धीरेन्द्र मजूमदार भारतीय रचनात्मक आंदोलन के उन तेजस्वी व्यक्तित्वों में थे, जिनमें विचार की पारदर्शिता और कर्म की प्रतिबद्धता अद्भुत सामंजस्य के साथ प्रवाहित होती थी। धीरेन्द्रदा के नाम से पहचाने जाने वाले इस गांधीवादी कार्यकर्ता ने साधना, सेवा और श्रम-संस्कार को जीवन-दर्शन बनाया और समग्र ग्राम सेवा को धरातल पर उतारकर नई दिशा दी।
धीरेन्द्र मजूमदार : 125 वीं जयंती वर्ष
रमेश चंद शर्मा
धीरेन्द्र मजूमदार भारतीय रचनात्मक आंदोलन के उन दुर्लभ और तेजस्वी व्यक्तित्वों में से थे जिनके भीतर विचार की पारदर्शिता और कर्म की प्रतिबद्धता एक साथ प्रवाहित होती थी। उन्हें उनके समकालीन धीरेन्द्र भाई और युवा पीढ़ी प्रेम से धीरेन्द्रदा कहकर बुलाती थी। 10 सितम्बर 1900 को जन्मे इस व्यक्तित्व ने अपने जीवन को जिस तरह साधना, सेवा और साहस के साथ जिया, वह आज भी प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है।
धीरेन्द्रदा को लोग शास्त्री भी कहते थे और मिस्त्री भी, क्योंकि वे ज्ञान और श्रम दोनों में समान रूप से दक्ष थे। साधारण ग्रामीण से लेकर वरिष्ठ विशेषज्ञ तक, सभी से वे एक-सी सरलता और जिम्मेदारी के साथ संवाद कर लेते थे। उन्हें श्रम, श्रमिक और श्रम संस्कार के प्रति गहरी श्रद्धा थी। वे मानते थे कि समाज का स्वास्थ्य तभी लौटेगा, जब हर हाथ को काम मिलेगा, हर शरीर को अपनी क्षमता के अनुरूप विश्राम मिलेगा और हर मन को आत्मतृप्ति का आनंद प्राप्त होगा।
गांधीजी के सिपाही : युवावस्था से आजीवन समर्पण
युवावस्था में ही उन्होंने महात्मा गांधी को अपना मार्गदर्शक मान लिया और स्वतंत्रता आंदोलन की रचनात्मक धारा में सक्रिय योगदान दिया। उनका स्वभाव ऐसा था कि वे किसी भी समूह, किसी भी गांव, किसी भी परिस्थिति में पहुँचकर लोगों में ऊर्जा और सहभागिता की नई लहर जगा देते थे। युवा पीढ़ी को सही प्रशिक्षण देना, उनमें संवेदना और जिम्मेदारी जगाना और रचनात्मक कार्य की सार्थकता समझाना उनके काम की विशिष्टता थी। चिंतन, मनन, संवाद, संपर्क, श्रम और कर्मठता उनके जीवन के मूल तत्व थे।
समग्र ग्राम सेवा उनके जीवन का प्रमुख क्षेत्र था। यह केवल विषय नहीं था, बल्कि उनका जीवन-दर्शन था। उन्होंने न केवल ग्राम सेवा के सिद्धांतों का अध्ययन किया, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारकर उसके नए आयाम समाज के सामने प्रस्तुत किए। इसलिए वे इस क्षेत्र के शास्त्री और मिस्त्री दोनों माने गए। उन्होंने समग्र ग्राम सेवा पर अत्यंत सरल और उपयोगी साहित्य तैयार किया, जो आज भी मार्गदर्शक माना जाता है। उनके संपर्क में आने वाले अनेक कार्यकर्ताओं ने उनसे प्रेरणा पाकर ग्रामोदय के सफल प्रयोग किए और समाज में नई चेतना का संचार किया।
समग्र ग्राम सेवा के अग्रदूत
महात्मा गांधी के निर्वाण के बाद जब अखिल भारतीय चरखा संघ के अध्यक्ष पद के लिए व्यक्ति की तलाश हुई, तो यह जिम्मेदारी धीरेन्द्र मजूमदार को सौंपी गई। यह दादा के प्रति विश्वास का प्रमाण था। 1949 में सेवाग्राम आश्रम में एक महत्वपूर्ण मिलन हुआ जिसमें देश के अनेक दिग्गज नेता और चिंतक उपस्थित थे। उद्देश्य यह था कि गांधीजी के बाद राष्ट्र और उसके रचनात्मक कार्यक्रमों की दिशा क्या हो। इसी प्रक्रिया में विनोबा भावे की सलाह पर अनेक संस्थाओं के विलय से सर्व सेवा संघ का गठन हुआ, जिसे आगे चलकर अखिल भारतीय सर्वोदय मंडल के रूप में जाना गया। इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में जब धीरेन्द्र मजूमदार का चयन हुआ, तब यह स्पष्ट हो गया कि रचना, संगठन और शिक्षण के क्षेत्र में उनका स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
संस्था–मुक्त लोकगंगा यात्रा
अपनी आयु के साठवें वर्ष में पहुंचते ही उन्होंने संस्था के पदों से स्वयं को मुक्त कर लिया और अपनी लोकगंगा यात्रा आरम्भ की। यह यात्रा केवल पैरों की यात्रा नहीं थी, बल्कि विचारों की ज्योति थी जो गांव से गांव और प्रदेश से प्रदेश तक फैलती चली गई। देश भर में घूमते हुए उन्होंने गांधी विचार के प्रति पुनः आस्था जगाई और लोगों में यह विश्वास भरा कि सामाजिक परिवर्तन श्रम, सत्य और आत्मनिष्ठा से ही संभव है। यह लोकयात्रा 21 नवम्बर 1978 को उनकी देहावसान तिथि तक चलती रही।
गांधीजी ने ग्रामसेवक का जो स्वरूप बताया था, धीरेन्द्रदा उसके जीवंत उदाहरण थे। ग्रामसेवक को उन्होंने वह व्यक्ति माना था जो श्रम करता हुआ लोगों के बीच मिले, जो पुस्तकों के बजाय औजारों को अपना साथी बनाए, जो अपनी आवश्यकताएं न्यूनतम रखकर गांव के साथ जीवन जिए और अपनी आजीविका स्वयं पैदा करने का साहस रखे। धीरेन्द्र मजूमदार ने इस आदर्श को न केवल अपनाया, बल्कि उसे मांजते हुए आगे बढ़ाया और अपने प्रयोगों से उसे और भी प्रभावी बनाया।
सादगी और विनम्रता के पक्षधर
उनकी सादगी आकर्षक थी। आचार्य कृपलानी और सुचेता कृपलानी जैसे राष्ट्रव्यापी प्रभाव रखने वाले नेताओं से घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद उन्होंने कभी विशेष पहचान का व्यवहार नहीं अपनाया। वे सहज, सरल, विनम्र और एक हद तक बिल्कुल ग्रामीण जीवन के निकट रहने वाले व्यक्ति थे। पहली मुलाकात में कई बार वे कठोर या रूखे प्रतीत होते, पर थोड़ा धैर्य रखते ही उनका मधुर, आत्मीय और स्नेहिल हृदय प्रकट होने लगता।
उनके बारे में यह कहना बिल्कुल उचित है कि वे रक्त से बंगाली थे, जन्म से बिहारी, लंबे निवास से उत्तर प्रदेशी और श्रद्धा से सर्वभारतीय। उनके भीतर भावुकता भी थी और यथार्थ को देखने की क्षमता भी। इसी संतुलन ने उन्हें वह ऊंचाई दी, जहाँ व्यक्ति किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे देश का चितेरा बन जाता है।
ग्राम-विकास पर उनकी दृष्टि अत्यंत सटीक थी। वे कहते थे कि योजनाएं बनाने वाले स्वयं समृद्ध हो जाते हैं, पर जिनके लिए योजनाएं बनती हैं, उनके जीवन में अक्सर कोई वास्तविक सुधार नहीं दिखाई देता। पूंजीवाद और नौकरशाही का दबाव गांवों को और भी संकटग्रस्त कर रहा है। आजादी के आंदोलन से उत्पन्न निर्भयता धीरे-धीरे क्षीण होती गई और ग्रामीण क्षेत्र अधिक असुरक्षित महसूस करने लगे। उनका विश्वास था कि योजनाएं ऊपर से नहीं थोक में थोपनी चाहिए, बल्कि गांव की शक्ति और साधन से निर्मित होनी चाहिए।
वे यह भी कहते थे कि देश में कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, पर सच्चे और आत्मनिष्ठ कार्यकर्ता कम हैं। और ऐसे ही लोग समाज को परिवर्तन की दिशा में ले जा सकते हैं। स्वयं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बावजूद आंदोलन में उतर जाना और फिर गांधी मार्ग का आदर्श कार्यकर्ता बन जाना उनका जीवन-प्रमाण था।
दादा श्री धीरेन्द्र मजूमदार ने कई पुस्तकों की रचना की उनमें समग्र ग्राम सेवा की ओर (तीन खंडों में), क्रांति प्रयोग और चिन्तन, ग्राम स्वराज्य क्यों, ग्राम स्वराज्य की ओर, ग्राम स्वराज्य क्यों और कैसे, लोक गंगा के तट से, जमाने की चुनौती और ग्रामदान, शिक्षा में क्रांति और आचार्यकुल, खतरे की घण्टी, लोक गंगा यात्रा, क्रांति बनाम राहत, क्रांति बनाम सरकार, क्रांति का लक्ष्य आदि उल्लेखनीय है।
125वीं जयंती वर्ष : संकल्पों का अवसर
आज जब समाज कई तरह की दुविधाओं और भ्रम की स्थिति में खड़ा दिखाई देता है, जब संस्थाओं की विश्वसनीयता कम होती जा रही है और जब रचनात्मक विचार के मार्ग पर चलने वाले लोग धीरे-धीरे कम दिखते हैं, तब धीरेन्द्र मजूमदार जैसे व्यक्तित्वों की अनुपस्थिति अत्यंत खलती है। यह वर्ष उनकी एक सौ पच्चीसवीं जयंती का वर्ष है। इस समय उनके विचारों को पुनः प्रकाशित करना, उनके साहित्य को जन-जन तक ले जाना, उनके जीवन पर आधारित यात्राएँ और गोष्ठियाँ आयोजित करना, नाहक मिलन, व्याख्यान, सम्मेलन, शिविरों द्वारा उनके विचार जन-जन तक पहुँचाना और समग्र ग्राम सेवा की उनकी दृष्टि को नए समय के लिए पुनः परिभाषित किया जाने की जरूरत है।
धीरेन्द्र मजूमदार का जीवन इस सत्य का द्योतक है कि सरलता में तेज छिपा होता है, श्रम में सम्मान बसता है और विचार में वह ज्योति होती है जो मानवता को सही दिशा दिखाती है। 21 नवम्बर का यह पुण्य स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए पथ पर पुनः चलने का संकल्प भी होना चाहिए।


