झारखंड के मधुपुर में महात्मा गांधी के ऐतिहासिक आगमन की शताब्दी पर वर्षभर चलने वाले समारोह की शुरुआत हो रही है। यह आयोजन न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए अहम है, क्योंकि बापू केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रतीक विचार हैं। उनकी हत्या उन मूल्यों पर हमला थी, जो नफ़रत और हिंसा की राजनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने रहे। आज भी वही विचार समाज को जोड़ने की शक्ति देते हैं।
गांधी जयंती पर विशेष
झारखंड के मधुपुर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आगमन के सौ साल पर शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन की न सिर्फ झारखंड में पूरे देश में अहमियत है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी एक विचार हैं— सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रतीक। लेकिन उनकी हत्या सिर्फ़ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि उन मूल्यों पर हमला था, जो नफ़रत और हिंसा की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती थे। आज भी वही सोच नए चेहरों के साथ समाज को तोड़ने की कोशिश कर रही है, देश को गुमराह करने की कोशिश कर रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1917 से 1940 के बीच बापू 12 बार झारखंड (तत्कालीन बिहार) आए। केवल रांची ही नहीं बल्कि कई शहरों, गांव और कस्बों में जाकर आम लोगों और आदिवासियों से मिले। झारखंड के आचरण और यहां की परंपराओं से वो खासे प्रभावित थे। उन्होंने कुछ मौके पर यहां के आदिवासी समाज और परंपराओं की खुलकर तारीफ की । 15 सितंबर 1925 को बापू ने चाईबासा दौरा किया था। यहां के हो आदिवासियों से गांधी जी खासा प्रभावित थे। रांची लौट रहे थे, तो खूंटी में मुंडाओं से भी बातचीत की थी। रांची से हजारीबाग गए, जहां 18 सितंबर 1925 को संत कोलंबा कॉलेज में छात्रों को संबोधित किया था।
1925 में गांधी जी ने देवघर की यात्रा की थी यहां मदिरापान के खिलाफ लोगों को जागरूक किया था। उन्होंने यहां के पंडों की तारीफ की थी। उन्होंने मधुपुर का भी दौरा किया था और स्थानीय टाउन हॉल का उद्घाटन भी किया था। 7 अक्टूबर 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गांधीजी गिरिडीह भी पहुंचे थे।
महात्मा गांधी अक्टूबर 1925 को गिरिडीह से देवघर के मधुपुर पहुंचे थे। जहां रेलवे स्टेशन के समीप गांधी जी का जोरदार स्वागत किया गया था। लंबे समय से गांधीजी को मधुपुर लाने की चल रही थी काफी कोशिश के बाद वे मधुपुर पहुंचे। उन दिनों पंडित विनोदानंद झा, नथमल खंडेलवाल, ईश्वर प्रसाद साह, रामेश्वर लाल सर्राफ ने उनका स्वागत किया था। मधुपुर दौरे का उनका मुख्य उद्देश्य देश बंधु स्मारक कोष के लिए राशि जुटाना और खादी का प्रचार-प्रसार था। इसी मकसद से गांधीजी ने बिहार के कई इलाके का दौरा किया था। मधुपुर दौरे के क्रम में वे चंपा कोठी में ठहरे थे। यहां से उन्हें नगरपालिका भवन का उद्घाटन के लिए जाना था। चंपा कोठी से गांधी जी अपने हजारों समर्थकों के साथ इसके लिए पैदल चले थे। तब तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष अमृतलाल शील हुआ करते थे। गांधी जी के साथ चंपा कोठी से नगरपालिका भवन तक जाने वाले में मोतीलाल मित्रा, तारापद बोस, विजय नारायण कुंडू आदि लोग शामिल थे। वैसे तो मधुपुर नगरपालिका का उद्घाटन 1909 में हुआ था लेकिन उसके नये भवन का उद्घाटन गांधी जी ने बाद में किया था। इस दौरान नगरपालिका के दरवाजे पर चांदी का ताला लगाया गया था और इसके लिए चाबी भी चांदी की बनाई गई थी। इसी चांदी की चाबी के सहारे ताला खोलकर गांधी जी ने नगरपालिका भवन का उद्घाटन किया था। उद्घाटन के बाद गांधी जी ने कहा था कि
-“हमलोग मधुपुर गये।वहां मुझे एक छोटे से सुंदर नये टाउन हाल का उद्घाटन करने को कहा गया था। मैंने उसका उद्घाटन करते हुए और नगरपालिका को उसका अपना मकान तैयार हो जाने पर मुबारकबाद देते हुए यह आशा व्यक्त की कि वह नगरपालिका मधुपुर को उसकी आबोहवा और उसके आसपास के कुदरती दृश्यों के अनुरूप ही एक सुंदर जगह बना देगी। मुंबई व कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को सुधार करने में बडी मुश्किलें पेश आती हैं मगर मधुपुर जैसी छोटी जगहों में भी नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी अपनी हद में आने वाले क्षेत्र को साफ सुथरा रखने में मुश्किलों का सामना भी नहीं करना पड़ता। “
नगरपालिका भवन का उद्घाटन के बाद में गांधीजी तिलक विद्यालय पहुंचे थे। वहां के प्राचार्य ने गांधीजी को अभिनंदन पत्र सौंपा था । जिसमें विद्यालय की स्थिति, अभिभावकों की भूमिका की चर्चा की गई थी। गांधी जी को बताया गया था कि इस विद्यालय में लगातार छात्रों की संख्या घटती जा रही है, जो चिंता का विषय है। विद्यालय को चलाने के लिए लोगों से जो आर्थिक सहायता मिलती थी, वह भी कम होती जा रही है । इससे विद्यालय को चलाने में परेशानी हो रही है। इतना ही नहीं, कुछ बच्चों के माता-पिता ने भी बच्चों को स्कूल भेजने से यह कहते हुए बाहर कर लिया कि विद्यालय में हाथ सूत कताई को अनिवार्य किया गया है। प्राचार्य चाहते थे गांधीजी इन समस्याओं के निदान पर भी कुछ बोलें। गांधीजी ने अभिनंदन पत्र में लिखे एक-एक शब्द को धैर्य से सुना, पढ़ा और उनका उत्तर भी दिया। उनके उत्तर में समाधान भी था।
गांधीजी ने कहा कि यदि शिक्षकों को अपने उद्देश्य में श्रद्धा है तो उन्हें निराश नहीं होना चाहिए। सभी नई संस्थाओं को अच्छे बुरे- दिन देखने पड़ते हैं। यह स्वाभाविक ही है। उनकी यह कठिनाइयां उनका परीक्षा काल भी है। विश्वास वही है जो तूफानों में भी अडिग रहे। यदि शिक्षकों को पूरा विश्वास है कि पाठशाला के जरिए उन्हें आसपास के लोगों तक एक संदेश पहुंचाना है, तो उन्हें बड़े से बड़े त्याग करने के लिए तैयार होना चाहिए। यदि उनको इस बात का यकीन हो जाए कि अपनी पाठशाला को अच्छा बनाने की दिशा में वे जितना कर सकते थे, वह सब कुछ किया है और मां-बाप तथा उनके लड़के उनकी त्रुटियों के कारण पाठशाला जाना नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि जिस सिद्धांत के लिए प्रयत्न कर रहे हैं, वहीं उन्हें ठीक नहीं जंच रहा तो फिर उनकी पाठशाला में एक लड़का हो या 100 लड़के हो उसकी कोई परवाह नहीं करनी चाहिए।
गांधीजी ने एक-एक शब्द को धैर्य से सुना, पढ़ा और समाधान भी दिया। गांधीजी ने कहा कि यदि शिक्षकों को अपने उद्देश्य में श्रद्धा है तो गांधीजी ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि यदि उनकी कताई में श्रद्धा रखने के कारण मां-बाप बच्चों को पाठशाला से निकाल रहे तो इसकी कोई चिता भी नहीं करें। कितु यदि उन्होंने कई को अपने आंतरिक विश्वास के कारण नहीं, सिर्फ इसलिए रखा है कि वह एक रिवाज हो गया है या कांग्रेस के प्रस्ताव में उसका होना आवश्यक बताया तो लोगों को सद्भाव कायम रखने के लिए कताई को निकाल देने में जरा भी हिचकिचाना नहीं चाहिए। समय आ गया है कि राष्ट्रीय शिक्षक संघ ही निर्णय लें, क्योंकि जब सुधार होते हैं तो सबका या एकाध का विरोध करने वाले कुछ लोग तो हमेशा ही निकल आते हैं और मात्र यही शिक्षक, जिन्हें अपने में और उद्देश्य में श्रृद्धा है। जिन सुधारों को आवश्यक समझते हैं, उनके विरोध का सामना कर सकते हैं और शायद यही उनके नए प्रयास को उचित प्रमाणित करता है। अपनी बात रखने के बाद गांधीजी मधुपुर से पूर्णिया बिहार के चले गए थे।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ऐतिहासिक आगमन के सौ वर्ष पूरे होने पर जगह-जगह दौरान जनसभाओं के माध्यम से लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता घनश्याम के अनुसार आठ अक्तूबर 1925 को गांधी जी के मधुपुर आगमन की ऐतिहासिक पृष्ठ यह कार्यक्रम केवल स्मरण नहीं, बल्कि गांधी जी के आदर्शों को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प है। इस कार्यक्रम का नाम ‘मधुपुर पधारे गांधी हमारे, सौ साल बेमिसाल’ रखा गया है।
साहित्यकार उत्तम पीयूष बताते हैं कि -“मधुपुर में दो ही ऐसे शब्द हैं जो दिनभर में हज़ारों लोग लाख़ों बार बोलते हैं और वह है – ‘मधुपुर ‘और ‘ गांधी चौक ‘. एक तीसरा शब्द भी है – ‘स्टेशन”। मधुपुर की धड़कन ‘ गांधी चौक’ जो मधुपुर का सियासी – समाजी मरक़ज़ भी ह। यहां का गांधी चौक हजारों – लाखों मधुपुरियों के सुख दुख, उम्मीदों – आशाओं के संवाद का केंद्र है।
एक वक़्त था जब महात्मा गांधी का जादू पूरे मुल्क में था। उनकी एक आवाज़ पर कितने लोगों ने घर छोड़ दिया, कितने लोगों ने देश के लिए अंग्रेज़ हुकूमत की लाठियां खाईं, गोलियां सीने पर खाई, अमित यातनाएं झेली। देश आज़ाद हुआ तो गांधी जी के अनुयायियों ने श्रृद्धा पूर्वक उनकी प्रतिमाएं पूरे देश में लगवाई। शायद ही कोई ऐसा शहर या कस्बा रहा होगा जहां गांधीजी की मूरत न लगी हो। पर, मधुपुर के लिए यह बेहद ख़ास इसीलिए है क्योंकि मधुपुर उन बेहद ख़ास जगहों में से एक है जहां महात्मा गांधी का एकाधिक बार शुभागमन हुआ है। 1965 में दुमका जिला (तब देवघर अनुमंडल था) कांग्रेस अध्यक्ष नथमल सिंहानियां जी के नेतृत्व में तथा मधुपुर के महान स्वतंत्रता सेनानी द्वारिका प्रसादजी गुटगुटिया की प्रेरणा से मधुपुर के गांधीभक्त मुरलीधर गुप्ताजी ने विचार विमर्श के बाद कोलकाता के ” जयपुर मार्बेल इम्पोरियम” में जो सफ़दर रोड, गणेश टाकीज़ के पास अवस्थित है – में जाकर गांधी जी की मूर्ति तैयार करने का आर्डर दिया था। स्व. गुटगुटियाजी की हार्दिक इच्छा थी कि गांधीजी के पूरे शरीर का दर्शन मूरत में सही ढंग से हो। वे सिर्फ़ चेहरे की आकृति वाली मूरत नहीं चाहते थे। उस वक़्त गांधी जी की प्रतिमा के लिए 500/ की आवश्यकता थी। इस नेक काम के लिए मधुपुर के उद्योगपति स्व. घनश्यामदास सिंहानियां जी ने 250/ तथा स्वतंत्रता सेनानी स्व. द्वारिका प्रसाद गुटगुटिया जी ने 100/ का दान दिया था। इसके अतिरिक्त मधुपुर थाना के कुछ पदाधिकारियों ने आगे बढ़ चढ़कर कर सहयोग दिया था।इस नेक काम में शहर के कुछ प्रबुद्ध जनों एवं शिक्षकों ने दस दस रू. का सहयोग किया था।
महात्मा गांधी की लगभग चार फीट की मुस्कुराती, पूरे शरीर वाली मूर्ति जो सफ़ेद संगमरमर की बनी थी – कोलकाता से लायी गयी.स्व. मुरलीधर गुप्ता के कथनानुसार गांधीजी की वह मूरत 02 अक्टूबर 1966 को एक भव्य समारोह के साथ स्थापित कराया गया.एक महती सभा का आयोजन किया गया जिसमें संतालपरगना के महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. शशिभूषण राय, स्व.चलबल झा,स्व. द्वारिका प्रसाद गुटगुटिया, पं. अनंत शर्मा, पं. उपेंद्र झा, स्व. ज्वाला प्रसाद राय, गांधीवादी मुरलीधर गुप्ताजी आदि उपस्थित हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता संतालपरगना जिला कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. नथमल सिंहानिया़जी ने की। गांधीजी की मूरत का उद्घाटन हलांकि देवघर के महान स्वतंत्रता सेनानी पं. विनोदानंद झा जी के कर कमलों द्वारा होना था पर किसी परिस्थिति वश वे समारोह में आ नहीं सके । तब बापू की प्रतिमा का अनावरण एवं उद्घाटन किया था तत्कालीन एकीकृत बिहार के मंत्री, वरीय नेता एवं विद्वान पं. हरिनाथ मिश्र जी ने।
इधर हाल के वर्षों में मधुपुर के तात्कालीन विधायक सह मंत्री श्री राज पलिवार जी द्वारा गांधी प्रतिमा स्थल का सौंदर्यीकरण करवाया गया है। आयोजन समिति के अनुसार कार्यक्रम एक अक्टूबर से ही आरंभ जाएगा। समारोह का मुख्य आकर्षण गांधी जी के परपौत्र तुषार गांधी का आगमन रहेगा। वे सात और आठ अक्तूबर को रेलवे बैडमिंटन हॉल में आयोजित विशेष कार्यक्रमों में भाग लेंगे। स्थानीय, लोगों ओर सामाजिक संगठनों की ओर से कार्यक्रम को सफल बनाने को लेकर व्यापक तैयारियां की जा रही है। सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, स्वतंत्रता संग्राम पर प्रदर्शनी और विभिन्न सामाजिक संदेशों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।जगह-जगह सजावट कर शताब्दी समारोह को ऐतिहासिक बनाने की तैयारियां की जा रही है।(सप्रेस)


