दीपावली : रोशनी घर में नहीं, दिलों में भी फैलाएं

संध्‍या राजपुरोहित

दिवाली रोशनी का नहीं, संवेदनाओं का भी त्योहार है — वह जो भीतर के अंधकार को मिटा सके। आज जब कृत्रिम उजालों में रिश्तों की ऊष्मा खोती जा रही है, जरूरत है कि हम अपने भीतर करुणा, प्रेम और अपनापन का दीप जलाएँ। सच्ची दिवाली वही है जो दिलों में रोशनी भर दे, न कि केवल घरों में।

संध्‍या राजपुरोहित

अंधकार में छोटा-सा दीप भी उम्मीद का प्रतीक बन जाता है। दिवाली उसी उम्मीद का उत्सव है, जहाँ प्रकाश, प्रेम और आशा एक साथ जन्म लेते हैं। लेकिन हर साल जब घर-आँगन दीयों से जगमगाते हैं, तो मन यह पूछता है क्या यह उजाला हमारे भीतर भी उतरा है? क्या यह रोशनी हमारे दिलों के अंधेरे को भी मिटा पा रही है?

हमारे चारों ओर कृत्रिम रोशनी की चकाचौंध है, पर भीतर संवेदनाओं का दीप मंद पड़ता जा रहा है। यही वह अंधकार है जिसने इंसान के भीतर की करुणा, दया और अपनापन को ढक लिया है। अब त्यौहार भी उपभोग और प्रदर्शन का प्रतीक बनते जा रहे हैं — जहाँ दीये बाज़ार से आते हैं, मिठाई ऑनलाइन आती है, और शुभकामनाएँ एक क्लिक में खत्म हो जाती हैं। जो पर्व कभी रिश्तों को जोड़ते थे, अब वे “सेल” और “ऑफर” के पोस्टरों में खो गए हैं। रोशनी बढ़ी है, पर उसका ताप कम हो गया है। पर क्या इस चमक-दमक के बीच हम अपने भीतर की संवेदनाओं को भी जागृत कर पा रहे हैं? क्या केवल घर और गली ही रोशन हैं, या हमारे रिश्तों और हृदयों में भी वही प्रकाश फैला है?

शहरों की भागदौड़, बढ़ता एकाकीपन, और सोशल मीडिया का आभासी संसार हमें दूसरों से दूर करता जा रहा है। पहले मोहल्ले दुख-सुख में साथ खड़े होते थे, आज वही लोग स्क्रीन के पीछे से ‘रिएक्शन’ भेजते हैं। हम सुविधाएँ बढ़ाते जा रहे हैं, पर संवेदनाएँ घटती जा रही हैं। संवेदनाएँ अब “लाइक” और “इमोजी” में बदल गई हैं। यह बदलाव केवल सामाजिक नहीं, भावनात्मक भी है — और यही हमारी असली चिंता होनी चाहिए।

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समाजशास्त्र की दृष्टि से देखें तो संवेदनाओं का क्षरण एक गहरी सामाजिक समस्या है। शहरीकरण, एकल परिवार, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी संस्कृति ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है।हर व्यक्ति अब “मैं” के घेरे में सिमट गया है। ऐसे में “हम” की अवधारणा धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।

संवेदनाएँ कम होने का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि समाज में सहानुभूति का स्थान उदासीनता ने ले लिया है। जहाँ पहले किसी का दुख सामूहिक होता था, वहाँ अब हर व्यक्ति केवल अपनी सुविधा का हिसाब रखता है। यही कारण है कि अपराध बढ़ रहे हैं, हिंसा और असमानता सामान्य होती जा रही है।

संवेदनाएँ ही हमारे समाज की आत्मा हैं। यही हमें इंसान बनाती हैं। जब ये कम होने लगती हैं, तो समाज में दूरी, उदासीनता और अकेलापन बढ़ जाता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम किसी की पीड़ा या अकेलेपन को महसूस करने का समय ही नहीं निकाल पाते। संवेदना — यह शब्द केवल किसी के दुःख में आँसू बहाने की क्रिया नहीं, बल्कि मानवता का मूल तत्व है। यह वह पुल है जो एक मनुष्य को दूसरे से जोड़ता है।

कभी हमारे समाज की पहचान ही यही थी कि कोई दुखी होता तो पूरा समुदाय उसके साथ खड़ा हो जाता। परंतु आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में यह भाव जैसे धुँधला पड़ गया है। हमने आधुनिकता और तकनीक के नाम पर अपने भीतर के इंसान को खो दिया है। यही कारण है कि अकेलेपन, मानसिक तनाव और सामाजिक असमानता बढ़ती जा रही है।

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इस बार, जब हम दीया जलाएँ, तो उसे केवल घर की  देहरी  पर न लगाएँ, बल्कि अपने दिल के कोने में भी जलाएँ। यह दीया उन लोगों के नाम हो सकता है जिनकी ज़िन्दगी में हम अनजाने में खुशियाँ भर सकते हैं। उस मजदूर के लिए जो दूसरों के घर सजाते-सजाते अपने घर के अंधेरे में सोता है। उस माँ के लिए जिसने अपने बच्चों की खुशी में अपनी इच्छाएँ भूल गई। उस बुज़ुर्ग के लिए जो आँगन में अकेला बैठकर पुरानी यादें गिनता है। उस बच्चे के लिए जिसकी हथेलियों में अब भी मेहनत की कालिख है। और उस इंसान के लिए जो अब भी भीड़ में भी दूसरों के दर्द को महसूस कर सकता है।

जब हम किसी का दुःख साझा करते हैं, किसी की मदद करते हैं, किसी अकेले के साथ समय बिताते हैं, तो वही असली दीप होता है। यही वह संवेदना है जो समाज को जोड़ती है और मानवता को जीवित रखती है। छोटे-छोटे कदम जैसे किसी को मुस्कान देना, किसी वृद्धाश्रम में समय बिताना, किसी ज़रूरतमंद के जीवन में खुशी लाना — ये सभी समाज में वास्तविक रोशनी फैलाने के उपाय हैं ।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि संवेदनाएँ केवल किताबों में सिखाई जाने वाली बातें नहीं हैं,वे जीवन की वह सहजता हैं जो हर बच्चे के भीतर जन्मजात होती हैं। जब हम किसी के दुःख में साथ खड़े होते हैं, किसी की मदद करते हैं, किसी की आँखों में मुस्कान लाते हैं — तभी हम असली दीपक जलाते हैं।

बस आवश्यकता है उन्हें पोषित करने की — घर में, विद्यालय में, समाज में। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र और करुणा का निर्माण होना चाहिए।स्कूलों और परिवारों में यह वातावरण बनाना होगा जहाँ बच्चे “सफल” होने से पहले “संवेदनशील” बनना सीखें।
त्योहारों को केवल उपभोग का नहीं, सेवा का अवसर बनाना होगा। जब हम दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ना शुरू करेंगे, तभी यह समाज फिर से उजाला महसूस करेगा।  शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर या सफलता नहीं होना चाहिए, बल्कि चरित्र, करुणा और सामाजिक चेतना का निर्माण होना चाहिए। जब हम दूसरों के जीवन में अपनी संवेदनाओं की रोशनी पहुँचाएंगे, तभी समाज वास्तव में उजाले का अनुभव करेगा।

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दिवाली का असली अर्थ केवल घर को सजाने और दीप जलाने का नहीं है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि असली उजाला भीतर होना चाहिए। यह वह समय है जब हम अपने भीतर के स्वार्थ, ईर्ष्या और उदासीनता के अंधकार को मिटाकर, दूसरों के जीवन में रोशनी पहुँचाएँ। इस बार दीया जलाते समय एक क्षण रुकें और सोचें — क्या इस रोशनी का कोई असर किसी और के जीवन में भी पड़ा है? क्या किसी के चेहरे पर मुस्कान आई है? अगर हाँ, तो समझिए कि हमारी दीपावली सफल हुई।

सच्ची दिवाली केवल घर और गली की रौशनी नहीं, बल्कि दिलों की रोशनी है। यह वही रोशनी है जो हमें याद दिलाती है कि संवेदनाएँ ही इंसानियत का सबसे बड़ा दीपक हैं। घर का अंधेरा मिटाना आसान है, पर दिलों का अंधेरा मिटाना असली चुनौती है।

इस दिवाली, आइए हम केवल अपने घर नहीं, अपने दिलों को भी रोशन करें। इस बार एक दिया उन गुम होती संवेदनाओं के नाम जलाएँ, जो समाज में फिर से उम्मीद, अपनापन और मानवता की लौ जला सके। यही वह दीप है जो हर अंधकार को दूर करेगा और सच्ची रोशनी का प्रतीक बनेगा।

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