भारत में गणतंत्र : चुनौतियाँ, विफलताएँ और समाधान

लेखक की फोटो

हम अपने गणतंत्र की 77वीं सालगिरह मना रहे हों, लेकिन क्या सचमुच हमारा लोकतंत्र उस तरफ बढ़ रहा है जिसकी उम्मीद हमने करीब आठ दशक पहले की थी? मसलन–क्या हमारी दो सदनों–लोकसभा, राज्यसभा–वाली संसद और राज्यों की विधानसभाएं अपेक्षित अवधि में जनहित के मसलों पर चर्चा करती हैं? कैसा है, हमारा मौजूदा लोकतंत्र? 77वें ‘गणतंत्र दिवस’ पर बता रहे हैं, अरुण कुमार डनायक।


26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर भारत ने स्वयं को संप्रभुता संपन्न और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था। यह केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति का उत्सव नहीं था, बल्कि नैतिक और राजनीतिक संकल्प भी था कि सत्ता वंशगत स्वामित्व में नहीं होगी, बल्कि संविधान के अधीन जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित होगी।लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा को साकार करने वाला संतुलित तंत्र है, जिसमें विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और नागरिक समाज की भूमिका होती है। विगत कुछ वर्षों में यह संतुलन कई मोर्चों पर बिगडता दिख रहा है, जिससे गणतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ी है।

आज  लोकतांत्रिक व संवैधानिक  संस्थाओं की कार्यवाही में गिरावट स्पष्ट रूप से दिख रही है। संसद की बैठक के दिन घट रहे हैं और महत्वपूर्ण विधेयक विस्तृत बहस के बजाय शोर-शराबे के बीच पारित किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी का उदाहरण उल्लेखनीय है, जिन्होंने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सदन की कार्यवाही यदि नियमों के अनुरूप न हो तो किसी भी विधेयक को पारित कराना संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ है और इसी कारण उन्होंने अव्यवस्थित सदन में विधेयक पारित कराने से इंकार किया।

See also  Independence day 2025 : कुहासे में लोकतंत्र

संसद के स्पीकर का कर्तव्य है कि वे निष्पक्षता बनाए रखें और इसे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित भी करें। अक्सर उनके द्वारा सत्ता पक्ष को संरक्षण देते हुए विपक्ष की स्थगन प्रस्ताव या चर्चा संबंधी मांगें खारिज कर दी जाती हैं। इससे न केवल निर्णय-प्रक्रिया अपूर्ण होती है, बल्कि संसद का विमर्शात्मक चरित्र भी कमजोर होता है। मंत्रियों द्वारा सदन को गुमराह किये जाने पर  उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसके बावजूद मंत्री अक्सर गलत जानकारी पटल पर रखते हैं। आज संसद संवाद के मंच के बजाय एक औपचारिक संस्था बनती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अविश्वास गहराता जा रहा है।

लोकतंत्र की विफलताओं में एक बड़ा कारण पर्यावरण और विकास नीतियों पर संसद में गंभीर और प्रभावी विमर्श की कमी है। पिछले दशक में ‘तेज़ विकास’ की प्राथमिकता ने हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत में पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। उत्तराखंड की ‘चार धाम सड़क परियोजना’ और कश्मीर में सुरंग निर्माण ने पहाड़ों की अनियंत्रित खुदाई और विस्फोटकों के प्रयोग से ढलानों की स्थिरता नष्ट की है, जिससे भूस्खलन और ज़मीन धँसने की घटनाएँ बढ़ी हैं। ‘सात बहनों’ के पूर्वोत्तर भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण ने वनों, पहाड़ी ढलानों और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है, जिससे स्थानीय आबादी और यातायात की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। स्पष्ट है, विकास योजनाएँ दूरदर्शिता की बजाय केवल सड़क निर्माण तक सीमित रह गई हैं।

विकास की अदूरदर्शिता का स्पष्ट उदाहरण हवाई संपर्क विस्तार है। ‘उड़ान’ योजना के तहत 2016 के बाद सैकड़ों मार्ग और 70 से अधिक हवाई-अड्डे चालू किए गए, लेकिन कई व्यावसायिक रूप से टिकाऊ नहीं हो पाए। दिसंबर 2025 तक जोड़े गए लगभग दो दर्जन हवाई अड्डे, जैसे पठानकोट, शिमला, लुधियाना और राउरकेला, अस्थायी या पूर्णत: बंद रहे। उत्तरप्रदेश, झारखंड और बिहार में खोले गए कई हवाई-अड्डों पर भी नियमित उड़ानें नहीं चल सकीं और ‘एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ के दर्जनों हवाई-अड्डों ने भारी घाटा उठाया। यह दर्शाता है कि केवल हवाई-अड्डे बनाना विकास नहीं, बल्कि दिखावटी उपलब्धि बनकर रह जाता है।

See also  Independence day 2025 : कुहासे में लोकतंत्र

इन विकास परियोजनाओं पर संसद में गंभीर बहस होती और जनता व विशेषज्ञों से व्यापक विमर्श किया जाता, तो पर्यावरणीय खतरे और दुर्घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता था। उच्चतम न्यायालय का समय पर हस्तक्षेप, जैसा कि हाल ही में अरावली पर्वत मामले में हुआ, ढलानों और नदियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता था। भारत में संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी ने गणतंत्र को कमजोर करके हमें असुरक्षित तथा अधूरे विकास के मार्ग पर डाल दिया है।

जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के आधार पर सामाजिक विभाजन लोकतंत्र की एकता के लिए खतरा हैं। आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी और बुनियादी मानव सुविधाओं, जैसे – शुद्ध पेयजल, पक्के आवास और सस्ते सार्वजनिक परिवहन में असमान अवसर लोकतंत्र को जन-विश्वास की कमी की ओर ले जा रहे हैं। गणतंत्र तभी सफल कहा जा सकता है जब सभी नागरिक — ग्रामीण, दलित, अल्पसंख्यक, महिला, पिछड़ा या आदिवासी — शासन के निर्णयों और नीतियों में संतुलित रूप से शामिल हों।

आज सांसदों और विधायकों को प्रभावित करने के लिए नए-नए राजनीतिक हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। ‘चुनाव आयोग,’ ‘सतर्कता आयोग,’ ‘सूचना आयोग’ और ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक’ जैसी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई है, जबकि ‘इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट’ (ईडी) और ‘सेंन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इंटेंलिजेंस’ (सीबीआई) का उपयोग विपक्ष पर दबाव बनाने के औज़ार के रूप में बढ़ा है। परिणामस्वरूप परियोजनाओं की निष्पक्ष जाँच, भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण और सूचना के पारदर्शी प्रवाह पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों के वित्तीय दुरुपयोग से जुड़े मामलों में वृद्धि हुई है और संसद का प्रभावी नियंत्रण क्षीण हो गया है। यह हमारे गणतंत्र की एक गंभीर विफलता है।

See also  Independence day 2025 : कुहासे में लोकतंत्र

लोकतंत्र की असली कसौटी है कि सत्ता का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे। यदि यह केवल शहरों और कुछ विशेष हैसियत के वर्गों तक सीमित रह जाए, तो गणतंत्र की मूल भावना अधूरी रह जाती है। इसलिए नीति-निर्माण में स्थानीय समुदायों, ग्राम पंचायतों की सहभागिता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना उतना ही आवश्यक है जितना राज्यों और केंद्र के बीच संतुलन बनाए रखना।

भारत का गणतंत्र तभी परिपक्व और पूर्ण होगा जब नागरिकों की सशक्त, सुशिक्षित और प्रभावी सहभागिता उसकी असली नींव के रूप में सुनिश्चित हों। महात्मा गांधी की सलाह – लोकसेवकों द्वारा सरल, सादी जीवन-शैली अपनाना, सार्वजनिक धन का विवेकपूर्ण उपयोग करना और पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण विकास में जनता की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना – को लागू कर लोकतंत्र की नींव को सशक्त बनाया जा सकता है। गणतंत्र की सच्ची जीत तब होगी जब सत्ता का लाभ हर नागरिक तक पहुँचे, नीति-निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारदर्शिता और जवाबदेही हो और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। (सप्रेस)

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »