पेड़ संसार : बेकार नहीं है बबूल !!

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कभी, कहीं वृक्षारोपण करना हो तो बबूल का नंबर सबसे अंत में आता है। वजह है, बबूल से जुड़ी उसके नकारा होने की अफवाहें। अरावली पर्वत श्रृंखला के उजाड़े जाने की महती देशव्यापी चर्चा के बीच इस कांटेदार बबूल की चर्चा कर लें और देखें कि यह आम आदमी और किसानों के लिए कितना उपयोगी है। क्या बबूल, सु-बबूल हुए बिना सचमुच एक बेकार का पौधा होता है?


जरा सोचिए, जिस पेड़ को लगाना ना पड़े और वह अपने आप धीरे-धीरे घने जंगल में बदल जाए तो उसे क्या बेकार कहेंगे? देश के अनेक क्षेत्र इस तथाकथित ‘बेकार’ पेड़ से भरे पड़े हैं और यह स्वनिर्मित जंगल तरह-तरह के जीव-जंतुओं, विशेषकर पक्षियों से गुलजार है। शहरों से लगभग गायब हो चुकी गोरैया का यह सुरक्षित ठिकाना है। आज भी गौरैया के बड़े-बड़े झुंड इन कटीले पेड़ों पर बसेरा करते हैं और अपने आप को शिकारियों से सुरक्षित पाते हैं। मालवा और निमाड़ की कई सड़कों के किनारे दोनों तरफ आज भी बबूल के सैकड़ों पेड़ लगे हुए हैं जो बरसात के मौसम में अपने सुंदर पीले फूलों के साथ राहगीरों को शानदार नज़ारा प्रस्तुत करते हैं। 

कबीर का एक बड़ा ही प्रसिद्ध दोहा है – ‘करें बुराई सुख चहे, कैसे पावे कोय। बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय।’ देखा जाए तो आज हम सब बबूल ही तो बो रहे हैं। हमारे सारे काम बबूल बोने जैसे ही हैं। पेड़ काट रहे हैं और चाहत यह है कि हरियाली बनी रहे, वायु-प्रदूषण दूर हो। पहाड़ खोद रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि भूस्खलन ना हो, पहाड़ी सड़कों के किनारे झरने बहते रहें। शहर की सड़कों, कॉलोनी की गलियों पर पानी के लिए अपारगम्य पेवर्स लगाकर मिट्टी को सांस नहीं लेने दे रहे हैं। आपने जमीन में पानी जाने के रास्ते ही बंद कर दिए तो भूजल कैसे बढ़ेगा? नलकूपों में पानी कहां से आएगा? यह सब काम बबूल लगाने जैसे ही तो हैं।

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इसी संदर्भ में एक और दोहा याद कर लेते हैं, महाकवि रहीम का। यह समाज के ऐसे लोगों के लिए लिखा गया है जो परोपकारी नहीं हैं। रहीम कहते हैं  ‘आप न काहू काम के, डार, पात, फल, फूल। औरन को रोकत फ़िरे रहिमन पेड़ बबूल।’

कुछ लोगों की नजर में बबूल के यह ‘बेकार’ पेड़ अरावली पर्वत श्रृंखला की एक खास वनस्पति है – खेजड़ी, खैर और पीलू की तरह। अरावली पर्वत श्रृंखला के उजाड़े जाने की महती देशव्यापी चर्चा के बीच आइए इस कांटेदार बबूल की चर्चा कर लें और देखें कि यह आम आदमी और किसानों के लिए कितना उपयोगी है।

सदियों से इसकी छाल और फलियां कपड़ा रंगने के लिए टैनिन उपलब्ध कराती हैं। इससे खाकी रंग के कपड़े भी रंगे जाते हैं। बबूल का गोंद औषधीय महत्व का होने के साथ ही ‘केलीको प्रिंटिंग,’ डाईंग, कागज के निर्माण, माचिस, स्याही, पेंट और कन्फेशनरी की खट्टी-मीठी गोलियों के निर्माण में उपयोग होता है। इसकी नर्म नाजुक शाखाएं टूथब्रश और मंजन दोनों का कार्य कर मसूड़े की कसावट भी बढ़ाती हैं।

इसकी फलियों को आज भी निमाड़ में पशु-खाद्यसामग्री बनाने के लिए एकत्रित कर बाहर भेजा जाता है। यह एक घरेलू रोजगार का सुलभ साधन है। इसकी लकडी सागौन से ज्यादा मजबूत है और बड़े पैमाने पर पटिए बनाने के काम में आती है। इससे उम्दा किस्म का चारकोल मिलता है। यह लकड़ी बैलगाड़ी के पहिए, हल, बक्खर और खेती के कई उपकरण बनाने के काम में आती है।

बबूल, जिसे कांटों के नाम पर कोसा जाता है, उसका उपयोग आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले पशुओं से बचाने के लिए बागड़ की तरह किया जाता है। पलाश के पत्तों से बने पत्तल-दोनों को आपस में जोड़ने के लिए बबूल के बड़े-बड़े कांटे सुई और धागा दोनों का काम एक साथ करते हैं।

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बबूल का पेड़ ‘मटर कुल’ का है यानि इसकी जड़ों पर ‘जड़ ग्रंथियां’ पाई जाती हैं जिनमें उपस्थित ‘सहजीवी बैक्टीरिया’ हवा की नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदल देते हैं जो यूरिया का काम करती है। आसपास की मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसे उपजाऊ बनाती है। गहरी जड़ें मरुस्थल का विस्तार रोकती हैं। राजस्थान, मालवा, हरियाणा – सब जगह जल और वायु के संरक्षण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। राजस्थान, गुजरात और दिल्ली से लगे क्षेत्रों के पर्यावरण का यह एक महत्वपूर्ण पेड़ है।

‘ट्रीज ऑफ देहली’ और ‘जंगल ट्रीज ऑफ सेंट्रल इंडिया’ किताबों के लेखक प्रदीप कृष्ण  इसके उपयोग गिनाते हुए कहते हैं कि यह भारतीय पेड़ों में बहुत ही खास महत्व का है। इसे खेतों की मेड़ पर लगाया जाता है। भले ही शहरों के लोग इसके महत्व को न जानें, पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज भी इसका महत्व है।

बबूल एक मध्यम आकार का कांटेदार पेड़ है जिसका वितान पंखदार होता है, छाल काली। पंखनुमा हरे पत्तों से बरसात में गहरे पीले, छोटी-छोटी गोल गेंद जैसे फूलों से लदा यह पेड़ अपने आपमें एक आकर्षण पैदा करता है। इसकी फलियां नेकलेस की तरह मोतियों वाली होती है जिन्हें कभी ग्रामीण युवतियां पांव में पैजनियों की तरह और कान में बूंदों की तरह लटकाती थीं। रंगीन फूल पुंकेसरों के कारण सुगंधित होते हैं। इसकी पत्तियां ऊंटों, बकरियों और भेड़ों का प्रिय चारा है जो इसके बीजों को बिखेरने और दूर-दूर तक फैलाने में मददगार हैं। इसके पीले फूलों पर कई परागणकर्ता, जैसे-मधुमक्खियां और तितलियों का आना-जाना लगा रहता है। यह फूल उन्हें मीठा नेक्टर उपलब्ध कराते हैं जिनसे उनकी आबादी बनी रहती है। इसके पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और उसकी गुणवत्ता सुधारते हैं। पत्तियों में नाइट्रोजन 12 से 18 परसेंट तक पाई गई है। शुष्क भूमि के लिए फिर से बहाली में मदद करता है। यह कई तरह के पक्षियों का आवास है, विशेषकर तरह-तरह की चिड़ियों और विलुप्त होती गोरैया का इससे खास नाता है।

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भले ही इस पेड़ को उपेक्षित माना गया हो, पर यह है, बहुत महत्वपूर्ण। इसका जिक्र बाइबल में भी आया है तो इतने महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पेड़ को बेकार करार देने से पहले जरा सोच लेना चाहिए। अंत में भविष्य में यही बात होगी कि –‘काटे पेड़ बबूल का, तो सुख कहां से होय।’ (सप्रेस)

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