प्रख्यात गांधीवादी और सर्वोदयी नेता डॉ. एस.एन. सुब्बाराव ‘भाईजी’ युवाओं को यही जीवन-दृष्टि सिखाते थे कि हर छोटा कार्य भी देश और समाज से जुड़ सकता है। उनकी 97वीं जयंती पर सेवा, अहिंसा, सद्भाव और चरित्र-निर्माण के उनके जीवंत संदेश को फिर से याद करना जरूरी है।
अनिल गुप्ता
मकान बना रहे दो राजमिस्त्रियों से एक ही प्रश्न पूछने पर उसका जवाब उनकी दृढ़ता और कर्तव्य को अभिव्यक्त करते हैं। एक का जवाब कि ‘मैं अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी कर रहा हूँ’ और दूसरे का यह जवाब कि ‘ हम लोग भारत माता की एक संतान के रहने के लिए भवन का निर्माण कर रहे हैं।’ जबकि उनसे पूछा गया था कि “वे क्या कर रहे हैं?” मेरा मानना है कि हमें गर्व होना चाहिए कि हम भारत माता की संतान हैं और अपने हर छोटे-बडे़ काम को देशभक्ति और देश प्रेम से जोड़ना चाहिए, यह कहना था प्रख्यात गांधीवादी और सर्वोदयी नेता डा.एस.एन.सुब्बराव जी का । जिन्हें देशभर के नौजवान बडे प्यार से ‘भाईजी’ कहकर सम्बोधित करते थे। आज 7 फरवरी को देशभर में उनकी 97वीं जयंती मनायी जा रही है। इस अवसर पर उनकी सरलता, सहजता, सेवाभाव, अहिंसा, त्याग, और प्रेम को याद करना जरूरी हो जाता है। भाईजी छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से अपनी बातों को रखते थे।
भाईजी का प्रारंभिक जीवन और चेतना
सुब्बरावजी का जन्म कर्नाटक के सेलम में 7 फरवरी 1929 को हुआ, उनके पिताजी वकील थे। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो आंदोलन’ से प्रेरित होकर उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ के नारे लिखे और कक्षाएँ बहिष्कृत कीं। उस समय उन्हें पुलिस ने एक दिन के लिए हिरासत में भी लिया था। उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही सेवादल में भागीदारी की और 1950 के दशक में कांग्रेस सेवादल के सदस्य के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। अपने कानून के अध्ययन के बाद उन्होंने सक्रिय जीवन समाज सेवा में समर्पित कर दिया।
चंबल घाटी में अहिंसा का अनूठा प्रयोग
स्वतंत्रता के बाद भाईजी ने राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए कार्य शुरू किया। 1969 में गांधी जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर भारत सरकार के द्वारा संचालित गांधी रेल प्रदर्शनी को पूरे देश में ले जाने का कार्य किया। उसके बाद चम्बल के कुछ साथियों के आग्रह पर चम्बल घाटी में शांति मिशन के कार्य के लिए जौरा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम स्थापना की। कालांतर में यही आश्रम 70 की दशक में चम्बल घाटी में हुए ऐतिहासिक बागी आत्मसमर्पण और पुनर्वास का साक्षी बना। जिसमें उन्होंने महती भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने 654 से अधिक बागियों को केवल हथियार छोडने के लिए नहीं बल्कि समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण जैसे गांधीवादियों की सहयोगी भूमिका के साथ सुब्बराव ने चंबल में अहिंसा की परंपरा को बल दिया।
राष्ट्रीय युवा योजना और चरित्र निर्माण

सुब्बारावजी का मानना था कि चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है। युवा देश का भविष्य हैं और उन्हें सही दिशा देने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय युवा योजना (एन.वाई.पी.) की स्थापना की। एन.वाई.पी. के तहत उन्होंने देश भर में सामूहिक युवा नेतृत्व शिविरों, सद्भावना शिविर, पर्यावरण और जल संरक्षण शिविर, आपदा राहत शिविर इत्यादि का आयोजन किया। यहां तक कि नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, लद्दाख, अंडमान और लक्षद्वीप आदि दूरस्थ क्षेत्रों में भी शिविर संचालित किये। शिविरों के माध्यम से वे धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की दीवारें तोड़कर एकता, प्रेम और मानवता का संदेश देते थे। उन्होंने ‘धर्म, जाति, भाषा एवं क्षेत्रीयता के भेदों से ऊपर उठकर एकता, प्रेम, सद्भाव और सौहार्द’ का संदेश फैलाया। यही दृष्टिकोण उन्हें राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर समरसता की राजनीति करने वाला राष्ट्रवादी युगपुरुष बनाता था।
सद्भावना रेल यात्रा और शांति-भाईचारे का संदेश
90 की दशक में जब देश साम्प्रदायिकता से जूझ रहा था, तब सुब्बरावजी ने केन्द्र सरकार की मदद से सद्भावना रेल यात्रा का आयोजन कर देश के प्रमुख शहरों में सर्वधर्म प्रार्थना सभा और साम्प्रदायिक सद्भावना साइकिल रैली की। यह यात्रा पूरे देश में दो चरणों में चली, जिसमें 26 राज्यों के करीब 2500 से अधिक युवा शामिल हुए। इन युवाओं के लिए पूरा रेल ही घर और अलग-अलग शहर कर्मस्थली बना था। रेल में 250 साइकिलें भी थी जिस पर सवार होकर नवजवान शहर के एक छोर से दूसरे छोर जाकर देश की एकता, अखण्डता और साम्प्रदायिक सद्भावना के संदेश का प्रचार प्रसार किये। ‘विश्व में अमन, चैन, प्यार, दोस्ती और मानवता की विजय’ की भाईजी की सर्वोच्च मान्यता को इस रेलयात्रा ने चरितार्थ किया।
आदर्श जीवनः सरलता, अनुशासन और सहिष्णुता
डॉ. सुब्बराव जी का व्यक्तित्व सादगी, विनम्रता, सरलता और अनुशासन से परिपूर्ण था। वे युवाओं को ‘एक घंटा देश को- एक घंटा देह को’ अपनाने की अपील करते। अपना दैनिक कार्य स्वयं करते रहे। यात्राओं के दौरान उनकी कोशिश अपने चिर परिचितों से भोजन पाने की होती थी। वह एक साधु तुल्य व्यक्ति थे, जिनको सभी धर्मो और भाषाओं से प्रेम रहा। 18 भारतीय भाषाओं को बोलते हुए वे सभी धर्मो के प्रति ममत्व का भाव रखते, उनका कहना था कि ‘सर्व धर्म-मम् भाव’ ही भारतीय एकता की कुंजी है। उनका मानना था कि युवा ही राष्ट्र का निर्माता है और उनसे ही समाज में मानवता और सौहार्द की भावना बलवती होगी।
युवाओं के लिए प्रेरणा और आह्वान
अभी सुब्बराव जी हमारे बीच नहीं हैं (उनका निधन 27 अक्टूबर 2021 को हुआ), परंतु उनके सिद्वांत, व्यवहारिक आदर्श आज भी जीवंत हैं। उनकी 97 वीं जयंती पर हम सभी को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि उनके मार्ग पर चलते हुए हम भी चरित्रवान बनेंगे और सेवा, सद्भाव और सामाजिक सरोकार के मूल्य को अपनाएंगे। आज जब पूरी दुनिया विभाजन और हिंसा-प्रतिहिंसा से पीड़ित है तो उनके अहिंसक परोपकारी मार्ग का अनुसरण ही अपने देश और दुनिया को शांति और एकता की ओर ले जाएगा। हमें उनके जीवन की सीख को आगे बढकर आत्म-उन्नयन और राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ाना है। उनकी परंपरा का मनन करते हुए हम सभी सेवा, करूणा, मानव सेवा और आपसी सौहार्द के कार्यो से अपना और राष्ट्र का कल्याण सुनिश्चित करें, यही सच्ची श्रद्वांजलि होगी।
लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है।


