ (गुजरात) में अप्रैल 1869 को किसी तिथि को हुआ, निश्चित तिथि मालूम नहीं। इतना जानने में आता है कि गांधी जी से वह छः माह बड़ी थीं। 13 वर्ष की उम्र में किशोर मोहनदास गांधी से उनका विवाह होता है। मोहनदास की यह इच्छा रहती है कि कस्तूरबा पति से पूछ कर घर से बाहर जाये लेकिन कस्तूरबा कहतीं, “मुझे मंदिर जाना है, पूछ कर ही क्यूं जाऊँ?” और वे मंदिर जाती रहीं।
जब विद्यार्थी मोहन किसी अवाच्छित मित्र की संगति में पड़ जाते हैं तो कस्तूरबा आगाह करती है। कस्तूरबा का आंकलन सही निकलता है। जब मोहनदास ने इंग्लैंड जाकर वकालत पढ़ने का विचार बनाया, उनके भाइयों ने तो पैसा इकट्ठा किया ही, पत्नी कस्तूरबा ने भी अपने गहने बेचकर कमी को पूरा किया और खुशी से पति को विदेश भेजा।
दक्षिण अफ्रीका में पति बैरिस्टर बनकर गए थे, कस्तूरबा की शान-शौकत की जिन्दगी थी, लेकिन मेरिट्सबर्ग स्टेशन पर ठिठुरती ठंड में प्रथम श्रेणी के डिब्बे से सामान सहित गोरो द्वारा बाहर फेंके जाने की घटना ने मजबूर किया बैरिस्टर गांधी को सोचने को कि स्वदेश लौट जाये या भारतीयों की मान- मर्यादा, अस्मिता के लिए वहां रहकर संघर्ष करें। जीवन की धारा ही बदल गई। सबसे पहले स्वयं, फिर पत्नी और बच्चों का जीवन बदला। सादा से सादा मजदूर का श्रम भरा जीवन।
जब दक्षिण अफ्रीका की गोरे सरकार की रंग-भेद नीति के विरुद्ध गांधी जी ने सत्याग्रह छेड़ा और महिलाओं को आह्वान किया कि वह भी इसमें शामिल हों तो घर में चार छोटे बच्चों की माँ कस्तूरबा ने रोष प्रकट किया कि आपने मुझे क्यों नहीं बताया?
बापू को सोच जेल के कष्टों से घबरा कर “बा” माफी मांग ले तो…. “बा” सब संशयों को दूर करती है “मैं हार कर छूट आऊँ तो मुझे मत रखना। बच्चे तक सह सके, आप सब सहन कर सके, अकेली में ही न सह सकूँ, ऐसा आप सोचते कैसे हैं?” और कस्तूरबा प्रथम महिला सत्याग्रही बनीं और दक्षिण अफ्रीका की काँटों भरी जेल में गई जहाँ के कष्टों को भुगतना उस नाजुक और कमजोर देह के लिए कठिन परीक्षा को घड़ी बना। जेल से बाहर निकलीं तो सूखकर काँटा हो गई थीं।
अपनी दादी (कस्तूरबा) की असीम सहनीय शक्ति का परिचय देते हुए, “अनमोल विरासत” में सुमित्रा कुलकर्णी लिखती है“एक बार अफ्रीका में वह बीमार पड़ीं। डाक्टर ने आपरेशन की सलाह दी। दादी को इस प्रकार शरीर काटना पसंद तो नहीं था लेकिन अंततः वह तैयार हो गईं। बिना इंजेक्शन या क्लोरोफार्म लिए और पूरी सुध में कस्तूरबा ने आपरेशन करवाया था। ऐसा भयानक दर्द कोई व्यक्ति सहन कर सकता है, यह देखकर गोरे डाक्टर और उनके सभी कर्मचारी और बापू जो स्वयं बड़े आश्चर्यचकित हुए थे।’’ दादी बहुत कमजोर हो गई थीं तो डाक्टर ने मुर्गी का शोरबा पीने को कहा। बापू को यह पसंद नहीं था लेकिन उन्होंने दादी से पूछा तो दादी ने मुर्गी का शोरबा पीने से मना कर दिया और कहा, “मनुष्य देह बार-बार नहीं मिलती, भले ही में आपकी गोद में मर जाऊँ, मगर अपनी देह भ्रष्ट नहीं करूंगी।”
दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम, टॉलस्टाय फार्म और फिर भारत आने पर कोचरब, साबरमती, सेवाग्राम आश्रमों के कठिन नियम, खान-पान, शरीर श्रम कस्तूरबा ने सहज रूप से अपनाए। कई आश्रमवासी बापू जी के तेज और नियमों आदि से घबराते थे तो कस्तूरबा उनको माँ का सहारा देती थीं और उनकी छोटी-छोटी मांगों को स्वयं बापू जी के पास पेश करती थीं। उनके चार बेटे थे, लेकिन अपने पराये का भेद भूलकर वह सभी आश्रमवासियों, आश्रम में आने-जाने वालों, सभी के लिए राष्ट्र भर में माँ बनीं- चाहे पंडित नेहरू हों, लक्ष्मी बहन वह अन्य हरिजनों के बच्चे हों, या सरदार पटेल या बादशाह खान व पूरा राष्ट्र सबको उनका वात्सल्य मिला। 1942 के “भारत छोड़ो” आंदोलन कैद होने के कुछ दिन बाद ही जब युवा महादेव भाई देसाई (गांधी जी के सेक्रेटरी) का हृदय गति रुक जाने से आगाखां पैलेस में ही देहांत हो गया तो “बा” को बहुत बड़ा धक्का लगा। और उनके लिए पुत्रवत् महादेव का जाना सहन करना बहुत मुश्किल हो रहा था। बार-बार कहतीं, “मैं दुर्गा बहन (महादेव भाई की पत्नी) को क्या जवाब दूँगी।”
“गरीब किसानों की पुकार पर जब गांधी जी चंपारण (बिहार) गये थे (1917) तो “बा” ने वहाँ घर-घर पैदल जाकर दीन-हीन और निर्धनता और सुस्ती के कारण मलिन रहने वाली स्त्रियों को सफाई से रहने, कपड़े एवं स्वयं शरीर को साफई रखना, बाल गोपालों की साफई रखना आदि सिखाया, जरूरत अनुसार दवाइयाँ दी आरोग्य निरोग रहना सिखाया, वहा कई पाठशालाएँ भी शुरू कीं। इस प्रकार की प्रत्यक्ष सेवा का अद्वितीय उदाहरण रखा।
खेडा सत्याग्रह के समय भी वह बडी सभाओं में सत्याग्रह का महत्व समझातीं और सरकार के सामने न झुकने की हिम्मत देतीं। 1920 में जब बापू जी को 6 साल की कैद सुनाई तो कस्तूरबा परेशान नहीं हुईं, गाँव-गाँव में घूमकर असहयोग आंदोलन को बल देती रहीं।
1930 के नमक सत्याग्रह में गांधी जी जेल गये। कस्तूरबा वीरांगना की भाँति बहिनों को, जनता को प्रोत्साहित करती रहीं। धारासाणा का प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह “बा” के साथ जुड़ा है। फिर शराब की दुकानों, कपड़ा मिल की दुकानों के घरनों में आग रहीं।
कस्तूरबा पढ़ी-लिखी नहीं थीं। स्कूली शिक्षा का उन्हें अवसर नहीं मिला। उन्होंने बापू जी से ही पढ़ना-लिखना सीखा। लेकिन अपने गुणों -दृढ़ता, साहस, उच्चकोटि का संयम, सादगी, सर्व समानता, भ्रात्तृव का भाव के कारण कस्तूरबा ने भारतीय महिला का मस्तक ऊँचा किया और वह वंदनीय बनीं।
उनकी स्मृति में कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट पूर्व स्वतंत्रता भारत की एक मात्र अखिल भारतीय स्तर की महिला संस्था ऐसी संस्था बनी, जिसका उद्देश्य शहरों की चकाचौंध से दूर – ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एवं बच्चों की सेवा करना रखा गया।
गांधी जी ने स्वयं बोरीवली (मुंबई) में एक सप्ताह रूककर उन महिला कार्यकर्ताओं के प्रथम प्रशिक्षण शिविर का दिशा-निर्देश किया। जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में रहकर कस्तूरबा ट्रस्ट में सेवा करने का इरादा किया था। इनमें से बहुत-सी संभ्रांत घरों की थी । पिछले 81-82 वर्ष से कस्तूरबा ट्रस्ट को सेविकाओं ने पूरे भारत में जगह-जगह पर सेवा के दीप जलाए हैं और नि:स्वार्थ सेवा का कीर्तिमान, अखबारों से दूर, स्थापित किया है।
1995 में कस्तूरबा ट्र्रस्ट की स्वर्ण जयंती पर एक स्मारिका का प्रकाशन हुआ था जिसमें कस्तूरबा एवं कस्तूरबा ट्रस्ट के कार्य की संक्षिप्त झांकी मिलती है। कस्तूरबा ट्रस्ट का प्रधान कार्यालय कस्तूरबा ग्राम इंदौर में है एवं विभिन्न प्रदेशों में प्रांतीय शाखाओं का मुख्य कार्यालय भी ग्रामीण क्षेत्र में है। कस्तूरबाग्राम इंदौर में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा का ग्रामीण संस्थान, (रूरल इंस्टीट्यूट ) देवी अहिल्या विश्वविविद्यालय से संबद्ध, महिला बच्चों का अस्पताल, आरोग्य सेविकाओं एवं अन्य कार्यकर्ता प्रशिक्षण की व्यवस्था है। साथ ही लगभग 125 देसी नस्ल की उत्तम गायों की गौशाला एवं कीट-नाशक दवाइयों रहित लगभग 180 एकड़ भूमि पर फलबाग एवं खेती है। कुछ वर्षो से परेशानी में पड़ी महिलाओं के लिए निःशुल्क आवास, निवास, योग्यता अनुसार प्रशिक्षण की व्यवस्था हेतु “बा का घर” कस्तूरबाग्राम इंदौर और कई प्रांतीय शाखाओं में स्थापित किये गये हैं और हजारों महिलाओं को नया आत्मविश्वास मिला है, जिनमें से कई स्वयं अंधेरे से निकल कर अन्यों को प्रकाश देने में भी सक्षम हुई हैं।
स्वतंत्रता की बलि वेदी पर चढ़ी, ऐसी माँ कस्तूरबा की पुण्यतिथि के अवसर पर उनका स्मरण करते हुए, उन्हें शत-शत प्रणाम।


