इंदौर, 17 अक्टू। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से मेधा पाटकर द्वारा दायर जनहित याचिका (WP No. 35006/2024) पर सुनवाई करते हुए सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों के लिए एक ऐतिहासिक राहतभरा आदेश पारित किया है। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जिन विस्थापितों को भूखंड आवंटन पत्र दिए गए हैं, उनका पंजीयन भारतीय पंजीयन अधिनियम, 1908 की धारा 17 के तहत दो महीने की समयसीमा में अनिवार्य रूप से कराया जाए।
सरकार की स्वीकारोक्ति और न्यायालय की गंभीर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश राजोरा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए और यह स्वीकार किया कि सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत विस्थापितों को दिए गए भूखंड आवंटन पत्र आज तक रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत नहीं हुए हैं।
राजोरा ने बताया कि राज्य सरकार ने सीमांकन, नामांतरण और पंजीयन के लिए एक व्यापक योजना बनाई है, जिसमें विस्थापितों के मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने ड्रोन सर्वेक्षण की बात कही, जिस पर मेधा पाटकर ने आपत्ति जताई।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह शासन के प्रस्ताव से प्रभावित नहीं है, क्योंकि वर्ष 2002 से अब तक हजारों विस्थापितों को पुनर्वास नीति के तहत भूखंड दिए जाने के बावजूद उनके दस्तावेज़ पंजीकृत नहीं किए गए हैं। इसके कारण विस्थापित अपने भूखंडों पर नामांतरण, बँटवारा, विक्रय या गिरवी जैसे अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि बड़वानी, खरगोन, अलीराजपुर और धार जिलों के कलेक्टर अपने-अपने जिलों में एक समिति गठित करेंगे। इस समिति में उप प्रभागीय अधिकारी (एसडीओ), तहसीलदार और उप-पंजीयक (स्टाम्प्स) सदस्य होंगे। यह समिति उन सभी विस्थापितों — या उनके वारिसों — के नाम पर भूमि का पंजीयन करेगी, जिनके पक्ष में आवंटन या विक्रय पत्र जारी किए गए हैं।
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिये कि पंजीयन के बाद विस्थापितों के नाम राजस्व अभिलेखों और नक्शों में दर्ज किए जाएंगे। इसके साथ ही ग्राम पंचायत या नगर पालिका भी अपने अभिलेखों में इन नामों को दर्ज करेगी।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) और नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) को कहा गया है कि वे एक सक्षम अधिकारी नियुक्त करें, जो इस समिति का सदस्य बने और पंजीयन प्रक्रिया में सहयोग करे।
साथ पंजीयन दस्तावेजों में भूमि का क्षेत्रफल, नाप, सीमाएं और दिशाओं का पूरा विवरण दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न न हो। इन सभी कार्यों के लिए जिला मुख्यालयों पर विशेष शिविर आयोजित किए जाएँ, जिससे विस्थापितों को सुविधा मिले और प्रक्रिया में तेजी आए।
न्यायालय ने कहा है कि इस कार्य की अनुपालन की पूरी जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश राजोरा पर होगी।
वहीं न्यायालय ने मेधा पाटकर को निर्देशित किया गया है कि वे विस्थापितों और समितियों के बीच समन्वय स्थापित करें, ताकि पंजीयन कार्य प्रभावी और समयबद्ध रूप से पूरा हो सके।
न्यायालय ने दो महीने की समयसीमा निर्धारित की है, जिसके भीतर यह पंजीयन कार्य पूरा किया जाना है। चारों जिलों के कलेक्टरों को आदेश दिया गया है कि वे 5 जनवरी 2026 की अगली सुनवाई पर इस कार्य की प्रगति रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करें।
न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोदकुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला हजारों विस्थापित परिवारों के अधिकारों से जुड़ा है, जो दो दशकों से अपने भूखंडों के स्वामित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह आदेश केवल कानूनी राहत नहीं, बल्कि न्याय और पुनर्वास की दिशा में एक ठोस कदम है — जो वर्षों से अधिकारों की प्रतीक्षा कर रहे विस्थापितों के जीवन में नई उम्मीद जगाता है। – नर्मदा बचाओ आंदोलन, राहुल यादव


