हमेशा की तरह इस बार भी हमने अपने बजट में वे ही कारनामे किए हैं जिनके चलते स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र साल-दर-साल फिसड्डी होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य में हमने पिछले सालों की तरह एक तरफ, भारी-भरकम आवंटित राशि को ‘लैप्स’ हो जाने दिया है तो दूसरी तरफ, आम जनता पर ‘सैस’ लगाकर इलाज के इंतजाम करने की नकारा कोशिशें की हैं। क्या हैं, बजट की बदहालियां? बता रहे हैं, डॉ. हिमांशु उपाध्याय और अमूल्य निधि।
डॉ. हिमांशु उपाध्याय और अमूल्य निधि
हाल के 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 99,859 करोड़ से 1,04,559 करोड़ रुपए की मामूली बढ़ोतरी हुई है। पहली नजर में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को नए सिरे से रेखांकित करता है। हालांकि, बजट में जवाबदेहिता की कमी लगातार बनी हुई है। यह लोगों के स्वास्थ्य की बजाय उद्योगों को प्राथमिकता देता है और भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करता है।
पिछले कई सालों से लोगों के स्वास्थ्य का मुद्दा नीतिगत बातचीत के केंद्र से हटता रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के प्रावधानों को मजबूत करने और प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश करने की बजाय, नीतियों का रुझान बीमा आधारित वित्तपोषण और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने की ओर ज्यादा है। स्वास्थ्य अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की भाषा धीरे-धीरे बाजार, निवेश और उद्योग की भाषा में बदल गई है।
‘कोविड’ के बाद यह बदलाव खास तौर पर चिंताजनक है। इस महामारी ने दुनिया भर में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी को उजागर किया था और मजबूत सार्वजनिक ढांचे की महत्वपूर्ण भूमिका की जरूरत को दिखाया था। कई देशों ने प्राथमिक नेटवर्क, बीमारी की निगरानी और सार्वजनिक अस्पतालों को मजबूत करके इसका सामना किया। भारत बीमा आधारित सेवाओं और निजीकरण बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि इस बात के पर्याप्त अनुभव हैं कि ऐसे मॉडल मजबूत सार्वजनिक व्यवस्था की जगह नहीं ले सकते।
ताजा स्वास्थ्य बजट आवंटन में बढ़ोतरी दिखाई दे रही है, परंतु असली तस्वीर महंगाई और बढ़ती जरूरतों को देखने पर साफ हो जाती है। आवंटन में मामूली बढ़ोतरी का मतलब सेवाओं का विस्तार नहीं होगा। पिछले पांच सालों में ‘नियंत्रक महालेखा परीक्षक’ (सीएजी) की रिपोर्ट और खर्च के रुझानों से पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च में ठहराव है, बल्कि गिरावट आई है।
चिंता की बात है कि आवंटित फंड का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। वित्तीय वर्ष 2019–20 और 2023–24 के बीच, ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय’ ने 1,32,749 करोड़ रूपए खर्च नहीं किये। यह कोई मामूली प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि गहरी व्यवस्थागत समस्या है। केंद्र सरकार के वित्तीय खातों पर ‘सीएजी’ ने लगातार कहा है कि हाल के सालों में स्वास्थ्य क्षेत्र के आवंटन और सप्लीमेंट्री ग्रांट्स में 11 से 14 प्रतिशत की दर से ‘लैप्स’ हुए हैं। इतने बड़े पैमाने पर लैप्स होना योजना, क्रियान्वयन क्षमता और वित्तीय प्रशासन में गंभीर कमियों को दिखाता है। आवंटन का बार-बार खर्च नहीं होना, उन दावों को कमजोर करता है कि वित्तीय बाधाएं स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च को रोकती हैं। समस्या सिर्फ बजटीय आवंटन का आकार नहीं है, बल्कि जो आवंटित है उसका सही तरीके से इस्तेमाल न कर पाना भी है।
केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य और शिक्षा ‘सेस’ लागू करने के बाद भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं को नजरअंदाज किया गया है। बजट 2026-27 में ‘फार्मास्यूटिकल्स’ यानि दवा-निर्माण और आयुष पर ध्यान दिया गया है, जो बेशक महत्वपूर्ण सेक्टर हैं, परंतु फिर भी, प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचा, जिला अस्पताल, रोकथाम कार्यक्रम और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को अभी भी पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही है। भारत का ‘एपिडेमियोलॉजिकल ट्रांजिशन,’ (ऐसी प्रक्रिया जिसमें स्वास्थ्य और रोग का पैटर्न संक्रामक रोगों – तपेदिक, हैजा – से बदलकर गैर-संक्रामक बीमारियों – कैंसर, हृदय-रोग – में बदल जाता है) ‘असंचारी बीमारियों’ का बढ़ता बोझ, बार-बार होने वाले प्रकोप और गंभीर क्षेत्रीय असमानताएं लगातार निवेश की मांग करती हैं।
जब ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) के हिस्से के तौर पर बजट आवंटन को देखा जाता है, तो जन-स्वास्थ्य खर्च में ठहराव और भी साफ़ हो जाता है। पिछले तीन सालों से, स्वास्थ्य पर बजट आवंटन ‘जीडीपी’ का 0.31 प्रतिशत (2023–24) और 0.29 प्रतिशत (2024–25 और 2025–26) के बीच रहा है। यह स्वास्थ्य पर ‘जीडीपी’ का कम-से-कम 5 प्रतिशत खर्च करने की लंबे समय से चली आ रही राष्ट्रीय नीति की इच्छा और अंतर्राष्ट्रीय सिफारिश से बहुत कम है।
‘स्वास्थ्य और शिक्षा सेस’ की जांच करने पर जवाबदेही का मुद्दा और भी गंभीर हो जाता है। ‘सीएजी’ के नतीजों के मुताबिक, ‘सेस’ के तहत हुई वसूली में काफी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2018–19 में यह 41,310 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 71,159 करोड़ रुपए हो गया था। इसी अवधि में, कुल ‘सेस’ और ‘सरचार्ज कलेक्शन’ में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई, जो 2023-24 में 4.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई। ‘सीएजी’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह कलेक्शन 2023-24 में कुल टैक्स कलेक्शन का 14.09 प्रतिशत था। ‘सीएजी’ ने खास मकसद वाले ‘सेस’ के तहत मिले पैसों के गलत प्रबंधन के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय की बार-बार आलोचना की है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे खास उद्देश्यों के लिए तय होने के बावजूद, ‘सेस’ से मिलने वाला पैसा हमेशा भारत के ‘पब्लिक अकाउंट्स’ में निर्धारित खातों में जमा नहीं किया गया है। इसके बजाय, बड़ी रकम भारत के ‘कंसोलिडेटेड फंड’ में रखी गई है।
केंद्र सरकार को साफ करना चाहिए कि 2018-19, 2019-20 और 2020-21 के दौरान स्वास्थ्य ‘सेस’ की रकम सार्वजनिक अकाउंट्स में ट्रांसफर क्यों नहीं की गई और तीन साल तक पब्लिक अकाउंट्स में इसके लिए अलग अकाउंटिंग हेड क्यों नहीं बनाया गया? वित्तमंत्री को जवाब देना चाहिए कि मार्च 2021 में देरी से कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बावजूद, जिसमें ‘प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा निधि’ नाम का एक रिज़र्व फंड बनाने की बात थी, 2021-22 में भी स्वास्थ्य के तहत ‘सेस’ की रकम पब्लिक अकाउंट्स में ट्रांसफर क्यों नहीं की गई?
लगातार कम निवेश और वित्तीय अपारदर्शिता के नतीजे पूरे देश में दिख रहे हैं। जन-स्वास्थ्य का ढांचा असमान बना हुआ है। ग्रामीण और कम सुविधा वाले इलाकों में मानव संसाधन की कमी बनी हुई है। निवारक और उपचारात्मक सेवाओं को पर्याप्त सहायता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। बीमा कवरेज का विस्तार, कुछ संदर्भों में मददगार होने के बावजूद, कमज़ोर प्राथमिक देखभाल, अपर्याप्त सरकारी अस्पतालों और कमजोर निगरानी प्रणालियों की भरपाई नहीं कर सकता। भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। वह धीरे-धीरे प्रगति का आभास कराने वाली बढ़ोतरी जारी रख सकता है, जबकि संरचनात्मक कमियां अनसुलझी रहती हैं।
इसके लिए जन-स्वास्थ्य खर्च में काफी बढ़ोतरी करके इसे कम-से-कम ‘जीडीपी’ के 5 प्रतिशत तक करना होगा। इसके लिए स्वास्थ्य ‘सेस’ को सिर्फ जन-स्वास्थ्य के कामों के लिए अलग से रखने की जरूरत है, जिसमें पारदर्शी रिपोर्टिंग और इस्तेमाल के तरीके हों। इसके लिए केंद्र में संसाधन जमा करने की बजाय राज्यों की वित्तीय क्षमता को मज़बूत करने की जरूरत है। सबसे जरूरी बात यह समझना है कि सिर्फ पूंजी-संग्रह जन-स्वास्थ्य व्यवस्था की जगह नहीं ले सकता।
स्वास्थ्य सिर्फ़ एक क्षेत्रीय खर्च नहीं है; यह एक सामाजिक और संवैधानिक प्रतिबद्धता है। जवाबदेही, पारदर्शिता और पर्याप्त निवेश के बिना, सार्वभौमिक और समान स्वास्थ्य सेवा का वादा एक अधूरा और दूर का सपना ही रहेगा। स्वास्थ्य बजट को दिखावे से आगे बढ़कर ऐसे ढांचागत सुधार करने चाहिए जो लोगों के स्वास्थ्य को केंद्र में रखे। (सप्रेस)
डॉ. हिमांशु उपाध्याय ‘प्रेस्टीज यूनिवर्सिटी, इंदौर’ में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और अमूल्य निधि ‘जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया’ (जेएसएआई) के राष्ट्रीय संयोजक हैं।


