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इंदौर : स्वच्छता के तमगे और दूषित पानी की सच्चाई 

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इंदौर को वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा मिलता रहा है, लेकिन दूषित पेयजल से हुई 14 मौतों ने इस छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हादसा बताता है कि स्वच्छता के दावों के पीछे बुनियादी ज़रूरत—शुद्ध पेयजल—को सुनिश्चित करने में प्रशासन किस तरह विफल रहा है।


इंदौर मध्य प्रदेश ही नहीं देश के स्वच्छतम शहरों की श्रेणी में रहा है। लेकिन अब इसकी आई सच्चाई ने उजागर कर दिया कि इस महानगर की गंदगी को स्वच्छता की चादर से ढक दिया गया था। जिससे इंदौर को देशव्यापी स्वच्छता का खिताब मिलता रहे। किंतु अब दूषित पेयजल से हुईं 14 मौतों ने झूठ से पर्दा उठा दिया है। स्वच्छता के कथित मानकों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर हम अपने नागरिकों को षुद्ध पेयजल पिलाने में क्यों असफल सिद्ध हो रहे हैं। मानव शरीर के लिए शुद्ध पेयजल पहली जरूरत है। क्योंकि हम बिना भोजन के तो जीवित रह सकते हैं, लेकिन जल के बिना जीवन कतई संभव नहीं है। मानव शरीर में 70 प्रतिशत जल की उपलब्धता है।

भागीरथपुरा में नर्मदा नदी से पाइपलाइन के जरिए आने वाले जल में शौचालय का दूषित जल शुद्ध पेयजल में लंबे समय से मिलता रहा। बस्ती के लोग इस पानी को यह मानकर पीते रहे कि नगर निगम द्वारा पिलाया जाने वाला शुद्धता के मानकों पर खरा होगा ही। लेकिन धरती के नीचे बह रहा सीवर का मल नर्मदा के जल में पाइप लाइन फूट जाने से घुलता रहा। लोगों को जब पानी में गंदगी का अहसास हुआ तो शिकायत भी की गई। लेकिन निगम और जिला प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। जब 14 लोगों की मौत हो गई और 1000 के करीब लोग अस्पतालों में भर्ती हो गए, तब प्रशासन जागा और नागरिकों द्वारा बताए स्थल की खुदाई की। तब कहीं जाकर पता चला कि सीवर और पेयजल की लाइनें फूट जाने से नर्मदा जल में गंदगी डेढ़ वर्श से विलय हो रही थी। इस कारण लोगों की प्रतिरोधात्मक क्षमता घटती गई और बीमारी एवं मौत कहर बनकर टूट पड़े।
अब कुछ कर्मचारियों को निलंबित करके प्रषासन मामले को ठंडा करना चाहता है। लेकिन निलंबन कोई सजा नहीं है।

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नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर के इसी निर्वासन क्षेत्र से निर्वाचित हैं और पेयजल की आपूर्ति करने वाला विभाग भी उन्हीं के अधीन है। अतएव जब जुम्मेबार मंत्री से इस जानलेवा लापरवाही से जुड़े सवाल किए गए तो उन्होंने बौखलाकर अपा खो दिया और बोले, ये सब फोकट के सवाल हैं, इन्हें मत पूछिए। यह उनकी संवेदनहीनता दर्शाने वाला उत्तर था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद जब उनकी थू-थू हुई तो उन्होंने खेद जताकर मुक्ति पा ली।

लेकिन साफ है, भाजपा सरकार के मंत्री इस हद तक मद में चूर हो गए हैं कि अब उन्हें अपने उत्तरदायित्वों का उचित ख्याल तक नहीं रहता। यदि रहता तो कैलाश विजयवर्गीय को एहसास होता कि इस तरह की लापरवाही का उपचार महज सरकारी खानापूर्ति न होकर सजगता के साथ समस्या का हल खोजना था। इस दूषित पेयजल कांड के चलते इंदौर नगर निगम के महापौर पुष्यमित्र भार्गव तो इतने विचलित हुए कि जब अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने उनके निर्देश को महत्व नहीं दिया तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि अधिकारी सुनते नहीं है, इसलिए ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था में काम करना मुझ जैसे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है, अधिकारी बातचीत करने तक को तैयार नहीं हैं। इस संदेश को मुख्यमंत्री तक पहुंचा दीजिए। भार्गव कलेक्टर शिवम वर्मा पर भी नाराज हुए। दरअसल भार्गव ने मौतों का सिलसिला शुरू होने से पहले कलेक्टर को कहा था कि भागीरथपुरा से उल्टी-दस्त की शिकायत आ रही हैं।      
 
शुद्ध पानी की कमी शरीर में ऐसी बीमारियों को पैदा करने का सबब बनता है कि समय पर उपचार नहीं हुआ तो मौत निश्चित है। इस दूषित जल के कारण उल्टी-दस्त, डायरिया, टाइफाइड और हेपेटाइटिस भी जैसी बीमारियां पेट में जन्म ले लेती हैं। यही हश्र भागीरथपुरा में रहने वाले लोगों का हुआ। यदि इंदौर को लगातार कई साल तक स्वच्छता के तमगे नहीं मिले हो तो शायद इन मौतों की देश-परदेश के मीडिया में चर्चा भी नहीं हुई होती ? लेकिन कार्यपालिका और विधायिका तमगों के लिए किस तरह से गंदगी पर चादर बिछाती है, यह हकीकत इंदौर में हुई इन मौतों ने सामने ला दी है।

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दरअसल नागरिकों को शुद्ध पानी पिलाने के दावे चाहे जितने किए जाएं, ये हकीकत से बहुत दूर है। इसीलिए भारत में जल जनित बीमारियों की बहुलता पूरे साल बनी रहती है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते है कि दुनिया के पौने दो अरब लोग दूषित पानी पीने के लिए अभिशब्द हैं। इस कारण दुनियाभर में हर साल पचास लाख से ज्यादा लोग दूशित पानी पीकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर देते हैं। मध्यप्रदेश में ज्यादातर नगरीय निकायों की हालात बहुत खराब है। कोई भी निकाय यह दावा नहीं कर सकता कि वह शुद्ध पानी पिला रहा है। ज्यादातर नगरीय निकायों में पानी की मानकों के अनुसार जांच ही नहीं होती है। यह लापरवाही तब से और ज्यादा बरती जाने लगी हैं, जब से आरओ और बोतलबंद पानी की सुविधा सक्षम लोगों के लिए उपलब्ध हो गई है।  

मध्यप्रदेश में बारहमासी नदियां होने के कारण पानी की कोई कमी नहीं है। पानी बरसता भी खूब है। इन्हीं नदियों पर बने बांधों से ज्यादातर नगरों में पेयजल प्रदाय किया जाता है। लेकिन हम अपने इस प्राकृतिक वरदान को तात्कालिक लाभ के चलते अभिशाप में बदलने में लगे हुये हैं। औद्योगिक क्षेत्र की अर्थ दोहन की ऐसी ही लापरवाहियों के चलते मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में लगे स्टील संयंत्र रोजाना करीब 60 टन दूषित मलवा नदियों में बहा कर उन्हें जहरीला तो बना ही रहे हैं, मनुष्य-मवेशी व अन्य जलीय जीव-जन्तुओं के लिये जानलेवा भी साबित बना रहे हैं।

दरअसल इन स्टील संयंत्रों में लोह के तार व चद्दरों को जंग से छुटकारा दिलाने के लिये 32 प्रतिशत सान्द्रता वाले हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का इस्तेमाल किया जाता है। तारों और चद्दरों को तेजाब से भरी बड़ी-बड़ी हौदियों में जब तक बार-बार डुबोया जाता है, तब तक ये जंग से मुक्त नहीं हो जातीं ? बाद में बेकार हो चुके तेजाब को मलबा की चामला नदी से जुड़े नालों में बहा दिया जाता है। इस कारण नदी का पानी लाल होकर प्रदूषित हो जाता है, जो जीव-जंतुओं को हानि तो पहुंचाता ही है यदि इस जल का उपयोग सिंचाई के लिये किया जाता है तो यह जल फसलों को भी पर्याप्त नुकसान पहुंचाता है। पूरे मध्यप्रदेश में इस तरह की पंद्रह औद्योगिक इकाइयां हैं। लेकिन अकेले मालवा क्षेत्र और इंदौर के आसपास ऐसी दस इकाइयां है, जो खराब तेजाब आजू-बाजू की नदियों में बहा रही हैं। ये छोटी नदी और नाले आगे जाकर नर्मदा में विलय होते हैं। साफ है, नर्मदा के जल को दूषित करने के एक नहीं अनेक कारण हैं, जिनके समाधान प्रदेश की भाजपा सरकार पिछले 20 साल से नहीं खोज पाई है।

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