गांधी की सीख और आज की राजनीति का यथार्थ

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करीब साढ़े चार दशक पहले ‘सप्रेस’ के सम्पादक को दिए एक वीडियो साक्षात्कार में ‘तिल्दा-आश्रम’ के आंगन में राजगोपाल पीवी ने कहा था कि उनके पास ‘गांधी विचार से प्रेरित सौ-सवा सौ मजबूत, प्रशिक्षित कार्यकर्ता, करीब एक लाख रुपए और समूचा मध्यप्रदेश है और मैं यहां के हालात बदलना चाहता हूं।’ अब, इतने साल गुजरने और देश-विदेश में अपनी प्रभावी मौजूदगी जताने के बाद राजगोपाल क्या महसूस करते हैं?


मैं अक्सर सोचता हूँ कि भारत के सामाजिक आंदोलनों ने दशकों में कैसी लंबी और पेचीदा राह तय की है। मेरा अपना सफर, जिसने दशकों की सक्रियता से आकार लिया है, महात्मा गांधी के दर्शन में निहित है। गांधी के अहिंसा, सादगी और सबसे गरीबों से सीधे जुड़ाव के सिद्धांत हमेशा मेरे लिए मार्गदर्शक रहे हैं। जब मैं भूमिहीन मज़दूरों को संगठित करने, आदिवासी समुदायों के साथ उनके वनाधिकारों के संघर्ष में खड़ा रहने और अहिंसक यात्राओं का नेतृत्व करने के अपने कार्यों पर विचार करता हूँ, तो गांधी के आदर्शों की विरासत को देखता हूँ – जो बदल रही है, लेकिन आज के भारत में नई चुनौतियों का सामना कर रही है।

गांधी से मैंने जो सबसे बड़ा सबक सीखा है, वह है अहिंसा की गहन शक्ति। “आप हिंसा के माध्यम से एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकते,” गांधी अक्सर कहते थे और मैंने इसे हमेशा गहराई से माना है। अहिंसा केवल शारीरिक बल की अनुपस्थिति नहीं है; यह एक नैतिक शक्ति को विकसित करने का विषय है जो दूसरों को न्याय के संघर्ष में आपके साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।

ज़मीन और गरिमा का संघर्ष                   

ग्रामीण भारत के संघर्षों के केंद्र में हमेशा ज़मीन रही है। विनोबा भावे कहते थे : “किसी देश की सच्ची संपत्ति उसकी ज़मीन होती है और यदि आप सबसे गरीबों को ऊपर उठाना चाहते हैं, तो उन्हें उस पर अधिकार देना होगा।” भूमि स्वामित्व या उसकी अनुपस्थिति हमेशा गरीबी, शोषण और हिंसा से जुड़ी रही है। जब तक हम भूमि के सवाल को नहीं सुलझाते, तब तक हम ग्रामीण गरीबी को दूर नहीं कर सकते। ज़मीन केवल एक संसाधन नहीं है – यह पहचान है, गरिमा है और जीवन-यापन का आधार है।

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विनोबा भावे का करुणामय दृष्टिकोण

विनोबा का ‘भूदान आंदोलन’ अपनी सादगी में क्रांतिकारी था। वे मानते थे कि सामाजिक न्याय के लिए करुणा चाहिए, कानून नहीं। वे पूरे भारत में पैदल चले, ज़मींदारों से अपील करते हुए कि वे अपनी ज़मीन ज़रूरतमंदों को स्वेच्छा से दें। उन्होंने लाखों एकड़ ज़मीन इकट्ठा की, जिसमें से बहुत-सी ज़मीन सबसे गरीबों को दी गई। विनोबा का आंदोलन केवल भूमि सुधार नहीं था – यह सामाजिक और आध्यात्मिक जागरण था। वे समाज को यह सिखाना चाहते थे कि वह अपने सबसे ग़रीब लोगों के साथ कैसा व्यवहार करे।

हमने भूमि सुधार के लिए अक्सर कानून का उपयोग किया है, जबकि विनोबा केवल नैतिक आग्रह पर निर्भर रहे। हमारे पास विनोबा जैसी नैतिक ऊँचाई नहीं है। हमें परिवर्तन के लिए कानून का उपयोग करना पड़ा है, लेकिन चाहे करुणा के माध्यम से हो या कानून के, लक्ष्य हमेशा एक ही रहा है – ग़रीबों को संसाधनों, विशेष रूप से ज़मीन के पुनर्वितरण के माध्यम से सशक्त बनाना।

जयप्रकाश नारायण : विनोबा से प्रेरित, उनके आदर्शों से संचालित

भारत के सामाजिक आंदोलनों की बात करें तो जयप्रकाश नारायण का ज़िक्र आता ही है। वे विनोबा के आदर्शों से प्रेरित एक महान नैतिकता वाले व्यक्ति थे। एक समय ऐसा था जब जयप्रकाश जी ने स्वयं को विनोबा को समर्पित कर दिया था, उनका मार्गदर्शन माँगा था। वे विनोबा में वह नैतिक नेतृत्व देखते थे जिसकी भारत को ज़रूरत थी। वे उनसे सीखना भी चाहते थे।

जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ा, आपातकाल (1975) के दौरान जयप्रकाश जी राजनीति में खिंचते चले गए। पहले वे विनोबा के रास्ते पर थे, लेकिन जब उन्हें लगा कि लोकतंत्र ख़तरे में है, तो वे चुप नहीं रह सके। “लोकतंत्र को किसी भी कीमत पर बहाल करना होगा,” उन्होंने कहा। वे सामाजिक आंदोलन से राजनीति के क्षेत्र में आ गए–छात्रों, श्रमिकों और कार्यकर्ताओं को इकट्ठा करके इंदिरा गांधी के अधिनायकवाद के ख़िलाफ़ आंदोलन खड़ा किया।

राजनीति में लौटने का प्रभाव

सारी अच्छी मंशाओं के बावजूद, जयप्रकाश जी की राजनीति में वापसी ने अनजाने ही विनोबा के आंदोलन की रीढ़ को खींच लिया। वे स्वयंसेवक, जमीनी कार्यकर्ता जो भूदान और सर्वोदय आंदोलनों की आत्मा थे, अब राजनीति की ओर खिंचने लगे। इसके परिणामस्वरूप अहिंसा और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित सामाजिक आंदोलन कमजोर होने लगा।

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यह क्षति तब भी थी और आज भी बनी हुई है। हम आज भी उस प्रभाव को महसूस कर रहे हैं। उस सामाजिक आंदोलन की दुर्बलता ने एक शून्य पैदा कर दिया है – एक ऐसा शून्य जिसे भरने के लिए हम आज तक संघर्ष कर रहे हैं। जयप्रकाश की लोकतंत्र के लिए राजनीतिक लड़ाई बहुत ज़रूरी थी, लेकिन वह उन सामाजिक बुनियादों की कीमत पर आई जिन्हें विनोबा ने वर्षों पोषित किया था।

‘सरकारी संत’ कहे जाने का दर्द

इस कहानी का सबसे पीड़ादायक हिस्सा यह है कि इस दौर में विनोबा को बदनाम किया गया। जब जयप्रकाश का राजनीतिक आंदोलन तेज़ी से बढ़ रहा था, तब सर्वोदय आंदोलन में बने रहने वालों को अप्रासंगिक या ज़मीन से कटे हुए कहकर खारिज कर दिया गया। विनोबा को ‘सरकारी संत’ जैसा अपमानजनक उपनाम दिया गया। यह एक ऐसा अपमान था जिसने हममें से उन लोगों को गहरी चोट पहुँचाई जो विनोबा को सच में जानते थे।

विनोबा कभी सरकार के औज़ार नहीं थे। वे एक आध्यात्मिक नेता थे, जिन्होंने अपना जीवन सबसे वंचितों की सेवा में समर्पित किया था, लेकिन उस समय की उग्र राजनीतिक परिस्थितियों में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा जो सत्ता के साथ खड़े हैं – केवल इसलिए क्योंकि उन्होंने राजनीतिक लड़ाई में भाग नहीं लिया।

विनोबा अक्सर कहते थे, “हमें वह नहीं बनना चाहिए जिसके विरुद्ध हम लड़ रहे हैं।” वे मानते थे कि राजनीतिक शक्ति, चाहे कितनी भी नेक मंशा से प्राप्त हो, आसानी से भ्रष्टाचार और विभाजन की ओर ले जाती है – और वे सही थे। बाद के वर्षों में कई सामाजिक कार्यकर्ता, जो जयप्रकाश के साथ जुड़ गए थे, खुद उन्हीं सत्ता संरचनाओं में फँस गए जिनका वे विरोध करते थे।

विभाजन की राजनीति और उस पर प्रभाव

आज के भारत के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो मुझे वही विभाजनकारी राजनीति दिखाई देती है जो 1970 के दशक में शुरू हुई थी और आज भी हमारे राष्ट्र को टुकड़ों में बाँटकर विकृत कर रही है। आज के नेता अक्सर गांधी और जयप्रकाश के नामों का उल्लेख करते हैं, लेकिन उनके कार्यों का इन महान नेताओं की विचारधारा, सिद्धांतों या जीवनशैली से बहुत कम लेना-देना होता है।

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आज के नेता ज़मीनी हकीकतों से बहुत दूर, आम लोगों की गहन गरीबी और संघर्षों से कटे हुए हैं। वे विकास और प्रगति की बातें करते हैं, लेकिन ऐसा वे विशेषाधिकार और सत्ता की हैसियत से करते हैं। उनकी राजनीति जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर विभाजन से प्रेरित होती है।

अतीत से सबक, भविष्य के लिए आशा

जब मैं अपने सफर को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे एहसास होता है कि हमने जो अधिकांश काम किया है, वह इसी विभाजन के प्रतिरोध में था। चाहे वह भूमि यात्राएँ हों या आदिवासी समुदायों को जंगल अधिकारों के लिए संगठित करना – हमारा उद्देश्य हमेशा लोगों को एकजुट करना, उनके सामूहिक बल की याद दिलाना रहा है।

गांधी मानते थे कि “यदि आप सादा जीवन जिएँगे, तो दूसरे भी सरलता से जी सकेंगे।” यह सिद्धांत आज भी मुझे मार्गदर्शन देता है। हमारा कार्य केवल भूमि या नीति तक सीमित नहीं है, यह एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश है जहाँ हर किसी को गरिमा मिले, सबसे गरीब की भी आवाज़ सुनी जाए और जहाँ अहिंसा हमारे संघर्ष के मूल में बनी रहे।

हमने हज़ारों किलोमीटर गाँवों और जंगलों में चलकर लोगों से बात की, उनकी कहानियाँ सुनीं और उनकी आवाज़ को राष्ट्रीय मंच पर पहुँचाया। आज हम ‘एकता परिषद’ के साथ जो काम कर रहे हैं, वह इसी विश्वास की निरंतरता है। हम जिन मुद्दों के लिए संघर्ष कर रहे हैं – भूमि अधिकार, सामाजिक न्याय, पारिस्थितिकीय स्थायित्व – वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तब थे जब हमने शुरुआत की थी।

वह राजनीतिक नेतृत्व, जिसके पास कभी देश के लिए एक दृष्टिकोण था, अब स्वार्थ और तात्कालिक लाभ में विभाजित हो गया है। जो लोग कभी गांधी या विनोबा के आंदोलनों का हिस्सा थे, वे अब सत्ता के पदों पर हैं। भविष्य की ओर देखें तो आशा बनी रहती है। अहिंसा, न्याय और एकजुटता के सिद्धांत कालातीत हैं। वे भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे, जैसे उन्होंने मुझे प्रेरणा दी है। रास्ता लंबा है, लेकिन जैसा कि गांधी और विनोबा ने हमें दिखाया है – यह एक ऐसा रास्ता है जिस पर चलना सार्थक है। (सप्रेस)

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