तरह-तरह की योजनाओं, अनुदानों और देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों की बढ़ौतरी के बावजूद हमारी शिक्षा प्रणाली कुछ ऐसी है कि जिसमें औसत आर्थिक, बौद्धिक हैसियत वाले विद्यार्थियों की कोई पहुंच नहीं हो पाती। ऐसे में अपेक्षाकृत कम आर्थिक, बौद्धिक हैसियत वालों की शिक्षा के लिए क्या विकल्प बचते हैं?
भारत में उच्च शिक्षा को अकसर सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक गतिशीलता और व्यक्तिगत सशक्तिकरण का सबसे प्रभावशाली साधन माना जाता है, परन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में इसके समक्ष कई स्तरों पर गम्भीर चुनौतियाँ हैं। विशेष रूप से कठिन प्रवेश परीक्षाएँ और उच्च शुल्क संरचना, औसत आय तथा औसत बुद्धि के विद्यार्थियों के लिए कई बार अवरोधक सिद्ध हो रही हैं। इसके चलते गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सम्भावनाएँ बड़े पैमाने पर केवल उन्हीं विद्यार्थियों तक सीमित रह जाती हैं जिनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन, सामाजिक पूँजी और प्रतिस्पर्धात्मक शैक्षिक तैयारी के लिए अवसर उपलब्ध हैं। यह प्रवृत्ति शिक्षा को गरीबी उन्मूलन का ज़रिया बनाने की बजाय, गरीबी के पुनरुत्पादन का उपकरण बना देती है।
उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति
पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का तेज़ी से विस्तार हुआ है। 2025 के आँकड़ों के अनुसार देश में 1,362 विश्वविद्यालय और 52,538 कॉलेज संचालित हो रहे हैं, जहाँ कुल नामांकन 4.33 करोड़ से अधिक तक पहुँच गया है। इनमें से 81 प्रतिशत नामांकन प्रादेशिक सार्वजनिक विश्वविद्यालयों से होता है, जो ग्रामीण और वंचित समुदायों की पहुँच को बेहतर बनाते हैं।
विस्तार की इस प्रक्रिया में गुणवत्ता अक्सर पीछे छूट जाती है। अधिकांश निजी शिक्षा संस्थानों की प्राथमिकता लाभ कमाना है। उच्च शिक्षा के तीव्र वाणिज्यीकरण के दबाव में गुणवत्ता और नवाचार दोनों को निरन्तर नज़रअन्दाज़ किया जा रहा है, जिससे युवाओं की रोज़गार हासिल करने की योग्यता और उद्योग की माँग के अनुरूप कौशलों का विकास पीछे रह जाता है।
प्रवेश परीक्षा की कठिनाई और कोचिंग संस्कृति
‘आईआईटी,’ ‘एनआईटी,’ मेडिकल कॉलेज, टॉप विश्वविद्यालय – इन सभी में प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर की अत्यन्त कठिन परीक्षाएँ (जैसे – ‘जेईई,’ ‘नीट,’ ‘सीयूईटी’ आदि) उत्तीर्ण करनी होती हैं। कुल मिलाकर स्पर्धा इतनी ज़बरदस्त है कि लाखों अभ्यर्थियों में से सिर्फ़ कुछ हज़ार को ही शिक्षा संस्थानों में जगह मिलती है। यह सिस्टम ग्रामीण, सामाजिक रूप से पिछड़े और औसत बुद्धि वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच नहीं बना पाया है।
कोचिंग संस्कृति भी इस कठिनाई को बढ़ाती है; महँगी कोचिंग, विशेषकर शहरी केन्द्रों में, केवल उन अभिभावकों के बच्चों को उपलब्ध है, जिनके पास अतिरिक्त आर्थिक साधन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, गरीब परिवारों और औसत बुद्धि वाले छात्रों के लिए यह बाधा दोगुनी हो जाती है – एक तो गुणवत्ता वाली स्कूली शिक्षा मिलना कठिन है, दूसरे प्रतियोगी परीक्षा हेतु उपयुक्त मार्गदर्शन व संसाधनों का अभाव है।
प्रदेशों के ‘माध्यमिक शिक्षा बोर्डों’ में भी असमानता है। प्रादेशिक व केन्द्रीय बोर्डों के मानकों में भारी अन्तर पाया जाता है। परिणामतः बोर्ड परीक्षा में हासिल अंक, विषय की गहराई, मूल्यांकन प्रणाली और वोकेशनल तैयारी – इन सबमें काफी विविधता है, जो राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करती है।
चयन और प्रतिभा बनाम अन्य कारक
जहाँ टॉप संस्थानों में दाखिला पाने की प्रक्रिया में गणित और भौतिकी जैसे कठिन विषयों में उच्च अंक पाने वालों की वाह-वाही होती है, वहीं औसत विद्यार्थियों के लिए यह संघर्ष दुष्कर होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों को चयनित करने वाले ‘टॉप डाउन’ मॉडल में अकसर 99 प्रतिशत की आवश्यकता होती है। औसत बुद्धि वाले छात्र ऐसे मॉडल में हाशिए पर चले जाते हैं, जहाँ ‘समान अवसर’ नाममात्र के होते हैं।
शुल्क संरचना – शिक्षा या विलासिता?
भारत में उच्च शिक्षा की फीस बेहद असमान है। सार्वजनिक विश्वविद्यालय, जिनका वित्तपोषण सरकार करती है, वहाँ सामान्यतः औसत ट्यूशन फीस ₹10,000 – ₹50,000 प्रतिवर्ष तक सीमित रहती है। राज्य पब्लिक यूनिवर्सिटी में, जैसे महाराष्ट्र के इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए ₹50,000 – ₹1,00,000 तथा एमबीबीएस के लिए एक से दो लाख रुपए तक फीस है।
निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में यही फीस दो लाख से पांच लाख रुपए प्रतिवर्ष या उससे कहीं अधिक है, विशेषकर प्रोफेशनल कोर्स और मैनेजमेंट/मेडिकल एजुकेशन में। मेडिकल के क्षेत्र में यह अन्तर और विकराल हो जाता है – निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल फीस 60 लाख से एक करोड़ रुपए तक भी पहुँच जाती है।
आय और वर्ग का पुनरुत्पादन
स्पष्ट है कि सस्ती ट्यूशन फीस वाले सार्वजनिक संस्थानों की सीटें सीमित हैं और उनमें कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते सिर्फ सबसे बुद्धिमान और सबसे तैयारीशुदा विद्यार्थी (जिनमें अकसर आर्थिक रूप से बेहतर या कोचिंग सुविधा प्राप्त करने वाले छात्र शामिल होते हैं) ही प्रवेश पाते हैं। निजी विश्वविद्यालय अपेक्षाकृत अधिक सीटें और लचीलापन प्रदान करते हैं, किन्तु शुल्क इतना अधिक होता है कि औसत आय या उससे कम के परिवारों के लिए वहाँ पहुँचना लगभग असम्भव हो जाता है।
‘कॉम्प्रीहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे ऑफ एज्यूकेशन (2025)’ के अनुसार शहरी परिवार स्कूल फीस के लिए औसतन 15,143 रुपए प्रति वर्ष और ग्रामीण परिवार 3,979 रुपए प्रति वर्ष खर्च करते हैं। उच्च शिक्षा में यह अन्तर और बढ़ जाता है। सरकारी स्कूलों में वार्षिक खर्च 2,863 रुपए प्रति छात्र है, जबकि प्राइवेट में 25,002 रुपए प्रति छात्र।
भारत में परिवारों की औसत वार्षिक आय (2024-25) ढाई से तीन लाख रुपए अनुमानित है। भारत के 60 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनका समग्र वार्षिक शिक्षा व्यय उनकी कुल आय का 10 से 35 प्रतिशत तक पहुँच जाता है, विशेषकर जब दो या अधिक बच्चे उच्च शिक्षा में दाखिला लेते हैं। अधिकांश औसत आय वाले परिवार सस्ती सरकारी या राज्य वित्तपोषित संस्थाओं में बच्चों को पढ़ाने का प्रयास करते हैं, परन्तु उनके लिए कठिन प्रवेश प्रणाली डगर असाध्य कर देती है। निजी संस्थानों में ऊँचे शुल्क के कारण ऐसे परिवार या तो कर्ज पर निर्भर होते हैं या शिक्षा का स्तर सीमित कर देते हैं।
औसत बुद्धि और मेरिटोक्रेसी
भारतीय परीक्षा परिवेश में ‘औसत’ बुद्धि का अर्थ 90-95 अंक वाले बोर्ड परीक्षार्थी या कट-ऑफ से 8-12 प्रतिशत कम स्कोर वाले छात्र हैं। हालाँकि, प्रतियोगी परीक्षाओं में एक तरफ कट-ऑफ की सख्ती है, तो दूसरी ओर स्कूलों में इन परीक्षाओं का प्रशिक्षण ही नहीं मिलता है। इसके चलते इन विद्यार्थियों में से अधिकांश शीर्ष सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में प्रवेश नहीं पा पाते।
ऐसे में बच्चों को या तो मन मसोसकर महँगे प्राइवेट कॉलेजों का चयन करना पडता है या फिर रोज़गार बाज़ार में अप्रशिक्षित श्रमशक्ति के रूप में उतरने के लिए मजबूर होना पडता है। ‘सामाजिक विज्ञान अनुसन्धान’ अनेक बार प्रमाणित कर चुका है कि शिक्षा के जितने द्वार खुलने चाहिए थे, वास्तव में उतने ‘समान रूप’ में नहीं खुले हैं।
जाति-आधारित आँकड़ों के मुताबिक सामान्य वर्ग के खाते में देश की 88.4 प्रतिशत सम्पत्ति है, जबकि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग की बहुसंख्यक आबादी मात्र 11.6 प्रतिशत तक ही सिमटी है। ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च इन हायर एज्यूकेशन’ की रिपोर्ट के अनुसार शीर्ष शिक्षा संस्थानों में ये वर्ग और महिला प्रतिभागिता अभी भी सन्तोषजनक स्तर से काफी नीचे है।
शिक्षा और गरीबी : पुनरुत्पादन का दुष्चक्र
घोषित रूप में शिक्षा को गरीबी उन्मूलन का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है, जबकि उच्च शिक्षा तक सीमित पहुँच, शुल्क, कोचिंग और सामाजिक चयन के चलते शिक्षा गरीबी के पुनरुत्पादन का एक चक्र बन गया है। ‘इनकम इनइक्वालिटी एंड एक्सेस टू हायर एज्यूकेशन’ शीर्षक से ‘राष्ट्रीय नमूना सर्वे’ आधारित अध्ययन के अनुसार ऊँचे आर्थिक वर्ग वाले विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा में नामांकित किए जाने की सम्भावना, गरीब विद्यार्थियों की तुलना में तीन गुना अधिक है। आय और क्षेत्रीय/भाषिक आधार पर इस विषमता में पिछले सात वर्षों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अब भी कठिन चयन प्रक्रिया और शुल्क की दीवारों के पीछे क़ैद है। कठिन प्रवेश परीक्षाएँ, आय-आधारित शुल्क और सामाजिक चयन ने शिक्षा को गरीबी मुक्ति के बजाय एक बन्द द्वार बना दिया है। औसत आय वाले परिवारों के बच्चों के लिए सरकारी संस्थानों में प्रवेश पाने में असफलता का विकल्प या तो कम गुणवत्ता वाले निजी संस्थानों में या कर्ज़ लेकर महँगी पढ़ाई होता है, जो युवाओं को या तो आत्महन्ता ऋण के बोझ में या अपर्याप्त शिक्षा के साथ जीवन जीने को मजबूर करता है।
गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और समावेशी उच्च शिक्षा केवल नीति-घोषणाओं से नहीं, अपितु संगठित, विवेकपूर्ण और समावेशी क्रियान्वयन से ही सम्भव है। जब तक शुल्क, प्रवेश में कठिनाई, सामाजिक बाधाओं का सचेत और बहुस्तरीय समाधान नहीं निकाला जाएगा, तब तक शिक्षा भारत के वंचित वर्गों के लिए अवसर की खिड़की नहीं, बल्कि बाधाओं की दीवार बनी रहेगी। (सप्रेस)


