ज्योतिबा फुले की प्रासंगिकता : एक समकालीन विश्लेषण

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उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक अंधकार में जाति, लिंग और शिक्षा के प्रश्नों पर सबसे तेज स्वर उठाने वालों में महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम अग्रणी है। रूढ़ियों और अन्याय के विरुद्ध उनके जमीनी संघर्ष ने भारतीय समाज में परिवर्तन की नई राहें खोलीं। आज बराबरी और मानवाधिकारों पर बढ़ती बहस के बीच फुले के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं।


28 नवंबर : समाज सुधारक ज्योतिबा फुले पुण्यतिथि

ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ‘रवि’

भारतीय सामाजिक इतिहास में यदि किसी व्यक्तित्व ने जातिगत ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष असमानता, शैक्षिक पिछड़ेपन और मानवीय मूल्यों के ह्रास के विरुद्ध व्यापक तथा जमीनी स्तर पर संघर्ष किया तो उनमें से अग्रणी नाम है महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले। जिन्हें सामान्यतः ज्योतिबा फुले के नाम से जाना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी का भारत सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक अंधविश्वासों, जातिगत शोषण और पितृसत्तात्मक ढांचों से ग्रस्त था। ऐसे समय में फुले ने न सिर्फ विद्रोह की आवाज बुलंद की बल्कि व्यवहारिक नीतियों और ठोस पहलों के माध्यम से समाज में परिवर्तन के नए आयाम स्थापित किए।

आज 21वीं सदी के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में जब बराबरी, न्याय, शिक्षा, मानव अधिकार और संवैधानिक मूल्यों की चर्चा पहले से अधिक प्रखरता से हो रही है फुले के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के पूना शहर में एक माली (कुणबी) जाति के परिवार में हुआ था। जन्म से ही वे तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के कारण भेदभाव का सामना करते रहे।इसी अनुभव ने उन्हें शोषण के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी। उनकी मृत्यु 28 नवम्बर 1890 को पुणे में हुई।

उनकी सोच पर तीन प्रमुख कारकों का प्रभाव पड़ा – जातिगत अन्याय का व्यक्तिगत अनुभव , पाश्चात्य शिक्षा और उदारवादी विचारों का परिचय तथा समकालीन सामाजिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि ‌।

फुले समझ गए थे कि यदि समाज को बदलना है तो उसका पहला और सबसे शक्तिशाली माध्यम शिक्षा है। इसलिए उन्होंने महिलाओं, दलितों और वंचितों के लिए संघर्ष की दिशा चुनी जो उनकी समाज सुधारक यात्रा की आधारशिला बनी।

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भारत में आधुनिक स्त्री शिक्षा की शुरूआत का सबसे महत्वपूर्ण श्रेय ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को जाता है। 1848 में उन्होंने पुणे में पहला लड़कियों का स्कूल खोला। यह घटना ही सामाजिक क्रांति का प्रारंभ थी।

उस समय स्त्री-शिक्षा को पाप माना जाता था और सामाजिक व्यवस्था इसे धर्मविरोधी बताती थी। फुले दंपत्ति ने इन विरोधों को नज़रअंदाज़ करते हुए न सिर्फ स्कूल प्रारंभ किया बल्कि सावित्रीबाई को प्रशिक्षित कर स्वयं शिक्षिका बनाया।

आज जब हम “महिला सशक्तिकरण”, “लिंग समानता” और “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों की बात करते हैं तो फुले की पहल हमें याद दिलाती है कि यह संघर्ष आज नहीं दो सौ वर्ष पहले शुरू हुआ था।

फुले पहले ऐसे भारतीय सामाजिक सुधारक थे जिन्होंने सीधे तौर पर जाति-व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने “गुलामगिरी” (1873) में बड़ी स्पष्टता से बताया कि कैसे ऊँची जातियों ने कुछ धार्मिक ग्रंथों और मिथकों के माध्यम से निचली जातियों को गुलाम बनाए रखा। उनका तर्क था “मनुष्य अपनी कर्म क्षमता से बड़ा है, जन्म से नहीं।” यह विचार आज के लोकतांत्रिक, संवैधानिक भारत का मूल तत्व है।

फुले ने दलित-पिछड़ों की सामूहिक मुक्ति के लिए “सत्यशोधक समाज” (1873) की स्थापना की। इसका उद्देश्य था— जाति-आधारित भेदभाव समाप्त करना, विवाह-संस्कारों से ब्राह्मणवादी नियंत्रण हटाना, शिक्षा को सबके लिए उपलब्ध बनाना,शोषण-विरोधी चेतना जगाना।

आज के आरक्षण, सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग आयोग, दलित-उत्थान कार्यक्रम आदि सभी विचार फुले द्वारा बोए गए बीजों की ही आधुनिक पुष्पित शाखाएँ हैं।

फुले ने वेदों और पुराणों के नाम पर हो रहे अत्याचारों को खुलकर चुनौती दी। भारतीय समाज में विधवाओं को यातना की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ता था ।सफेद कपड़े,सामाजिक बहिष्कार,पुनर्विवाह का निषेध,यौन शोषण का फुले ने न सिर्फ शब्दों में विरोध किया बल्कि विधवाओं के लिए प्रसूति-गृह स्थापित किया ।जहाँ अनचाहे गर्भ से जन्मे बच्चों की सुरक्षा होती थी।

उन्होंने कहा कि बाल विवाह सामाजिक शोषण का सबसे बड़ा माध्यम है। आज जब भारत बाल विवाह उन्मूलन, किशोरियों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर बल देता है तो फुले का यह संघर्ष और भी महत्वपूर्ण प्रतीत होता है।

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सामाजिक सुधारक के साथ साथ फुले एक किसान चिंतक भी थे। उन्होंने देखा कि कैसे जमींदार, साहूकार, धनिये-महाजन और ब्रिटिश राज की कर व्यवस्था मिलकर किसानों को कर्ज और गरीबी की खाई में धकेल देती है। उनका मत था कि भारत की वास्तविक संपत्ति किसान हैं पर उसे ही सबसे अधिक शोषित किया जाता है।

फुले ने कुआँ-निर्माण और जल-संरक्षण जैसे कार्यों में योगदान दिया जो आज भी ग्रामीण विकास की रीढ़ माने जाते हैं। आज जब किसान आंदोलन, कृषि संकट, जमीन का बंटवारा, कर्ज, और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन जैसी समस्याएँ चर्चा में हैं फुले की सोच उनका मार्गदर्शक बनती है।कृषि क्षेत्र में कर्ज,फसल नुकसान,न्यूनतम समर्थन मूल्य,भूमि सुधार,सिंचाई प्रणाली,जल संकट जैसे मुद्दे किसानों को परेशान करते हैं।

फुले का किसान-दर्शन बताता है कि सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय अविभाज्य हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर फुले के विचारों का गहरा प्रभाव था।

अम्बेडकर स्वयं कहते थे कि फुले उनके “गुरु” हैं।संविधान में निहित समानता,स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय,आरक्षण,शिक्षा का अधिकार,मानव गरिमा जैसे मूल्य फुले की विचारधारा से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज जब संविधानिक मूल्यों की रक्षा और सामाजिक न्याय के मजबूती की चर्चा बढ़ रही है तब फुले का दर्शन एक प्रकाश-स्तंभ की तरह सामने आता है।

भले ही शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका है फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता, महिलाओं की उच्च शिक्षा,दलित-आदिवासी बच्चों की स्कूल पहुँच,तकनीकी शिक्षा की पहुँच अभी भी चुनौतियाँ हैं।फुले का सिद्धांत—“शिक्षा ही मुक्ति है” आज भी सामाजिक न्याय की कुंजी है।

भारत में जातिगत हिंसा, ऑनर किलिंग, अस्पृश्यता, आरक्षण विरोध, सामाजिक भेदभाव जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि जाति-व्यवस्था अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे दौर में फुले का संघर्ष हमें प्रेरित करता है कि समानता केवल कानून से नहीं बल्कि सामाजिक चेतना से संभव है।

आज भी घरेलू हिंसा,दहेज प्रथा,स्त्री के खिलाफ अपराध, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, बाल-विवाह, जेंडर गैप जैसी समस्याएँ व्यापक हैं। ज्योतिबा और सावित्रीबाई का स्त्री अधिकार संघर्ष आधुनिक नारीवाद का भारतीय आधार है।

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फुले धार्मिक कट्टरता के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने धर्म के नाम पर शोषण को सिरे से नकारा और मानवता को श्रेष्ठ बताया।

आज जब सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है फुले की समरसता और मानवीय मूल्यों की भावना और भी महत्वपूर्ण है।

फुले का दर्शन केवल भारतीय संदर्भ तक सीमित नहीं। उनके विचार विश्व के कई समानांतर आंदोलनों – ब्लैक लिबरेशन मूवमेंट,नारीवादी आंदोलन, दासता-उन्मूलन आंदोलन,सामाजिक लोकतंत्र,मानव अधिकार आंदोलन से मेल खाते हैं। उन्होंने उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष को वैश्विक दृष्टिकोण से देखा और मानवता को सर्वोपरि माना।

आज जब विश्व में नस्लवाद, लैंगिक असमानता और सामाजिक आर्थिक विषमता जैसी समस्याएँ व्याप्त हैं फुले का दर्शन वैश्विक प्रगतिशील विचारधारा की नींव जैसा प्रतीत होता है।

फुले का जीवन सिखाता है कि सत्य की खोज करो, सामाजिक अन्याय का विरोध करो, शिक्षा को हथियार बनाओ, स्त्रियों और कमजोर वर्गों के साथ खड़े रहो, डर और दमन से लड़ो। आज का युवा सामाजिक मीडिया,शिक्षा संकट,बेरोजगारी,सामाजिक असमानता,नैतिक मूल्यों के संकट जैसी चुनौतियों से गुजर रहा है। युवा यदि फुले की सोच अपनाए तो भारत और अधिक न्यायपूर्ण बन सकता है।

ज्योतिबा फुले का व्यक्तित्व केवल इतिहास की पुस्तक का अध्याय नहीं है। वे आधुनिक भारत के सामाजिक पुनरुत्थान के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। उनकी प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि आज भी शिक्षा सबके लिए समान नहीं,जातिगत असमानता मौजूद है, महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान चुनौतियों में हैं,किसानों का संकट कायम है,आर्थिक विषमता बढ़ रही है,सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी है।फुले का संदेश सरल है— “समानता, शिक्षा, मानवता और न्याय ही समाज की असली ताकत है।”

उनका जीवन भारत को बताता है कि सामाजिक परिवर्तन किसी कल्पना से नहीं बल्कि संघर्ष, साहस और निरंतर प्रयास से सम्भव है। इसीलिए आज और आने वाले समय में भी ज्योतिबा फुले हमारी चेतना, हमारे संघर्ष और हमारे भविष्य की दिशा को प्रेरित करते रहेंगे।

लेखक राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर, चर्चित टिप्पणीकार व पत्रकार हैं।

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