विश्व मछुआरा महिला दिवस पर सवाल यही है कि मछुआरा महिलाओं का नेतृत्व, उनकी आवाज़ और उनके संघर्ष आज भी मुख्यधारा के महिला आंदोलनों में जगह क्यों नहीं पाते? समुद्र किनारे खड़ी ये महिलाएं सिर्फ आजीविका नहीं, जाति, श्रम और अस्तित्व की जंग लड़ रही हैं।
5 नवंबर : विश्व मछुआरा महिला दिवस
लता प्रतिभा मधुकर
हर साल 5 नवंबर को विश्व मछुआरा महिला दिवस मनाया जाता है। सोशल मीडिया पर बधाइयाँ तो मिलती हैं, पर असली सवाल अब भी अनुत्तरित हैं—महिला आंदोलनों और जन आंदोलनों में मछुआरा महिलाएँ और उनका नेतृत्व आखिर कहाँ है? उनके मुद्दे, उनकी राजनीतिक आकांक्षाएँ, उनकी अस्मिता—इन सबको मुख्यधारा की चर्चाओं में जगह क्यों नहीं मिलती?
यह सच है कि विश्व स्तर पर मछुआरा महिलाएँ संगठित हो रही हैं और तटीय नियमन, विस्थापन, पुनर्वास तथा आजीविका जैसे मुद्दों पर संघर्ष भी जारी है। लेकिन भारत में मछुआरा स्त्रियों के संघर्ष को केवल इन्हीं सवालों तक सीमित कर देना, उनके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक और जाति-आधारित अनुभवों की अनदेखी है। एक तरफ ऊँची जातियों का स्त्रीवादी विमर्श उनके जीवन पर शोध-पत्र लिखकर पर्यावरणीय बहसों में सम्मान अर्जित करता है; दूसरी ओर स्वयं मछुआरा महिलाओं की आवाज़, नेतृत्व और उपस्थिति इन विमर्शों में लगभग अदृश्य है।
यह समुदाय सिर्फ आजीविका का प्रतीक नहीं है—यह एक सांस्कृतिक और जाति-आधारित उत्पादन संसार है। सवाल यह है कि क्या हम इसे उसी दृष्टि से देखना चाहते हैं? या फिर कोली गीतों को केवल मनोरंजन, लोक-नृत्य और मंचीय प्रदर्शन तक सीमित कर देंगे—बिना यह समझे कि उनमें समुद्र, जोखिम, श्रम और स्मृति की जीती-जागती भाषा बोलती है।
पूर्णिमा मेहर का नाम मछुआरा महिलाओं के नेतृत्व में प्रमुख रूप से जाना जाता है। वे समाजवादी विचारधारा से जुड़ी रहीं और उन्होंने सैकड़ों मछुआरा महिलाओं को संगठित करने का कठिन, लगातार और धैर्यपूर्ण काम किया। लेकिन यह भी सच है कि मुख्यधारा के अधिकांश महिला और जन आंदोलनों में उनका नाम, उनका कार्य और उनके साथ संघर्ष करने वाली स्त्रियाँ आज भी लगभग अनजान हैं।
यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि हमारे यहाँ तथाकथित जन आंदोलनों की प्रवृत्ति अक्सर एक चेहरा, एक नेतृत्व और एक वर्ग की प्रतिनिधिक छवि पर ही टिक जाती है। आंदोलन की भीड़ में शामिल वे स्त्रियाँ जो समुद्र के ज्वार-भाटे की तरह रोज़ जीवन की लड़ाई लड़ती हैं, उन्हें आंदोलन की भाषा में अक्सर सिर्फ “जनसमर्थन” या “संख्या” के रूप में दर्ज किया जाता है—नेतृत्व और विचार की साझेदार के रूप में नहीं। यानी संघर्ष में वे शरीर हैं, लेकिन नेतृत्व में उनकी आवाज़ अनुपस्थित है।
क्या इसलिए मछुआरा महिलाओं को मुख्यधारा के महिला आंदोलनों में वह जगह नहीं मिली, क्योंकि उनका संघर्ष केवल वर्ग और रोजगार के प्रश्न तक सीमित नहीं, बल्कि जाति, श्रम और आजीविका की सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा है? जिन महिलाओं के हाथ समुद्र की नमक-गंध और मछली के श्रम से पहचाने जाते हैं, उन्हें अक्सर उन आंदोलनों में जगह नहीं मिली, जिनका नेतृत्व लंबे समय तक ऐसे वर्गों के हाथों में रहा जो प्याज़-लहसुन से लेकर मछली और मांस तक से परहेज़ को ‘शुचिता’ का हिस्सा मानते रहे। परिणाम यह हुआ कि मछली या मांस बेचकर अपना घर चलाने वाली स्त्रियाँ महिला आंदोलन की परिधि में धकेल दी गईं।
कड़वी लेकिन सच बात यह है कि जिस तरह सवर्ण समाज कई दलित समुदायों को ‘अछूत’ मानता आया है, मछुआरा समुदाय को सामाजिक दूरी और श्रम-आधारित पूर्वाग्रह में उससे भी अधिक हाशिए पर रखा गया है।
जब तक हम जाति-आधारित उत्पादन व्यवस्था और जेंडर के सवाल को एक-दूसरे से जोड़ कर विश्लेषण नहीं करेंगे तब तक जाति, लिंग भाव और उत्पादन व्यवस्था में ब्राह्मणवाद कैसे घुसा है, समझ ही नहीं पाएंगे। यह नहीं समझेंगे कि मछुआरा सहित अन्य ओबीसी, विमुक्त जनजाति की महिलाओं के वर्गीय अधिकार आरक्षण और जाति से कैसे जुड़े हैं, तब तक इन महिलाओं का संघर्ष महिला संघर्ष नहीं माना जाएगा।
भारत का महिला आंदोलन आज तक लगभग 70 प्रतिशत मांसाहारी, मछली खाने वाली और उत्पादन-आधारित महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा करता आया है। यही सच्चाई है, क्योंकि इन का नेतृत्व मांस-मछली से परहेज रखनेवाली शाकाहारी ब्राह्मणवादी मानसिकता की उच्चवर्णीय महिलाओं के हाथों में है।
इसलिए सोचिए कि क्यों भारत की मछुआरा महिलाओं को उच्च शिक्षा और नेतृत्व के अवसर नहीं मिलते? जैसे वे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, जापान, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, चीन, फिलिपींस, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में हमें दिखाई देता है।
वर्ल्ड फिश वर्कर्स फोरम में भारत की कितनी मछुआरा महिलाएं हैं? जो हैं, क्या वे मछुआरा समुदाय से हैं? या उनको संगठित करनेवाली या उनपर रिसर्च करनेवाली खुद को भद्र कहनेवाली महिलाएं है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन देशों का हमने उदाहरण दिया—जैसे श्रीलंका, फिलिपींस, थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम—वहाँ मछुआरा महिला आंदोलन का नेतृत्व स्वयं मछुआरा महिलाओं के हाथ में है। वहाँ उनके संघर्ष और एजेंडा को किसी ऊँची जाति या बाहरी नेतृत्व के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता। भारत में समस्या यह नहीं कि मछुआरा महिलाएँ संघर्ष नहीं कर रहीं। समस्या यह है कि उनके संघर्ष की बागडोर अक्सर उनके हाथों में नहीं होती।
असल सवाल यह है कि इन उत्पादक वर्गों की महिलाएँ केवल प्रतीक या प्रतिनिधि चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि संख्यात्मक और राजनीतिक शक्ति के रूप में नेतृत्व में कब दिखाई देंगी। जब तक नेतृत्व उनके हाथों में नहीं आता, उनके संघर्षों को हमेशा “मुद्दा” तो माना जाएगा, लेकिन निर्णय उनका नहीं होगा।
और यह बात समझने लायक है कि यदि संसदीय राजनीति में महुआ मोइत्रा जैसी उच्च जाति की सांसद सिर्फ मांसाहार की सांस्कृतिक प्रतीक का ज़िक्र भर करने से संसद से बाहर की जा सकती हैं—
तो ऐसे राजनीतिक वातावरण में उन महिलाओं को कितनी जगह मिलेगी, जिनका पूरा जीवन, श्रम और पहचान मछली, समुद्र, नमक और बाजार से गढ़ी हुई है? इस प्रश्न का सीधा अर्थ यह है— हम हाशिए पर रही मछुआरा महिलाओं को राजनीति और समाज-परिवर्तन की वास्तविक भूमिकाओं में कब और कैसे स्थान देंगे?
जब मैं ये सवाल उठाती हूँ, तो अक्सर मुझसे कहा जाता है कि मैं महिला आंदोलन या जन आंदोलनों की कमियाँ क्यों दिखाती हूँ। मेरा उत्तर सीधा है—क्या इन सवालों पर बात करना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा नहीं है? क्या आंदोलन की मुख्यधारा हाशिए की महिलाओं को हमेशा पीड़िता, असहाय या अज्ञान मानकर चलती रहेगी? क्या यह नेतृत्व से उन्हें बाहर रखने की अप्रत्यक्ष सेंसरशिप नहीं है?
मांस-मछली उनके रोज़मर्रा के जीवन और आजीविका का आधार है। इसलिए इसे मंदिर–मस्जिद और पवित्रता–अपवित्रता की बहसों में मत घसीटिए। मछुआरा, कसाई, खटीक, शिकार करने वाले आदिवासी, विमुक्त, चमार, मांग, ढोर, मातंग—इन समुदायों के प्रति हमारी संवेदनाएँ इतनी क्षीण क्यों हो जाती हैं? और जब बात ओबीसी या श्रम-आधारित शूद्र महिलाओं की आती है, तब मांसाहार को लेकर समाज और आंदोलन दोनों की संवेदनशीलता अचानक कहाँ गायब हो जाती है?
लगभग सभी मछुआरे ओबीसी समुदाय से आते हैं, जैसे कि हमारे देश के लगभग 90 प्रतिशत किसान भी ओबीसी हैं। लेकिन ‘किसान महिला’, ‘असंगठित मज़दूर महिला’ या ‘मछुआरिन’ के नाम पर बने वर्गीय संगठनों ने उनकी उत्पादक जाति-आधारित अस्मिता को अक्सर नज़रअंदाज़ किया। वामपंथी वर्ग आधारित स्त्रीवाद ने भी इस पहचान को केंद्र में रखने के बजाय सिर्फ श्रम के सवाल के रूप में प्रस्तुत किया।
इसी कारण भारत में, केरल और बंगाल जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो मछुआरा संगठनों के राष्ट्रीय नेतृत्व में उच्च जाति की महिलाएँ लगभग अनुपस्थित हैं। कारण साफ़ है—मछली पकड़ना, बेचना या खाना मांसाहार की श्रेणी में आता है, और मुख्यधारा के महिला नेतृत्व का बड़ा हिस्सा स्वयं को शाकाहारी सांस्कृतिक नैतिकता से परिभाषित करता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा महिला आंदोलन के पचास वर्ष पूर्ण होने पर महाराष्ट्र में स्त्री मुक्ति परिषद का गठन किया गया। इसमें कई स्त्री संगठन जुड़े, लेकिन इनमें अब भी अनेक समुदायों की महिलाओं की उपस्थिति और उनके मुद्दों का उल्लेख लगभग अनुपस्थित है। महिला आंदोलन ने उनके साथ प्रत्यक्ष तौर पर काम करने की बजाय, अधिकतर उनके जीवन पर शोध और रिपोर्ट बनाने को प्राथमिकता दी—क्योंकि उनके नाम पर फंडिंग प्राप्त करना संभव था। ऐसे कई एनजीओ और संस्थाएँ खड़ी हुईं, जिनमें इन समुदायों की महिलाओं को न तो संगठन में शामिल किया गया और न ही निर्णय-प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका रही। उनके नाम, श्रम और अनुभवों का इस्तेमाल हुआ—पर आवाज़ और नेतृत्व नहीं दिया गया। इसलिए मूल सवाल अब भी बना हुआ है— महिला संगठनों में सक्रिय सदस्य और नेतृत्व की भूमिका में कितनी मछुआरा महिलाएँ वास्तव में मौजूद हैं?


