सनातन जीवन-दर्शन : प्रकृति और संस्कृति से जुड़ी जीवन पद्धति

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भारतीय जीवन-दर्शन का मूल प्रकृति और संस्कृति के उस सनातन योग में निहित है, जिसने पंचमहाभूतों से सृष्टि की रचना की और मानव जीवन को आचार-विचार, आरोग्य, संतुलन व समृद्धि का मार्ग दिया। जैसे-जैसे यह योग टूटता गया, आर्थिकी, पारिस्थितिकी और जीवन-मूल्य क्षीण होते गए। पुनः समृद्धि का मार्ग इसी प्रकृति–संस्कृति संतुलन की वापसी में है।


पंच महाभूतों के योग की प्रकृति ने ही इस सृष्टि को बनाया है। इन पंचमहाभूतों से निर्मित सृष्टि को चलाने वाले का नाम ही भगवान है। भगवान शब्द पंच महाभूतों के प्रथम वर्ण के योग (भ- भूमि, ग- गगन, व- वायु, अ- अग्नि, न- नीर) से बना है। भारतीय जीवन पद्धति में इन्हीं पंचमहाभूतों की पूजा होती रही है। इन्हीं के योग को भगवान माना गया है। इन्हीं भगवान से हमारी जीवन पद्धति के निर्धारण में जीवन जीने की विद्या, व्यवहार, संस्कार व जीवन को चलने वाले योग, जीवन को बनाने वाले पदार्थ, द्रव्य, गैस के योग से प्रकृति और संस्कृति की समृद्धि होती है। इनसे जीवन पद्धति में किसी भी तरह का विस्थापन, बिगाड़ और विनाश नहीं होता; इसे ही सनातन माना जाता है। सनातन का अर्थ होता है- सदैव, नित्य, नूतन निर्माण की प्रक्रिया। सनातन में विश्वास रखने वाले लोग तŸव रूप में कभी मरते नहीं हैं, उनकी आत्मा पुनर्जन्म लेती रहती है। इसलिए पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाली उन सभी आत्माओं का मानना है कि यह सृष्टि सदैव चलती रहेगी, इसका कभी आदि या अंत नहीं होगा। यह चरैवेति-चरैवेति आदि-अन्त भारतीय शास्त्रोक्त कथन है। यही कथन भारतीय ज्ञानतंत्र को सदैव समृद्ध करता रहता है।

पंचमहाभूत और ‘भगवान’ की संकल्पना

यह समृद्धि हमारी प्रकृति में निर्मित संस्कृति के योग से बनी है। इसीलिए जब प्रकृति और संस्कृति का योग ठीक रहता है, तब आर्थिकी और परिस्थितिकी दोनों ही समान रूप से समृद्ध होती रहती हैं। जब तक भारत में प्रकृति और संस्कृति के योग से चलने वाली जीवन पद्धति रही, तब तक भारत दुनिया की 32 प्रतिशत जीडीपी वाला देश था; जब से उस संस्कृति और प्रकृति में दूरियां बढत़ गईं, तब से हमारी आर्थिकी और पारिस्थितिकी दोनों में गिरावट आई है। 

हम अभी भी सँभल सकते हैं, यदि हम अपनी प्रकृति और संस्कृति दोनों को संवेदनापूर्वक, समान रूप से समझकर विश्वास के साथ जिएँ। प्रकृति और संस्कृति के योग को ही अपना इष्ट (भगवान) मानकर, इसके साथ वैसा ही व्यवहार करने लगने से जिस तरह की प्रलय की कल्पनाएं हमारे शास्त्रों में हैं, कि जल से ही जीवन की शुरुआत और जल से ही जीवन का प्रलय द्वारा अंत, वह भी झूठ साबित हो सकता है। उसको झूठ साबित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह भी प्रकृति की ही एक प्रक्रिया है। लेकिन हम यदि अपनी सनातन समृद्धि चाहते हैं और हमारा विश्वास प्रकृति और संस्कृति के योग में जितना गहरा होगा, उतना ही समृद्ध हमारे जीवन का इष्ट हमें मिल जाएगा।

जब तक हमारे जीवन का इष्ट हमारे पंचमहाभूतों से निर्मित करने वाली सृष्टि का भगवान था; तब तक हम इसी भगवान के साथ अपने सारे नित्य-कर्म, जीवन-विद्या में शामिल होते थे। जीवन-विद्या हमें इसी के साथ आगे बढ़ाती और समृद्ध बनाती रहती थी, यही सनातनता की समृद्धि का रास्ता है। हमारी सनातनता की समृद्धि आर्थिकी और परिस्थितिकी दोनों में बराबर हो सकती है। यदि हम प्रकृति व संस्कृति का योग समझकर अपनी-अपनी योजनाओं का भू-सांस्कृतिक मानचित्र तैयार करके, उसके अनुरूप  अपने को आगे बढ़ाएंगे, तो हमारी पुनर्जनन की प्रक्रिया विस्थापन, बिगाड़ और विनाश मुक्त होगी। पुनर्जनन शब्द अब इसलिए उपयोग करना जरूरी है, क्योंकि हमारी बहुत सारी चीजें अब विस्थापन, बिगाड़ और विनाश के रास्ते पर जा रही हैं। इसलिए यदि हमें इन सबको सनातन विकास के रास्ते पर लाना है, तो भारत के भू-सांस्कृतिक मानचित्र के बिना वह रास्ता हम पकड़ नहीं सकते।

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प्रकृति–संस्कृति का योग: भारत की मूल जीवन-पद्धति

हमें यदि भारत  की सनातनता को समृद्ध करने वाला रास्ता पकड़ना है, तो हमें प्रकृति और संस्कृति के साथ जीवन को आनंदमय बनाते हुए, मोक्ष की तरफ जाना है। यह रास्ता धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों कदमों पर आगे जाता है; तभी तो भारत जीवन विद्या के सभी आयामों से चार कदम आगे है। इन चार कदमों को हम बार-बार स्मरण करके, अपनी संस्कृति को समृद्ध बनाने का रास्ता पकड़ सकते हैं। हमारे चार आश्रमों, चार अवस्थाओं तथा जीवन को समृद्ध बनाकर पूर्ण आनंद के रास्ते को ही भारतीय ज्ञानतंत्र में धर्म कहा गया है। इसी के माध्यम से काम करके हम आनंदपूर्वक जीवन को चलाने के लिए जो भी अर्थ, पदार्थ आदि कुछ भी चाहिए, उसे प्राप्त करके, मोक्ष के रास्ते पर प्रस्थान कर सकते हैं। मोक्ष हेतु हम जीवन को आनंदपूर्वक शुरू करके, अंत तक इस शरीर को नीरोग, आरोग्य रखने के लिए ऐसा ही आचार-विचार, आहार-विहार करें, जिसमें आनंद हो। यह हमें प्रकृति और संस्कृति के योग से ही प्राप्त हो सकता है।

प्रकृति और संस्कृति का योग ही हमें आरोग्य प्रदान करता है। इसी से हम अपने धर्म को मानकर समृद्ध बन सकते हैं। फिर हमें अर्थ की  चिंता नहीं रहती, हम आनंद से मोक्ष को प्राप्त करने लगते हैं। इस मोक्ष को पाने के लिए हमारी जीवन विद्या ही हमारी संस्कृति का निर्माण करती है। जीवन विद्या में जो भी हमारी संस्कृति बनी है, वह दुनिया की सबसे समृद्ध संस्कृति है। इस समृद्ध संस्कृति का रास्ता प्रकृति से होकर ही गुजरता है।

सनातन समृद्धि और भू–सांस्कृतिक मानचित्र का महत्व

प्रकृति में विश्वास, आस्था, श्रद्धा और इष्ट-भाव, यही भारत के लोगों में था; इसीलिए भारतीय लोग दुनिया की आर्थिकी और पारिस्थितिकी में समृद्ध थे। ये हमारी सनातन जीवन पद्धति के नए शब्द है। चूँकि आज हमारी शिक्षा में इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता है, इसलिए मैं इन दोनों शब्दों का ही प्रयोग कर रहा हूं; लेकिन भारतीय ज्ञानतंत्र में इनके पर्याय जीवन में समृद्धि, आनंद, संतोष और समाधान शब्द हैं। संतोष और समाधान हमें तभी होता है, जब हमारी आर्थिकी और पारिस्थितिकी दोनों हमारे जीवन को मोक्ष के रास्ते पर जाने में सहायक होती हैं। ये जीवन में मोक्ष प्राप्ति के अवरोधों से हमें बचा लेती हैं।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आयुर्वेद आरोग्यरक्षणम् व भारतीय जीवन विद्या को हमने जब तक माना और जिया, तब तक भारत में सभी प्रकार की समृद्धि बनी रही। आयुर्वेद प्रकृति है और जीवन विद्या संस्कृति है। आयुर्वेद पूरा प्रकल्प मानव और प्रकृति के योग का सहयोग नहीं है, बल्कि वह एक जीवन विद्या है। इस जीवन विद्या में जो जीवन पद्धति बनी थी, जिस व्यवहार, संस्कार से जीवन पद्धति का निर्माण हुआ था, वह इसी प्रकृति और संस्कृति के योग का आधार थी।

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धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष: जीवन विद्या के चार आधार

प्रकृति व संस्कृति के योग के आधार से ही भारत आरोग्य प्राप्त करता था। आरोग्य के कारण ही हम दुनिया को सिखाने वाले माने जाते थे। दुनिया हमारे इसी आरोग्य के जीवन व्यवहार और संस्कार का सम्मान करती थी। जैसे-जैसे हमारा जीवन इस प्रकृति से कटता गया, वैसे-वैसे हमारी संस्कृति में गिरावट आती गई। फिर हम सिखाने लायक नहीं बचे, बल्कि हम सीखने वाले बन गए। तब से हम शिक्षा द्वारा दुनिया से आधुनिक चिकित्सा पद्धति, सीखने लगे। जब हम सीखने वाले बन जाते हैं, तब हमारी संस्कृति और प्रकृति के विभेद के कारण हमारे जीवन में भारी गिरावट आ जाती है। आज इसी गिरावट का दौर है। इस गिरावट के दौर को यदि हमें उत्कर्ष की तरफ लेकर जाना है, तो हमें प्रकृति और संस्कृति के योग को अपने जीवन का आधार बनाना होगा; तभी हम पनः दुनिया को सिखाने वाले बन सकेंगे।

हमारी खेती, पशुपालन, उद्योग, जीवन जीने की कला आदि सब कुछ हमारे जीवन के लिए जरूरी है। अपने प्रचीन ज्ञान-तंत्र से हमें जल, नदियों व समुद्र के प्रबंधन का कौशल पुनः प्राप्त होगा। जब हम अपने ज्ञान तंत्र से इसे प्राप्त कर लेंगे, तो हमारा व्यवहार हमारे संस्कार का केवल हिस्सा ही नहीं बनेगा, बल्कि वह हमारे रक्त प्रवाह में शामिल हो जाएगा। वही रक्त-प्रवाह हमें आरोग्य की तरफ लेकर जाएगा।

समकालीन संकट: प्रकृति से दूर जाती संस्कृति

आज हम सभी तरह से बीमार हैं। यह बीमारी तथा हमारे जीवन में हमारा अर्थ, धर्म और इसका लालच हमें आनंद के मार्ग व मोक्ष के द्वार से दूर करता है। मोक्ष के मार्ग से दूर होने वाले जीवन को आधुनिक शिक्षा में तनाव कहते हैं। जब हमारे जीवन में ये तनाव बढ़ते जाते हैं, तो हमारे जीवन का आनंद स्वतः मिटने लगता है। इसी आनंद की प्राप्ति के लिए हमें एक बार फिर अपनी प्रकृति और संस्कृति के योग को देखने की जरूरत है। इस योग को देखकर, समझकर जब हम भारत के पुनर्जनन की रीति-नीति और भू-सांस्कृतिक मानचित्र तैयार करेंगे, तो भारत फिर से अपनी समृद्धि की राह पकड़ लेगा। ये समृद्धि की राह ही सनातन होगी ।

प्रकृति और संस्कृति के योग को ही भारतीय ज्ञान-तंत्र में अध्यात्म कहते हैं। भौतिक पदार्थों की गणनाओं और संकलन से जीवन की जरूरत के लिए, जरूरतों की समस्याओं के समाधान करने को अविष्कार या विज्ञान कहते हैं। इस विज्ञान में मानवीय लालच को पूरा करने के लिए नई प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी, न्यू साइंस, रोबोटिक साइंस और एआई, इन सब भौतिक चीजों के आविष्कार को हमारी समस्या का समाधान बताया जाने लगा है।

अध्यात्म बनाम आधुनिक विज्ञान

भारत जिस अध्यात्म से विज्ञान के रिश्ते को साधता था, वही भारत की प्रकृति और संस्कृति का योग था। तब हमें इस तरह का जीवन जीने का लालच नहीं था, जैसा आज है। तब हमारे जीवन का लालच मोक्ष था। मोक्ष के लिए इस तरह के विज्ञान की जरूरत नहीं होती। आज हमारे जीवन का लालच भौतिक सुख है। इस भौतिक सुख को पाने के लिए बहुत सारे तनाव हम झेलते रहते हैं। आनंद पाने के लिए हमें ऐसे तनाव की जरूरत नहीं थी। वह तो हमें तनाव से मुक्ति देता था। वह हमें ऐसी विद्या सिखाता था, जिसमें विनम्रता हो। यही विद्या हमें आनंद और मोक्ष की तरफ लेकर जाती है।

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यह आधुनिक विज्ञान हमें सर्वापरि सुख भौतिक पदार्थों, द्रव्यों और गैसों के माध्यम से देता है। इन भौतिक पदार्थों व द्रव्यों में बहुत सारे तनाव होते हैं, जो हमारे जीवन में शामिल होते जाते हैं। तनावपूर्ण जीवन हमें भौतिकी, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी देता है, जबकि प्रकृति व संस्कृति का योग हमें शांति, समाधान और समृद्धि देता है और जो आज भी हमें पुनर्जीवित करने की क्षमता रखता है।

प्रकृति व संस्कृति का योग हमें सनातन बनाए रखना चाहता है, लेकिन हमारी भौतिकी, प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी इस सनातन में विश्वास नहीं रखती। उसका सनातन में कोई विश्वास नहीं है, उसका लक्ष्य तो चीजों को तोड़-मरोड़ कर अन्ततः भौतिक सत्य पर पहुंचना है; जबकि अध्यात्म का लक्ष्य प्रकृति और संस्कृति के योग के सत्य द्वारा मोक्ष तक जाना है। इन दोनों में बड़ा अंतर है और इन दोनों के अंतर की लड़ाई ने भारत को बहुत नुकसान पहुंचाया है। यह भौतिक सुख की लड़ाई हमारे यहां उत्तर पश्चिम के देशों से आई है, जो नियंत्रण, अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण करने वाली जीवन पद्धति का अंग है। हमारे आध्यात्मिक ज्ञान का मूल उद्देश्य पोषण है। वह पोषण अपना, सबका और अपनी प्रकृति और संस्कृति का भी जरूरी है।

पुनर्जीवन का मार्ग: प्रकृति–संस्कृति योग की ओर वापसी

एक तरफ अध्यात्म में पोषण है और दूसरी तरफ विज्ञान में शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण हैं। यह शोषण, प्रदूषण, अतिक्रमण करने वाली सोच उत्तर पश्चिम के देशों में है। क्योंकि वहां का जीवन प्रकृति के विरुद्ध लड़ने वाला था, प्रकृति पर नियंत्रण करने वाला था।

भारतीय जीवन का लक्ष्य प्रकृति के साथ रह कर अपने को पोषित करना और प्रकृति के साथ प्यार से जीना था। धीरे-धीरे हमारे ऊपर पश्चिम और उत्तर के देशों का एक नज़रिया बनता गया। उस नज़रिये ने अब अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं कि आब हमें आरोग्य रहने की भी जरूरत नहीं है। अब हमें दवाइयों से जीवित रहना और दवाइयों के सहारे अपने को जीवन के अंतिम क्षण तक बनाए रखने का मोह बन गया है। जबकि अध्यात्म में प्रकृति और संस्कृति के योग से अंतिम क्षण तक आरोग्य की चाह रखते हुए नया शरीर पा लेने का लक्ष्य रहता था।

अभी विज्ञान में नया शरीर मिलेगा या नहीं मिलेगा, इसकी बात ही नहीं है; जो कुछ है, इसी जीवन में कर लो, बस! यही अन्तिम जीवन है। जबकि प्रकृति संस्कृति योग में हमारा जीवन तो बराबर चलता रहेगा। यह एक चक्र है जीवन का। इसलिए कोई जल्दी नहीं है। जीवन संपोषित करने वाली रीति-नीति और गति बनाए रखना ही हमारी भारतीय जीवन पद्धति थी। अब जीवन पद्धति से यह सब मिटते जा रहे हैं। इसलिए इसको समग्र और समृद्ध बनाने हेतु अपने पुराने जीवन दर्शन को पुनर्जीवित करने की जरूरत है।

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