कृषि : खतरे में खेती

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भारत-अमरीका के बीच जारी व्यापारिक बातचीत में एक अडंगा ‘जीन संवर्धित’ (जीएम) अमरीकी मक्का और सोयाबीन को भारत में खपाना भी है। यदि इस समझौते को मंजूरी मिल जाती है तो हमारी खेती को अपने समाज और उससे जुड़े सचराचर जगत को भोजन उपलब्ध करवाने की बजाए बाजार की चिंता करना होगी। क्या खतरे हैं, बाजारू खेती के? और किन धतकरमों से बाजारू खेती को हमारे खेतों में उतारा जा रहा है?


नीलेश देसाई

भारत में कृषि अब महज़ एक आर्थिक गतिविधि नहीं रह गई है; यह एक युद्ध का मैदान बन चुकी है। यह युद्ध उन करोड़ों छोटे किसानों, उनकी सदियों पुरानी पारिस्थितिक चेतना और उन शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय निगमों के बीच है जो ‘आधुनिक कृषि’ के नाम पर नियंत्रण और मुनाफ़ा चाहते हैं।

‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ (आईसीएआर) के जीनोम-संपादित धान परीक्षणों में उजागर हुई ‘वैज्ञानिक धोखाधड़ी’ इस बड़े संघर्ष का एक दर्दनाक सबूत है। यह केवल कुछ दूषित प्रयोगशाला परिणामों की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी नीतिगत व्यवस्था की कहानी है जो कॉर्पोरेट हितों को वैज्ञानिक ईमानदारी, पर्यावरणीय सुरक्षा और सबसे बढ़कर, किसान की संप्रभुता से ऊपर रखती है।

‘आईसीएआर’ के आंकडों का ‘अनैतिक खेल’ : साख पर गंभीर सवाल

‘कोएलिशन फॉर ए जीएम-फ्री इंडिया’ द्वारा जारी रिपोर्ट ने ‘आईसीएआर’ और कृषि मंत्रालय की साख को सवालों के घेरे में ला दिया है। आरोप स्पष्ट है : असुरक्षित जीन तकनीक को देश पर थोपने के लिए दो प्रमुख जीनोम-संपादित धान की किस्मों के नतीजों में जानबूझकर हेराफेरी की गई।

‘पूसा डीएसटी-1’ : इस किस्म को खारी और क्षारीय मिट्टी में 30% अधिक उत्पादन देने का दावा किया गया था। ‘आईसीएआर’ की अपनी ही रिपोर्ट बताती है कि 2023 में पर्याप्त बीज उपलब्ध नहीं थे और 2024 में तटीय खारी मिट्टी के परीक्षणों में ‘कोई उत्पादकता बढ़त नहीं दिखी।’ फिर भी, चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर इसे बड़ी सफलता की तरह प्रचारित किया गया।

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‘डीआरआर धन 100 कमला’ : इस पर 17% अधिक उपज और 20 दिन जल्दी पकने का दावा किया गया था। असलियत में, इसका औसत उत्पादन अपनी मूल किस्म से 4% कम रहा, और पकने में अंतर सिर्फ 3 दिन का था।

यह व्यवहार ईमानदार विज्ञान और नैतिकता का उल्लंघन है। ‘कोएलिशन’ ने चेतावनी दी है कि नवाचार के नाम पर ‘घटिया विज्ञान’ परोसना न केवल किसानों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह भारतीय विज्ञान पर नागरिकों के भरोसे को भी कमज़ोर करता है।

कॉर्पोरेट नियंत्रण : जब किसान ग्राहक बन जाता है

यह वैज्ञानिक बेईमानी एक ऐसे व्यापक ढांचे का हिस्सा है, जिसे कॉर्पोरेट कृषि दुनिया भर में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। यह दर्शन किसान को ‘उत्पादक’ के बजाय ‘ग्राहक’ में बदलना चाहता है, जो हर इनपुट (बीज, रसायन, सलाह) के लिए कंपनी पर निर्भर हो।

नियंत्रण का जाल:

‘बायर’ जैसी कंपनियाँ मालिकाना हक़ वाले बीजों, जीएम/जीई फसलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को अपने कॉर्पोरेट जाल में फंसाती हैं। इसका असली लक्ष्य किसानों के आँकड़ों (डाटा) पर नियंत्रण हासिल करना और उन्हें हर फसल-चक्र के लिए बाहरी ‘इनपुट’ खरीदने के लिए मजबूर करना है।

‘आधुनिकता’ का छद्म आवरण:

कॉर्पोरेट कृषि अपनी व्यवस्था को ‘आधुनिक’ कहकर, पारंपरिक, टिकाऊ और छोटे फ़ार्मों को ‘पिछड़ा’  बताकर खारिज करती है, लेकिन इस ‘आधुनिकता’ के परिणाम स्पष्ट हैं : मिट्टी का भयानक क्षरण, जलस्रोतों का प्रदूषण, जैव-विविधता का भारी नुकसान और ग्रामीण विस्थापन। यह मॉडल केवल मुनाफ़ा देखता है, किसान और पारिस्थितिकी नहीं।

यह संघर्ष उस दर्शन पर आधारित है जिसे समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने ‘लोहे का पिंजरा’ कहा था — नियंत्रण, दक्षता और मुनाफ़े की तर्कशक्ति जो जीवन के हर क्षेत्र को कैद कर देती है। कॉर्पोरेट खेती में, ज़मीन केवल शोषण का उपकरण बन जाती है।

किसान दर्शन की प्रासंगिकता: आज़ादी और नैतिक कार्य

इस पृष्ठभूमि में, किसान एक शक्तिशाली नैतिक प्रतिरोध के रूप में खड़ा होता है। वह उस मूलभूत सत्य को दोहराता है जो वेंडेल बेरी ने कहा था : ‘भूमि के साथ सही संबंध ही एक-दूसरे के साथ सही संबंध का आधार हैं।’

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नैतिक कार्य और स्वावलंबन :

किसानी दर्शन के अनुसार, मिट्टी पर काम केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक कार्य है। यह स्वावलंबन और लचीले समुदायों को पोषित करता है। यह खेती की अनिश्चितताओं को स्वीकार करता है, जो किसान को विनम्रता सिखाती हैं — ठीक इसके विपरीत, जिसे औद्योगिक व्यवस्था ख़त्म करना चाहती है।

जैव-विविधता और पर्यावरण सुरक्षा:

यह दर्शन जैव-विविधता के मूल्य को समझता है। जीनोम-संपादित धान जैसी कुछ चुनिंदा किस्मों का व्यापक प्रचार, भारत की हजारों स्थानीय किस्मों को नष्ट कर देगा, जिससे आनुवांशिक एकरूपता बढ़ेगी। यह हमारे पर्यावरण बीमा को ख़त्म कर देता है और किसी भी नए कीट या रोग के सामने पूरी फसल को असुरक्षित बना देता है।

किसानों का वास्तविक संकट : ‘एमएसपी’ और नीतिगत अंधापन

इस वैज्ञानिक धोखाधड़ी को हम देश के कृषि नीतिगत संकट से अलग करके नहीं देख सकते। जैसा कि कृषि अर्थशास्त्री देवेन्दर शर्मा तर्क देते हैं, ‘भारत में किसान का मूल संकट यह नहीं है कि उसके पास नई तकनीक नहीं है, बल्कि यह है कि उसे उसकी मेहनत का ‘एमएसपी’ (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के रूप में उचित मूल्य नहीं मिलता।’

सरकार उस पैसे और समय को, जो वह संदिग्ध वैज्ञानिक परियोजनाओं और उनके प्रचार पर खर्च कर रही है, किसान की आय सुरक्षा और ‘एमएसपी’ की कानूनी गारंटी पर क्यों नहीं लगाती? यह तथाकथित ‘आधुनिकता’ किसानों का ध्यान मूल आर्थिक अधिकारों से भटकाती है और उन्हें कॉर्पोरेट नियंत्रण में धकेलती है, ताकि सस्ता श्रम और सस्ता कच्चा माल मिलता रहे।

खाद्य संप्रभुता: भविष्य का मार्ग

इन चुनौतियों का जवाब ‘खाद्य संप्रभुता’ में निहित है।

नियंत्रण वापस लेना : लोगों को यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उनका भोजन कौन उगाता है और कैसे उगाता है—यह नियंत्रण ‘निगमों’ के हाथ से निकलकर स्थानीय उत्पादकों के हाथों में वापस आना चाहिए।

हमें ऐसी कृषि और कृषि-पारिस्थितिकी को अपनाना होगा जो मिट्टी के स्वास्थ्य, जलचक्रों और जैव-विविधता के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित करती हैं। यह मॉडल किसानी दर्शन की नैतिकता को विज्ञान-समर्थित, टिकाऊ खेती से जोड़ता है।

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‘जीएम-फ्री इंडिया गठबंधन’ की मांगें तुरंत पूरी होनी चाहिए : जीनोम-संपादित फसलों पर सख्त ‘जैव सुरक्षा नियमन’ लागू हो, सभी परीक्षण रिपोर्टें सार्वजनिक हों और इस धोखाधड़ी के लिए ‘आईसीएआर’ तथा कृषि मंत्रालय को जवाबदेह ठहराया जाए।

 ‘आईसीएआर’ के परीक्षणों में उजागर हुई धोखाधड़ी एक नैतिक पतन है। यह हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि जब तक किसान ज़मीन और बीज पर अपना नियंत्रण वापस नहीं लेते, तब तक न तो उनकी आजीविका सुरक्षित है, न ही हमारी पर्यावरणीय विरासत। यह समय है कि देश की जनता और नीति-निर्माता कॉर्पोरेट नियंत्रण के ‘लौह पिंजरे’ को तोड़कर, किसानी की देशी राह पर चलें, जहां लाभ के बजाय  आध्यात्मिकता, समुदाय और पारिस्थितिकी को केंद्र में रखा जाता है। ज़मीन से जुड़ाव ही हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। (सप्रेस)

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